योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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करे । पर ऐसा तो नहीं है, क्योंकि जब शरीरपात होता है, तब स- अवस्था को भी जानता है और परलोक में जो शब्द होता है, उम अनुभव करता है, अपने कर्म के अनुसार सुख दुःख भोगता है और देश स्थान को प्राप्त होता है । यह बात शास्त्र में भी सिद्ध है और अ- भव से भी प्रसिद्ध है कि मृतक को किमी ने नहीं जाना और अभ को किमी ने नहीं जाना । और जिसने जाना, वह आत्मा एक अक्षर है—इससे हे राम ! शरीर के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता । वह तो नित्य शुद्ध है और जैसा निश्चय उसमें होता है, वैसा ही होकर भासित होता है और जैसा मिलता है, वैसा ही प्रकाशता है । ऐसा जो सत्य आत्मा है, वह किमी में नहीं बँधता जैसे रस्सी में सर्प का आकार भासित होता है, पर वह रस्सी सर्प तो नहीं हो जाती; जो कल्पित सर्प का अभाव हो जाता है, तब रस्सी ज्यों की त्यों रहती है, वैसे ही आत्मसत्ता आकार होकर भासित होती है, परन्तु आकार तो नहीं होती, जब आकार का अभाव हो जाता है, तब आत्मसत्ता ज्यों की त्यों रहती है, इसी कारण उसे बन्धन नहीं होता । ऐसी आत्म- सत्ता में जो विकार दिखते हैं, वे भ्रममात्र हैं और भ्रान्ति से ही लोग दुःख पाते हैं ।
हे राम ! यह जगत् आभासमात्र है, और उस आभासमात्र में जो राग-द्वेष आदि फुरते हैं, उनकी निवृत्ति का उपाय मैं तुमसे कहता हूँ, जो कुछ उपदेश मैंने किया है, उसके विचारने से भ्रान्ति निवृत्त हो जायगी और आत्मपद की प्राप्ति होगी । अभ्यास के बिना जीव जो आत्मपद की प्राप्ति चाहे तो कभी न होगी । जब बारम्बार अभ्यास करेगा, तब द्वैतभ्रम मिट जायगा और आत्मपद प्राप्त होगा । जिसका कोई नित्य अभ्यास करता है और यत्न भी करता है, वह प्राप्त होता है । वह कौन पदार्थ है, जो अभ्यास से प्राप्त न हो ? जो थककर फिरे नहीं और दृढ अभ्यास करे तो प्राप्त होता ही है । राज्य की लक्ष्मी तब प्राप्त होती है, जब रण में दृढ होकर युद्ध करते हैं और जय होती है । यदि केवल मुख से कहे कि मेरी जय हो तो नहीं होती । वैसे ही