योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
वैराग्य प्रकरण । १७
नहीं जो रामजी न कर सके इसीलिए मैं तुम्हारे पुत्र को लिये जाता हूँ, यह मेरे हाथ से रक्षित रहेगा और कोई विघ्न न होने दूँगा । जैसे तुम्हारे पुत्र हैं सो और वशिष्ठजी जानते हैं और ज्ञानवान् भी जो त्रिकालदर्शी हैं जानेंगे और किसी की सामर्थ्य नहीं जो इनको जानें । हे राजन् ! जो समय पर कार्य होता है वह थोड़े ही परिश्रम से सिद्ध होता है और समय विना बहुत परिश्रम करने से भी नहीं होता । खर और दूषण प्रबल दैत्य हैं, मेरे यज्ञ को खण्डित करते हैं । जब रामजी जावेंगे तब वह भाग जावेंगे उनके आगे खड़े न रह सकेंगे । जैसे सूर्य के तेज से तारागण का प्रकाश क्षीण हो जाता है वैसे ही रामजी के दर्शन से वे स्थित न रहेंगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले हे भारद्वाज ! जब विश्वामित्र ने ऐसा कहा तब राजा दशरथ चुप होकर गिर पड़े और एक मुहूर्त पर्यन्त पड़े रहे ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्य प्रकरणे दशरथ विषादो नाम चतुर्थःसर्गः ॥ ४ ॥
वाल्मीकिजी बोले हे भारद्वाज ! एक मुहूर्त उपरान्त राजा उठे और अधैर्य होकर बोले हे मुनीश्वर ! आपने क्या कहा ? रामजी तो अभी कुमार हैं । अभी तो उन्होंने शस्त्र और अस्त्रविद्या, नहीं सीखी, बल्कि फूलों की शय्या पर शयन करनेवाले; अन्तःपुर में स्त्रियों के पास बैठने-वाले और बालकों के साथ खेलनेवाले हैं । उन्होंने कभी भी रणभूमि नहीं देखी और न भृकुटी चढ़ाके कभी युद्ध ही किया । वह दैत्यों से क्या युद्ध करेंगे ? कभी पत्थर और कमल का भी युद्ध हुआ है । हे मुनीश्वर ! में तो बहुत वर्षों का हुआ हूँ । इस वृद्धावस्था में मेरे घर में चार पुत्र हुए हैं; उन चारों में रामजी अभी सोलह वर्ष के हुए हैं और मेरे प्राण हैं । उनके विना में एक क्षण भी नहीं रह सकता, जो तुम उनको ले जावोगे तो मेरे प्राण निकल जावेंगे । हे मुनीश्वर ! केवल मुझे ही उनका इतना स्नेह नहीं किन्तु लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत और माताओं के भी प्राण हैं । जो तुम उनको ले जावोगे तो सब ही मर जावेंगे जो तुम हमको रामजी के वियोग से मारने आये हो तो ले जावो । हे मुनीश्वर ! मेरे चित्त में तो रामजी पूर्ण हो रहे हैं उनको मैं आपके साथ कैसे दूँ ? मैं तो उनको देखकर प्रसन्न होता
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हूँ । रामजी के वियोग से मेरे प्राण कैसे बचेंगे ? हे मुनीश्वर ! ऐसी प्रीति मुझे स्त्री, धन और पदार्थों की नहीं जैसी रामजी की है । मैं आपके वचन सुनकर अति शोकवान् हुआ हूँ । मेरे बड़े अभाग्य उदय हुए जो आप इस निमित्त आये । मैं रामजी को कदापि नहीं दे सकता । जो आप कहिये तो मैं एक अक्षौहिणी सेना, जो अति शूरवीर और शस्त्र अस्त्रविद्या से सम्पन्न है साथ लेकर चलूँ और उनको मारूँ पर जो कुबेर का भाई और विश्रवा का पुत्र रावण हो तो उससे में युद्ध नहीं कर सकता । पहिले में बड़ा पराक्रमी था; ऐसा कोई त्रिलोकी में न था जो मेरे सामने आता, पर अब वृद्धावस्था प्राप्त होकर देह जर्जर हो गई है । हे मुनीश्वर ! मेरे बड़े अभाग्य हैं जो आप आये । मैं तो रावण से काँपता हूँ और केवल मैं ही नहीं वरन् इन्द्र आदि देवता भी उससे काँपते और भय पाते हैं । किसकी