योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६ | योगवाशिष्ठ। |
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आनन्द हो वैसा आनन्द मुझको हुआ है मुनीश्वर ! जिस अर्थ के लिये आप आये हैं वह कृपा करके कहिये और अपना वह अर्थ पूर्ण हुआ जानिये । ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो मुझको देना कठिन है, मेरे यहाँ सब कुछ विद्यमान है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे विश्वामित्रा- गमन वर्णनं नाम तृतीयस्सर्गः ॥ ३ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जब इस प्रकार राजा ने कहा तो मुनियों में शार्दूल विश्वामित्रजी ऐसे प्रसन्न हुए जैसे चन्द्रमा को देखकर क्षीरसागर उमड़ता है । उनके रोम खड़े हो आये और कहने लगे, हे राजशार्दूल ! तुम धन्य हो ! ऐसे तुम क्यों न कहो । तुम्हारे में दो गुण हैं—एक तो यह कि तुम रघुवंशी हो और दूसरे यह कि वशिष्ठजी जैसे तुम्हारे गुरु हैं जिनकी आज्ञा में चलते हो । अब जो कुछ मेरा प्रयोजन है वह प्रकट करता हूँ । मैने दशगात्र यज्ञ का आरम्भ किया है, जब यज्ञ करने लगता हूँ तब खर और दूषण निशाचर आकर विध्वंस कर जाते हैं और मांस, हाड़ और रुधिर डाल जाते हैं जिससे वह स्थान यज्ञ करने योग्य नहीं रहता और जब में और जगह जाता हूँ तो वहाँ भी वे उसी प्रकार अपवित्र कर जाते हैं इसलिये उनके नाश करने के लिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ । कदाचित यह कहिये कि तुम भी तो समर्थ हो, तो हे राजन् ! मैंने जिस यज्ञ का आरम्भ किया है उसका अंग क्षमा है । जो में उनको शाप दूँ तो वह भस्म हो जावें पर शाप क्रोध बिना नहीं होता । जो में क्रोध करूँ तो यज्ञ निष्फल होता है और जो चुपकर रहूँ तो राक्षस अपवित्र वस्तु डाल जाते हैं । इससे अब में आपकी शरण आया हूँ। हे राजन् ! अपने पुत्र रामजी को मेरे साथ भेज दो, वह राक्षसों को मारें और मेरा यज्ञ सफल हो । यह चिन्ता तुम न करना कि मेरा पुत्र अभी बालक है । यह तो इन्द्र के समान शूरवीर है । जैसे सिंह के सम्मुख मृग का बच्चा नहीं ठहर सकता वैसे ही इसके सम्मुख राक्षस न ठहर सकेंगे । इसको मेरे साथ भेजने से तुम्हारा यश और धर्म दोनों रहेंगे और मेरा कार्य होगा इसमें सन्देह नहीं । हे राजन् ऐसा कार्य त्रिलोकी में कोई