योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य प्रकरण । १७
नहीं जो रामजी न कर सके इसीलिए मैं तुम्हारे पुत्र को लिये जाता हूँ, यह मेरे हाथ से रक्षित रहेगा और कोई विघ्न न होने दूँगा । जैसे तुम्हारे पुत्र हैं सो और वशिष्ठजी जानते हैं और ज्ञानवान् भी जो त्रिकालदर्शी हैं जानेंगे और किसी की सामर्थ्य नहीं जो इनको जानें । हे राजन् ! जो समय पर कार्य होता है वह थोड़े ही परिश्रम से सिद्ध होता है और समय विना बहुत परिश्रम करने से भी नहीं होता । खर और दूषण प्रबल दैत्य हैं, मेरे यज्ञ को खण्डित करते हैं । जब रामजी जावेंगे तब वह भाग जावेंगे उनके आगे खड़े न रह सकेंगे । जैसे सूर्य के तेज से तारागण का प्रकाश क्षीण हो जाता है वैसे ही रामजी के दर्शन से वे स्थित न रहेंगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले हे भारद्वाज ! जब विश्वामित्र ने ऐसा कहा तब राजा दशरथ चुप होकर गिर पड़े और एक मुहूर्त पर्यन्त पड़े रहे ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्य प्रकरणे दशरथ विषादो नाम चतुर्थःसर्गः ॥ ४ ॥
वाल्मीकिजी बोले हे भारद्वाज ! एक मुहूर्त उपरान्त राजा उठे और अधैर्य होकर बोले हे मुनीश्वर ! आपने क्या कहा ? रामजी तो अभी कुमार हैं । अभी तो उन्होंने शस्त्र और अस्त्रविद्या, नहीं सीखी, बल्कि फूलों की शय्या पर शयन करनेवाले; अन्तःपुर में स्त्रियों के पास बैठने-वाले और बालकों के साथ खेलनेवाले हैं । उन्होंने कभी भी रणभूमि नहीं देखी और न भृकुटी चढ़ाके कभी युद्ध ही किया । वह दैत्यों से क्या युद्ध करेंगे ? कभी पत्थर और कमल का भी युद्ध हुआ है । हे मुनीश्वर ! में तो बहुत वर्षों का हुआ हूँ । इस वृद्धावस्था में मेरे घर में चार पुत्र हुए हैं; उन चारों में रामजी अभी सोलह वर्ष के हुए हैं और मेरे प्राण हैं । उनके विना में एक क्षण भी नहीं रह सकता, जो तुम उनको ले जावोगे तो मेरे प्राण निकल जावेंगे । हे मुनीश्वर ! केवल मुझे ही उनका इतना स्नेह नहीं किन्तु लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत और माताओं के भी प्राण हैं । जो तुम उनको ले जावोगे तो सब ही मर जावेंगे जो तुम हमको रामजी के वियोग से मारने आये हो तो ले जावो । हे मुनीश्वर ! मेरे चित्त में तो रामजी पूर्ण हो रहे हैं उनको मैं आपके साथ कैसे दूँ ? मैं तो उनको देखकर प्रसन्न होता