सामर्थ्य है जो उससे युद्ध करे । इस काल में वह बड़ा शूरवीर है । जो मेरी ही उसके साथ युद्ध करने की सामर्थ्य नहीं तो राजकुमार रामजी की क्या सामर्थ्य है । जिन रामजी को तुम लेने आये हो वह तो रोगी पड़े हैं । उनको ऐसी चिन्ता लगी है जिससे महाकृश हो गये हैं और अन्तःपुर में अकेले बैठे रहते हैं । खाना-पीना इत्यादि जो राजकुमारों की चेष्टायें हैं वह भी सब उनको बिसर गई हैं और मैं नहीं जानता कि उनको क्या दुःख हुआ है । जैसे पीतवर्ण कमल होता है वैसे ही उनका मुख हो गया है । उनको युद्ध की सामर्थ्य कहाँ है ? उन्होंने तो अपने स्थान से बाहर की पृथ्वी भी नहीं देखी है हमारे प्राण वही हैं उनके वियोग से नहीं जी सकते ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे दशरथोक्तिवर्ण- नन्नाम पञ्चमस्सर्गः ॥ ५ ॥
वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार दशरथजी ने महादीन और अधैर्य होकर कहा तों विश्वामित्रजी क्रोध करके कहने लगे कि हे राजन् ! तुम अपने धर्म को स्मरण करो । तुमने कहा था कि तुम्हारा अर्थ सिद्ध करूँगा पर अब तुम अपने धर्म को त्यागते हो । जो तुम सिंहों के समान होकर मृगों की नाईं भागते हो तो भागो पर आगे
वैराग्य प्रकरण । १६
रघुवंशी कुल में ऐसा कोई नहीं हुआ कि जिसने वचन फेरा हो । जो तुम करते हो सो करो हम चले जावेंगे परन्तु यह तुमको योग्य न था क्योंकि शून्य गृह से शून्य ही होकर जाता है तुम बसते रहो और राज्य करते रहो जैसे कुछ होगा हम समझ लेंगे । इतना कहकर वाल्मीकि जी बोले कि जब इस प्रकार विश्वामित्रजी को क्रोध उत्पन्न हुआ तो पचास कोटि योजन तक पृथ्वी कांपने लगी और इन्द्रादिक देवता भयवान् हुए कि यह क्या हुआ ? तब वशिष्ठजी बोले, हे राजन् ! इक्ष्वाकुकुल में सब परमार्थी हुए हैं और तुम अपना धर्म क्यों त्यागते हो ? मेरे सामने तुमने विश्वामित्रजी से कहा है कि तुम्हारा अर्थ पूरा करूँगा पर अब क्यों भागते हो । रामजी को तुम इनके साथ कर दो, यह तुम्हारे पुत्र की रक्षा करेंगे । इस पुरुष के सामने किसी का बल नहीं चलता यह साक्षात् ही काल की मूर्ति हैं जो तपस्वी कहिये तो भी इन के समान दूसरा नहीं है और शस्त्र और अस्त्रविद्या भी इनके सदृश कोई नहीं जानता क्योंकि दक्ष प्रजापति ने अपनी दो पुत्रियाँ जिनका नाम जया और सुभगा था विश्वामित्रजी को दी थीं जिन्होंने पाँच-पाँच सौ पुत्र दैत्यों के मारने के लिये प्रकट किये । वे दोनों इनके सम्मुख मूर्ति धारण करके स्थित होती हैं इससे इनको कौन जीत सकता है ? जिसके साथी विश्वामित्रजी हों उसको किसी का भय नहीं । आप इनके साथ अपना पुत्र निस्संशय होकर दो । किसी को सामर्थ्य नहीं कि इनके होते तुम्हारे पुत्र को कुछ कह सके । जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार का अभाव हो जाता है वैसे ही इनकी दृष्टि से दुःख का अभाव हो जाता है। हे राजन् ! इनके साथ तुम्हारे पुत्र को कोई खेद न होगा । तुम इक्ष्वाकु के कुल में उत्पन्न हुए हो और दशरथ तुम्हारा नाम है, जो तुम ऐसे हो अपने धर्म में स्थित न रहे तो और जीवों से धर्म का पालन कैसे होगा ? जो कुछ श्रेष्ठ पुरुष चेष्टा करते हैं उनके अनुसार और जीव भी करते हैं। जो तुम अपने वचनों का पालन न करोगे तो और किसी से क्या होगा ? तुम्हारे कुल में अपने वचन से कोई नहीं फिरा इससे अपने धर्म का त्यागना योग्य नहीं । यदि तुम दैत्यों के भय से शोकवान् हो तो मत हो । कदाचित् मूर्तिधारी
