योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जाता है। और जब वियोग होता है, तब मनुष्य कष्ट पाता है। मैं ऐसा उपाय कहता हूँ, जिसमें यत्न भी थोड़ा हो और सुगमता से आत्म-पद प्राप्त हो। जब शास्त्र के अर्थ में दृढ़ अभ्यास होता है, तब वह अजर, अमरपद प्राप्त होता है। इसमें तुम बोधवान हो और बोध करके अभ्यास का यत्न करो। जो यत्न न करोगे तो अज्ञानरूपी शत्रु दबावेगा। यदि उस शत्रु को मारना हो तो मान और मोह छोड़कर आत्मपद का अभ्यास करो।
हे राम ! जो पुरुष अब तक अज्ञानरूपी शत्रु को मारने और आत्म-पद पाने का यत्न नहीं करते, वे परम कष्ट पावेंगे और संसाररूपी दुःख से कभी मुक्त न होंगे। इस कष्ट से निकलने का यही उपाय है कि महारामायण ब्रह्मविद्या का जो उपदेश है, उसको विचारकर अपने हृदय में धारणा करे। इस उपाय से भ्रान्ति मिट जायगी। यह महारामायण उपदेश सब सिद्धान्तों का सार है। और शास्त्रों से आत्मपद की प्राप्ति चाहे हो या न हो, परन्तु इसके विचार से अवश्य आत्मा की प्राप्ति होगी। जैसे तिल की खली से तेल निकलना कठिन है, तिलों में ही तेल निकलना है; वैसे ही मेरा उपदेश तिल की नाईं है और अन्य उपदेश खली हैं। हे राम ! सम्पूर्ण शास्त्रों के मुख्य सिद्धान्तों का सार सिद्धान्त मैंने तुमसे कहा है। जो आत्मा सदा विद्यमान है, उसको लोग भ्रान्ति में अविद्यमान मानते हैं, इसलिए उमी के विद्यमान करने को सब शास्त्र यत्न करते हैं। पर जो उनके विचार से आत्मपद को विद्यमान नहीं जानता, वह मेरे उपदेश को विचारने से अवश्य आत्मपद को विद्यमान जानेगा, यह निश्चित है। हे राम ! और शास्त्रों के दृढ़ विचार और यत्न से जो सिद्धि होती है, वह इस शास्त्र के विचार से अनायास प्राप्त होगी। शास्त्रकर्त्ता का और लक्षण न विचारना, पर शास्त्र की युक्ति विचार देखना है। जो कुछ सब शास्त्रों का सार सिद्धान्त है, वह मैंने तुमसे सुगममार्ग में कहा है। इसके विचार से इसकी युक्ति देखो। अज्ञानी जो कुछ मुझे कहते और हँसते हैं, सो मैं सब जानता हूँ, परन्तु मेरा दया का स्वभाव है