योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1464, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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इससे मैं चाहता हूँ कि किसी प्रकार वे नरकरूप संसार से निकलें। इसी कारण मैं उपदेश करता हूँ।
हे राम! मैं जो तुमको उपदेश करता हूँ सो किसी अपने मतलब से नहीं करता कि मेरा कुछ अर्थ सिद्ध हो। जो कोई तुमको उपदेश करता है, सो सुनो। तुम्हारा जो कोई बड़ा पुरुष है, वही शुद्ध संवित् होकर मलिनसंवित् को उपदेश करता है। वह संवित् न देवता है, न मनुष्य है, न यक्ष है, न राक्षस है और पिशाच आदि भी नहीं है। केवल जो ज्ञानमात्र है, वही तुम हो, मैं भी वही हूँ और जगत् भी वही है। जब सब वही है तब वासना किसकी करनी है? हे राम! जीव के दुःख का कारण वासना ही है। जो पुरुष इस संसार-बन्धन के दुःख की चिकित्सा न करेगा, वह आत्महंता है और बड़े दुःख में जा पड़ेगा, जहाँ से निकलने की सामर्थ्य न होगा। इससे अब भी तुम मुक्ति का उपाय करो। जब तक सब भावों की वासना नहीं निवृत्त होती, तब तक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता—इसी का नाम बन्धन है। जब वासना क्षय होगी, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी। जितने पदार्थ दिखते हैं, वे सब अविचार-सिद्ध हैं, विचार करने से कुछ नहीं रहते। और जो विचार करने से न रहे, उनकी अभिलाषा करनी व्यर्थ है। जो वस्तु होती हो, उसके पाने का यत्न भी करना ठीक है। जो वस्तु हो ही नहीं, उसके लिए यत्न करना मूर्खता है। ये जगत् के पदार्थ असत् हैं। जैसे खरगोश के सींग असत् हैं और मरुस्थल की नदी असत् होती है, वैसे ही यह जगत् असत् है। सम्यक्दर्शी ज्ञानवान् पुरुष जानता है कि यह जगत् खरगोश के सींगसदृश असत् और भ्रान्तिमात्र है। इसलिए इसके लिए यत्न करना मूर्खता है। जो पदार्थ कारण बिना देख पड़े, उसको भ्रान्तिमात्र जानिये। आत्मा जगत् का कारण नहीं, इससे जगत् मिथ्या है। आत्मपद सब इन्द्रियों और मन से अतीत है और यह जगत् पाञ्चभौतिक है। जगत् मन और इन्द्रियों का विषय है और आत्मपद मन और इन्द्रियों का विषय नहीं है। तो उसे जगत् का कारण कैसे कहिये? जो अशब्दपद है, वह नाना प्रकार शब्द का कारण कैसे