२० योगवाशिष्ठ ।
काल आकर स्थित हो तो भी विश्वामित्र के होते तुम्हारे पुत्र को कुछ भय न होगा । तुम शोक मत करो और अपने पुत्र को इनके साथ कर दो । जो तुम अपना पुत्र न दोगे तो तुम्हारा दो प्रकार का धर्म नष्ट होगा— एक धर्म यह कि कूप, बावली और ताल जो बनवाये हैं उनका पुण्य नष्ट हो जावेगा, दूसरे यह कि तप, व्रत, यज्ञ, दान, स्नानादिक क्रिया का फल भी नष्ट होकर तुम्हारा गृह अर्थहीन हो जावेगा । इससे मोह और शोक को छोड़ और धर्म को स्मरण करके रामजी को इनके साथ कर दो तो तुम्हारे सब कार्य सफल होंगे । हे राजन् ! इस प्रकार जो तुम्हें करना था तो प्रथम ही विचारकर कहते क्योंकि विचार किये बिना काम करने का परिणाम दुःख होता है । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा तो राजा दशरथ धैर्यवान् हुए और भृत्यों में जो श्रेष्ठ भृत्य था उसको बुलाकर कहा, हे महाबाहो ! रामजी को ले आवो ! उनके साथ जो चाकर बाहर आने जानेवाला और छल से रहित था राजा की आज्ञा लेकर रामजी के निकट गया और एक मुहूर्त पीछे आकर कहने लगा हे देव ! रामजी तो बड़ी चिन्ता में बैठे हैं । जब मैंने रामजी से बारंबार कहा कि चलिये तब वे कहने लगे कि चलते हैं ! ऐसे ही कह कह चुप हो रहते हैं । दूत का यह वचन सुन राजा ने कहा कि रामजी के मन्त्री और सब नौकरों को बुलाओ और जब वे सब निकट आये तो राजा ने आदर और युक्तिपूर्वक कोमल और सुन्दर वचन मन्त्री से इस भाँति कहा कि हे रामजी के प्यारे ! रामजी की क्या दशा है और ऐसी दशा क्योंकर हुई है सो सब क्रम से कहो ? मन्त्री बोला, हे देव ! हम क्या कहें ? हम अति चिन्ता से केवल आकार और प्राणसहित दीखते हैं किन्तु मृतक के समान हैं क्योंकि हमारे स्वामी रामजी बड़ी चिन्ता में हैं । हे राजन् ! जिस दिन से रघुनाथजी तीर्थ करके आये हैं उस दिन से चिन्ता को प्राप्त हुए हैं । जब हम उत्तम भोजन और पान करने और पहिरने और देखने के पदार्थ ले जाते हैं तो उनको देखकर वे किसी प्रकार प्रसन्न नहीं होते । वे तो ऐसी चिन्ता में लीन हैं कि देखते भी नहीं और जो देखते हैं तो क्रोध करके सुख
वैराग्य प्रकरण । २१
दायी पदार्थों का निरादर करते हैं। अन्तःपुर में उनकी माता नाना प्रकार के हीरे और मणि के भूषण देती हैं तो उनको भी डाल देते हैं अथवा किसी निर्धन को दे देते हैं; प्रसन्न किसी पदार्थ में नहीं होते। सुन्दर स्त्रियाँ नाना प्रकार के भूषणों सहित महामोह करनेवाली निकट आकर उनकी प्रसन्नता के निमित्त लीला और कटाक्ष करती हैं वे उनको भी विषवत् जानते हैं। जैसे पपीहा और किसी जल को नहीं पीता वैसे ही वे जब अन्तःपुर में जाते हैं तब उन स्त्रियों को देखकर क्रोध-वान् होते हैं। हे राजन् ! उनको कुछ भला नहीं लगता वे तो किसी बड़ी चिन्ता में मग्न हैं। तृप्त होकर भोजन नहीं करते क्षुधावन्त रहते हैं उन्हें कुछ न पहिरने और खाने-पीने की इच्छा है, न राज्य की इच्छा है और न इन्द्रियों के किसी सुख की इच्छा है। वे तो उन्मत्त की नाईं बैठे रहते हैं और जब हम कोई सुखदाई पदार्थ फलादिक ले जाते हैं तब क्रोध करते हैं। हम नहीं जानते कि क्या चिन्ता उनको हुई है जो एक कोठरी में पद्मासन लगाये हाथ पर मुख धरे बैठे रहते हैं। जो कोई