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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1465, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1465

६६० ✺ योगवाशिष्ठ ✺

हो और जो निराकार आत्मपद है सो पृथ्वी आदिक नाना प्रकार के भूत आकारों का कारण कैसे हो ?

हे राम ! जैसा कारण होता है, उसमें वैसा ही कार्य उपजता है। आत्मा निराकार है और जगत् साकार, इसलिए निराकार साकार का कारण कैसे हो ? जैसे वट का बीज साकार होता है, इसलिए उसका कार्य वट भी साकार होता है और साकार से निराकार कार्य नहीं होता, वैसे ही निराकार से साकार कार्य भी नहीं होता। इससे इस जगत् का कारण आत्मा नहीं। वह न समवाय कारण है, न निमित्त कारण। निमित्त कारण तब होता है, जब कुछ द्वितीय वस्तु होती है। जैसे मृत्तिका से कुम्हार घट बनाता है, पर आत्मा तो अद्वैत है, वह निमित्त कारण कैसे हो ? और समवाय कारण भी तब होता है, जब साकार वस्तु होता है—जैसे मृत्तिका के परिणाम से घट बनता है—पर आत्मा निराकार अपरिणामी है, वह जगत् का कारण कैसे हो ? जो दोनों कारणों से रहित दिखे, उसे भ्रान्तिमात्र जानिये। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के आकार कारण के बिना दिखते हैं, इसलिए वे भ्रान्तिमात्र हैं, वैसे ही यह जगत् भी कारण के बिना भ्रान्तिमात्र भासित होता है। आत्मा में जगत् कभी नहीं हुआ। जैसे प्रकाश में अँधेरा नहीं होता, वैसे ही आत्मा में जगत् नहीं है। यदि तुम कहो कि फिर दिखता क्या है तो उसी का किञ्चन भासित होता है, जो वही रूप है। जैसे चलती है तो भी वायु है और ठहरती है तो भी वायु है, चलने और ठहरने में कुछ भेद नहीं होता, और जैसे आकाश और शून्यता में भेद कुछ नहीं होता वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं है—वही आत्मसत्ता फुरने से जगद्रूप होकर भासित होती है। जैसे जल और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं। कुछ द्वैत वस्तु नहीं है। जो लोग कहते हैं कि जगत् कर्मों से होता है सो असत्य है; क्योंकि कर्म भी बुद्धि से होते हैं जब आत्मा में बुद्धि ही नहीं तब कर्म कैसे हो ? और जब कर्म ही नहीं तो जगत् कैसे हो ?