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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1466, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1466

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६६१

जैसे खरगोश के सींग के धनुष से बाण चलाना असत्य है, वैसे ही कर्म से जगत् का होना असत्य है । एक कहते हैं कि सूक्ष्म परमाणु से जगत् हो जाता है । पर यह भी असत्य है; क्योंकि जो सूक्ष्म परमाणु परिणाम से जगत्रूप हुए होते तो बुद्धिरूप जगत् न दिखता । पर यह तो बुद्धिरूप क्रिया होती दिखती है । जो परमाणु से जगत् होता तो इन्हीं से बढ़ता जाता; क्योंकि जो परमाणु जड़ हैं, वे ही बढ़ते हैं । पर ऐसा तो नहीं होता । बुद्धिपूर्वक चेष्टा होती दिखती है । इसी से कहा है कि वे असत्य कहते हैं; क्योंकि सूक्ष्म भी किसी से उत्पन्न होना चाहिए और कोई उसके रहने का स्थान भी चाहिए; पर आत्मा में देश, काल और वस्तु तीनों कल्पित हैं । जब आत्मा में ये न हुए तो परमाणु कैसे हों और जगत् कैसे हो ? आत्मा अद्वैत है, इससे जगत् न उपजा है और न नष्ट होना है । जो जगत् उपजा होता तो नष्ट भी होता । जो उपजा ही नहीं तो वह नष्ट कैसे हो ? आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है । इससे हे राम ! मैं, तुम और सब जगत् आकाशरूप है । किसी के साथ आकार नहीं—सब निराकाररूप हैं । जो तुम कहो कि फिर बोलते-चालते क्यों हैं तो जैसे स्वप्न में सब आकाशरूप होते हैं, पर नाना प्रकार की चेष्टा करते और बोलते-चालते हैं, वैसे ही ये भी बोलते-चालते हैं, परन्तु आकाशरूप हैं । तुम्हारा जो स्वरूप है, वह भी सुनो । देश को त्यागकर देशान्तर को जो संवित् जाती है, और उसके मध्य जो ज्ञानसंवित् है वही तुम्हारा स्वरूप है । वह अनामय और सब दुःखों से रहित है । जैसे जब जाग्रत् दशा को त्यागकर जीव स्वप्न में जाता है, तब जाग्रत् त्याग दिया हो, और स्वप्न न आया हो, ऐसे मध्य काल में जो अचेत चिन्मात्र सत्ता है, वही तुम्हारा स्वरूप है । उसमें पण्डितों और ज्ञानवानों का निश्चय है । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक उसी में स्थित रहते हैं, उनका कभी उत्थान नहीं होता । जैसे बर्फ से अग्नि कभी नहीं उपजती, वैसे ही उनका स्वरूप से उत्थान कभी नहीं होता । वह आत्मसत्ता न उपजती है, न विनशती है और न और की ओर होती है—सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित है ।