बड़ा मन्त्री आकर पूछता है तो उससे कहते हैं कि "तुम जिसको सम्पदा मानते हो वह आपदा है और जिसको आपदा जानते हो वह आपदा नहीं है। संसार के नाना प्रकार के पदार्थ जो रमणीय जानते हो वे सब झूठे हैं पर इसी में सब दूबे हैं। ये सब मृगतृष्णा के जलवत् हैं; इनको सत्य जान मूर्ख हिरण दौड़ते और दुःख पाते हैं"। हे राजन् ! वे कदा-चित् बोलते हैं तो ऐसे बोलते हैं और कुछ उनको सुखदायी नहीं भासता। जो हम हँसी की वार्ता करते हैं तो वे हँसते भी नहीं। जिस पदार्थ को प्रीतिसंयुक्त लेते थे उस पदार्थ को अब डाल देते हैं और दिन पर दिन दुर्बल होते जाते हैं। जैसे मेघ की बून्द से पर्वत चलायमान नहीं होते वैसे ही वे भी चलायमान नहीं होते; और जो बोलते हैं तो ऐसे कहते हैं कि न राज्य सत्य है, न भोग सत्य है, न यह जगत सत्य है, न भ्राता सत्य है और न मित्र सत्य है। मिथ्या पदार्थों के निमित्त मूर्ख यत्न करते हैं। जिनको सब सत्य और सुखदायक जानते हैं वे बन्धन के कारण हैं। जो कोई राजा अथवा पण्डित इनके पास जाता है तो उनको
२२ योगवासिष्ठ ।
देखकर कहते हैं कि ये "पशु हैं-आशारूपी फांसी में बंधे हुए हैं" । हे राजन् ! जो कुछ योग्य पदार्थ हैं उनको देखकर उनका चित्त प्रसन्न नहीं होता बल्कि देखकर क्रोधवान् होते हैं । जैसे पपीहा मारवाड़ में जावे तो मेघों की बूंदों को नहीं देखता और खेदवान् होता है वैसे ही रामजी विषयों से खेदवान् होते हैं । इससे हम जानते हैं कि उनको परमपद पाने की इच्छा है परन्तु कदाचित् उनके मुख से यह नहीं सुना । त्याग का भी अभिमान उन्हें कदाचित् नहीं है क्योंकि कभी गाते हैं और बोलते हैं तो कहते हैं, "हाय में अनाथ मारा गया ! अरे मूर्खों ! तुम संसार समुद्र में क्यों डूबते हो ? यह संसार अनर्थ का कारण है । इसमें सुख कदापि नहीं है इससे छूटने का उपाय करो"। वह किसी के साथ बोलते नहीं और न हँसते हैं; किसी अति चिन्ता में डूबे हैं । वह किसी पदार्थ से आश्चर्यवान् भी नहीं होते । जो कोई कहे कि आकाश में बाग लगा है और उसमें फूल फूले हैं । उनको मैं ले आया; तो उसको सुनकर भी आश्चर्यवान् नहीं होते, सब भ्रममात्र समझते हैं । उनको न किसी पदार्थ से हर्ष होता है, न किसी से शोक होता है; किसी बड़ी चिन्ता में मग्न हैं पर उस चिन्ता के निवारण करने की किसी में सामर्थ्य नहीं देखते । हे राजन् ! हमको यह चिन्ता लग रही है कि रामजी को खाने पहिरने, बोलने और देखने की इच्छा नहीं रही । और न किसी कर्म की उनको इच्छा है ऐसा न हो कि कहीं मृतक हो जायें । जो कोई कहता है कि तुम चक्रवर्ती राजा हो तुम्हारी बड़ी आयु हो, और बड़ा सुख पावो तो उसके वचन सुनकर कठोर बोलते हैं । हे राजन् ! केवल रामजी की ही ऐसी चिन्ता नहीं वरन् लक्ष्मण और शत्रुघ्न को भी ऐसे ही चिन्ता लग रही है । जो कोई उनकी चिन्ता दूर करनेवाला हो तो करे नहीं तो बड़ी चिन्ता में डूबे रहेंगे । राजन् ! अब क्या कहते हो ? तुम्हारे पुत्र सबसे विरक्त हो एक वस्त्र ओढ़े बैठे हैं । इससे अब तुम वही उपाय करो जिससे उनकी चिन्ता निवृत्त हो । इतना सुन विश्वामित्रजी बोले हे साधो ! यदि रामजी ऐसे हैं तो हमारे पास लावो, हम उनका दुःख निवृत्त करेंगे । हे राजन्, दशरथ ! तुम धन्य हो; जिसका पुत्र विवेक और वैराग्य को प्राप्त
वैराग्य प्रकरण । २३
