योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1462, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ६५७
आत्मपद भी तब प्राप्त होगा, जब दृढ़ अभ्यास करोगे-अभ्यास के बिना कहने भर से कुछ प्राप्त नहीं होता। हे राम ! इस मन के दो प्रवाह हैं। एक जगत् का कारण है और दूसरा स्वरूप की प्राप्ति का कारण। जो असत् शास्त्र हैं और जिनमें आत्मज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहा, उनको छोड़ो। यह जो महारामायण मोक्ष का उपाय है, उसमें चार वेद, पट्शास्त्र और सब इतिहासों और पुराणों का सिद्धान्त मैंने कहा है। इसके समान और न किसी ने कहा है, न कोई कहेगा। ऐसे शास्त्र के विचार में मन लगाओ तो शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होगे।
हे राम ! आत्मज्ञान वर और शाप की नाईं नहीं है कि कहने भर से सिद्ध हो। इसकी प्राप्ति तब होगी, जब बारम्बार विचार करके दृढ़ अभ्यास करोगे और जब इसकी भावना होगी, तब मुक्ति पाओगे। ऐसा कल्याण पिता, माता और मित्र भी न करेंगे, और तीर्थ आदि सुकृत से भी न होगा, जैसा कल्याण बारम्बार विचारने से मेरा उपदेश करेगा। इससे और सब उपायों को त्यागकर इसी का विचार करो तो सब भ्रान्ति मिट जायगी। और शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी। हे राम ! अज्ञान एक विसूचिकारोग है और उससे जीव जलते हैं। जो मेरे शास्त्र को विचारेगा, उसका रोग नष्ट हो जायगा। ईश्वर की यह महामाया है कि मिथ्याभ्रम से जीव दुखी होते हैं। जो अपना दुःख दूर करना चाहे, वह मेरा शास्त्र विचारे। जितने सुन्दर पदार्थ दिखते हैं, सब मिथ्या हैं। उनके लिए यत्न करना परम आपदा है। ये सब पदार्थ आपातरमणीय हैं। ये देखने भर को सुन्दर हैं, पर भीतर से खोखले हैं। इनकी प्राप्ति में मूर्ख आनन्द मानते हैं। हे राम ! ये पदार्थ तब तक सुन्दर लगते हैं, जब तक मृत्यु नहीं आई। जब मृत्यु आवेगा तब सब काम रह जायँगे। इसलिए इनके निमित्त जो यत्न करते हैं, वे मूर्ख हैं। जिस काल में मृत्यु आती है, उस समय कष्ट प्राप्त होता है और यदि चन्दन का लेप कीजिए तो भी शान्ति नहीं मिलती। जिसके लिए जीव बड़े यत्न करता है, युद्ध करता है और प्राण त्यागता है, वह धन स्थिर नहीं रहता। एक दिन धन और प्राणी का वियोग ही