हुआ है। हम तुम्हारे पुत्र को परम पद प्राप्त करावेंगे और अभी उनके सब दुःख मिट जावेंगे। हम और वशिष्ठादि एक युक्ति से उपदेश करेंगे उससे उनको आत्मपद की प्राप्ति होगी। तब वह दशा तुम्हारे पुत्र की होगी कि वह लोष्ट, पत्थर और सुवर्ण को समान जानेंगे। जो क्षत्रियों का प्राकृतिक आचार है सो वह करेंगे और हृदय में उदासीन रहेंगे इससे तुम्हारा कुल कृतार्थ होगा। तुम रामजी को शीघ्र बुलाओ। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! ऐसे मुनीन्द्र के वचन सुनकर राजा दशरथ ने मन्त्री और नौकरों से कहा कि राम, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को साथ ले आवो। जब मन्त्री और भृत्यों ने रामजी के पास जाकर कहा तो रामजी आये और राजा दशरथ, वशिष्ठजी और विश्वामित्र को देखा कि तीनों पर चमर हो रहे हैं और बड़े बड़े मण्डलेश्वर बैठे हैं। सबने रामजी को देखा कि उनका शरीर कृश हो रहा है। जैसे महादेवजी स्वामिकार्त्तिक को आते देखें वैसे ही राजा दशरथ ने रामजी को आते देखा। रामजी ने वहाँ आकर राजा दशरथजी के चरण पर मस्तक लगा प्रणाम किया और वैसे ही वशिष्ठजी, विश्वामित्र और सभा में जो बड़े बड़े ब्राह्मण बैठे थे उनको भी प्रणाम किया। जो बड़े बड़े मण्डलेश्वर बैठे थे उन्होंने उठकर रामजी को प्रणाम किया। राजा दशरथ रामजी को गोद में बैठाकर मस्तक चूमा और बहुत प्रेम में पुलकित हो रामजी से कहा हे पुत्र ! केवल विरक्तता से परमपद की प्राप्ति नहीं होती। गुरु वशिष्ठजी के उपदेश की युक्ति से परमपद की प्राप्ति होगी। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तुम धन्य हो और बड़े शूर हो कि विषयरूपी शत्रु तुमने जीते हैं। विश्वामित्र बोले, हे कमलनयन राम ! अपने अन्तःकरण की चपलता को त्यागकर जो कुछ तुम्हारा आशय हो प्रकट कर कहो कि तुमको मोह कैसे हुआ, किस कारण हुआ और कितना है ? एवं अब जो कुछ तुमको वाञ्छित हो सो भी कहो। हम तुमको उमी पद में प्राप्त करेंगे जिसमें कदाचित् दुःख न हो। जैसे आकाश को चूहा नहीं काट सकता वैसे ही तुमको कदाचित् पीड़ा न होगी। हे रामजी ! हम तुम्हारे सम्पूर्ण दुःख नाश कर देंगे। तुम संशय मत करो जो कुछ तुम्हारा वृत्तान्त
२४ | योगवाशिष्ठ ।
हो सो हमसे कहो। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है तैसे ही विश्वामित्र के वचन सुनकर रामजी प्रसन्न हुए और अपने हृदय में निश्चय किया कि अब मुझको अभीष्ट पद की प्राप्ति होगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे गमममाजवर्णनोनाम षष्ठस्सर्गः ॥ ६ ॥
श्रीरामजी बोले, हे भगवन् ! जो वृत्तान्त है सो तुम्हारे सम्मुख क्रम में कहता हूँ। मैं राजा दशरथ के घर में उत्पन्न होकर क्रम से बड़ा हुआ और आगे वेद पढ़कर ब्रह्मचर्यादिक व्रत धारण किये; तदनन्तर घर में आया तो मेरे हृदय में विचार हुआ कि तीर्थाटन करूं और देवद्वारों में जाकर देवों के दर्शन करूं। निदान में पिता की आज्ञा लेकर तीर्थों में गया और गङ्गा आदि सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान और शालग्राम और केदार आदि ठाकुरों के विधिसंयुक्त दर्शन करके यहाँ आया। फिर उत्साह हुआ तब यह विचार आया कि प्रातःकाल उठकर स्नान सन्ध्यादिक कर्म करके भोजन करना। जब इस प्रकार से कुछ दिन व्यतीत हुए तब मेरे हृदय में एक विचार उत्पन्न हुआ जो मेरे हृदय को खेंच ले गया। जैसे नदी के तट पर तृण बेल होती है उसको नदी का प्रवाह खेंच ले जाता है तैसे ही मेरे हृदय में जो कुछ जगत की आस्थाव्यापी बेल थी उसको विचाररूपी प्रवाह खेंच लेगया। तब मैंने जाना कि राज्य करने में क्या है, भोग में क्या है और जगत क्या है—सब भ्रममात्र है—इसकी वासना मूढ़ गँवार है; यह स्थावर, जङ्गम जगत सब मिथ्या है। हे मुनीश्वर ! जितने कुछ पदार्थ हैं वह सब मन में उत्पन्न होते हैं सो मन ही भ्रममात्र है अनहोता मन दुःखदायी हुआ है। मन जो पदार्थों को सत्य जानकर दौड़ता है और सुखदायक जानता है सो मृगतृष्णा के जलवत् है। जैसे मृगतृष्णा के जल को देखकर मृग दौड़ते हैं और दौड़ते दौड़ते थक कर गिर पड़ते हैं तो भी उनको जल प्राप्त नहीं होता तैसे ही मूर्ख जीव पदार्थों को सुखदायी जानकर भोगने का यत्न करते हैं और शान्ति नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों के भोग सर्पवत् हैं जिनका भोगे हुआ जन्म मरण और जन्म से जन्मान्तर पाना है। भोग और जगत सब भ्रममात्र
वैराग्य प्रकरण । २५
हैं उनमें जो आस्था करते हैं वह महामूर्ख है मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि सब आगमापायी हैं अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं। इसमें जिस पदार्थ का नाश न हो वही पदार्थ पाने योग्य है इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है। हे मुनीश्वर ! जितने सम्पदारूप पदार्थ भासते हैं वह सब आपदा हैं; इनमें रञ्चक भी सुख नहीं। जब इनका वियोग होता है तब कण्टक की नाईं मन में चुभते हैं। जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं तब जीव राग द्वेष में जलता है और जब नहीं प्राप्त होते तब तृष्णा में जलता है-इससे भोग दुःखरूप ही हैं। जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता वैसे ही भोगरूपी दुःख की शिला में सुखरूप छिद्र नहीं होता। हे मुनीश्वर ! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ। जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो तो धुवाँ हो थोड़ा थोड़ा जलता रहता है। वैसे ही भोगरूपी अग्नि से मन जलता रहता है। विषयों में कुछ भी सुख नहीं है दुःख बहुत हैं, इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है। जैसे खाड के ऊपर तृण और पात होते हैं और उससे खाई आच्छा- दित हो जाती है उसको देख हरिण कूदकर दुःख पाता है वैसे ही मूर्ख भोग को सुखरूप जानकर भोगने की इच्छा करता है और जब भोगता है तब जन्म से जन्मान्तररूपी खाईं में जा पड़ता है और दुःख पाता है। हे मुनीश्वर ! भोगरूपी चोर अज्ञानरूपी रात्रि में आत्मारूपी धन लूट ले जाता है, पर उसके वियोग से जीव महादीन रहता है। जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है वह दुःखरूप है। उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है वह शरीर क्षणभंगुर और असार है। जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है वह मूर्ख और जड़ है। उसका बोलना और चलना भी ऐसा है जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है और उसके वेग से शब्द होता है। जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता वैसे ही दुःख जानकर में भोग की इच्छा नहीं करता। लक्ष्मी भी परम अनर्थ- कारी है जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती तब तक उसके पाने का यत्न होता है और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है जब लक्ष्मी प्राप्ति हुई तब तब
२६ योगवाशिष्ठ ।
सदगुण अर्थात् शीलता, सन्तोष, धर्म, उदारता, कोमलता, वैराग्य विचार दयादिक का नाश कर देती है । जब ऐसे गुणों का नाश हुआ तब सुख कहाँ से हो, तब तो परम आपदा ही प्राप्त होती है । इसको परमदुःख का कारण जानकर मैंने त्याग दिया है । हे मुनीश्वर ! इस जीव में गुण तबतक हैं जब तक लक्ष्मी नहीं प्राप्त हुई । जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब सब गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे बसन्त ऋतु की मञ्जरी तब तक हरी रहती है जब तक ज्येष्ठ आषाढ़ नहीं आता और जब ज्येष्ठ आषाढ़ आया तब मञ्जरी जल जाती है वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब शुभ गुण जल जाते हैं । मधुर वचन तभी तक बोलता है जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं है और जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब कोमलता का अभाव होकर कठोर हो जाता है। जैसे जल पतला तब तक रहता है जब तक शीतलता का संयोग नहीं हुआ और जब शीतलता का संयोग होता है तब बर्फ होकर कठोर दुःखदायक हो जाता है; वैसे यह जीव लक्ष्मी से जड़ हो जाता है । हे मुनीश्वर ! जो कुछ सम्पदा है वह आपदा का मूल है, क्योंकि जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तब बड़े बड़े सुख भोगता है और जब उसका अभाव होता है तब तृष्णा से जलता है और जन्म से जन्मान्तर पाता है । लक्ष्मी की इच्छा करना ही मूर्खता है । यह तो क्षणभंगुर है, इसमें भोग उपजते और नष्ट होते हैं । जैसे जल से तरंग उपजते और मिट जाते हैं और जैसे बिजली स्थिर नहीं होती वैसे ही भोग भी स्थिर नहीं रहते । पुरुष में शुभ गुण तब तक हैं जब तक तृष्णा का स्पर्श नहीं और जब तृष्णा हुई तब गुणों का अभाव हो जाता है । जैसे दूध में मधुरता तब तक है जब तक उसे सर्प ने स्पर्श नहीं किया और जब सर्प न स्पर्श किया तब वही दूध विषरूप हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणेरामेणैवंराघववर्णनन्नामसप्तमसर्गः ॥७॥
श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! लक्ष्मी देखने मात्र ही सुन्दर है । जब इसकी प्राप्ति होती है तब सद्गुणों का नाश कर देती है । जैसे विष की बेल देखने मात्र ही सुन्दर होती है और स्पर्श करने से मार डालती है वैसे ही लक्ष्मी की प्राप्ति होने से जीव आत्मपद से वंचित हो महादीन
वैराग्य प्रकरण । <p align="right">२७</p>
हो जाता है । जैसे किसी के घर में चिन्तामणि दबी हो तो उसको जब तक खोदकर वह नहीं लेता तब तक दरिद्री रहता है वैसे ही (अज्ञान से) ज्ञान बिना महादीन हो रहता है और आत्मानन्द को नहीं पा सकता । आत्मानन्द में विघ्न करनेवाली लक्ष्मी है इसकी प्राप्ति से जीव अन्धा हो जाता है । हे मुनीश्वर ! जब दीपक प्रज्वलित होता है तब उसका बड़ा प्रकाश दृष्टि आता है और जब बुझ जाता है तब प्रकाश का अभाव हो जाता है पर काजल रह जाना है; वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तब बड़े भोग भुगाती है और तृष्णारूपी काजल उससे उपजता रहता है और जब लक्ष्मी का अभाव होता है तब तृष्णारूप वासना छोड़ जाती है । उस वासना (तृष्णा) से अनेक जन्म और मरण पाता है, कभी शान्ति नहीं पाता । हे मुनीश्वर ! जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, तब शान्ति के उपजानेवाले गुणों का नाश करती है । जैसे जब तक पवन नहीं चलता तब तक मेघ रहता है और जब पवन चलता है तो मेघ का अभाव हो जाता है वैसे ही लक्ष्मीजी की प्राप्ति होने से गुणों का अभाव होता है और गर्व की उत्पत्ति होती है । हे मुनीश्वर ! जो शूर होकर अपने मुख से अपनी बड़ाई न करे सो दुर्लभ है और सामर्थ्यवान् हो किसी की अवज्ञा न करे सब में समबुद्धि रखे सो भी दुर्लभ है वैसे ही लक्ष्मीवान् होकर शुभ गुण संयुक्त हो सो भी दुर्लभ है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी सर्प के विष के बढ़ाने को लक्ष्मीरूपी दूध है उसे पीते, पवनरूपी भोग के आहार करते कभी नहीं अघाता । महामोहरूपी उन्मत्त हस्ती है उसके फिरने का स्थान पर्वत की अटवीरूपी लक्ष्मी है और सद्गुणरूप सूर्यमुखी कमल की लक्ष्मी रात्रि है और भोगरूपी चन्द्रमुखी कमलों की लक्ष्मी चन्द्रमा है और वैराग्यरूप कमलिनी का नाश करनेवाली लक्ष्मी बरफ है और ज्ञानरूपी चन्द्रमा का आच्छादन करनेवाली लक्ष्मी राहु है और मोहरूप उलूक की लक्ष्मी मानो रात्रि है । दुःखरूप बिजली को लक्ष्मी आकाश है और तृणारूपी बेलि को बढ़ानेवाली लक्ष्मी मेघ है । तृष्णारूप तरंग को लक्ष्मी समुद्र है, तृष्णारूप भँवर को लक्ष्मी कमलिनी है और जन्म के दुःखरूप जल का लक्ष्मी
२८ योगवाशिष्ठ ।
गड्ढा है। हे मुनीश्वर ! देखने में यह सुन्दर लगती है । यह दुख का कारण है । जैसे खड्ग की धार देखने में सुन्दर होती है और स्पर्श करने से नाश करती है वैसे ही यह लक्ष्मी विचाररूपी मेघ का नाश करने को वायु है। हे मुनीश्वर ! यह मैंने विचार करके देखा है कि इसमें कुछ भी सुख नहीं । सन्तोपरूपी मेघ का नाश करनेवाली लक्ष्मी शरत्काल है । मनुष्य में गुण तक दृष्टि आते हैं जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तब शुभ गुण नष्ट हो जाते हैं । हे मुनीश्वर ! लक्ष्मी को ऐसी दुःखदायक जानकर इसकी इच्छा मैंने त्याग दी है । यह भोग मिथ्या है जैसे बिजली प्रकट होकर छिप जाती है वैसे ही लक्ष्मी भी प्रकट होकर छिप जाती है । जैसे ही जल शीतलता से हिम होता है वैसे ही लक्ष्मी मनुष्य को जड़ सा बना देती है । इसको जलरूप जान कर मैंने त्याग दिया है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे लक्ष्मीनैराश्य- वर्णनन्नामाष्टमसर्गः ॥ ८ ॥
रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! जैसे कमलपत्र के ऊपर जल की बूंद नहीं ठहरतीं वैसे ही लक्ष्मी भी क्षण भंगुर है । जैसे जल से तरंग होकर नष्ट होती है वैसे ही लक्ष्मी वृद्धि होकर नष्ट हो जाती है । हे मुनीश्वर ! पवन को रोकना कठिन है पर उसे भी कोई रोकता है और आकाश का चूर्ण करना अति कठिन है उसे भी कोई चूर्ण कर डालता है और बिजली का रोकना अति कठिन है सो उसे भी कोई रोकता है, परन्तु लक्ष्मी को कोई स्थिर नहीं रख सकता । जैसे शश की सींगों से कोई मार नहीं सकता और आरसी के ऊपर जैसे मोती नहीं ठहरता, जैसे तरंग की गाँठ नहीं पड़ती वैसे ही लक्ष्मी भी स्थिर नहीं रहती । लक्ष्मी बिजली की चमक सी है सो होती है और मिट भी जाती है । जो लक्ष्मी पाकर अमर होना चाहे उसे अति मूर्ख जानना और लक्ष्मी पाकर जो भोग की वाञ्छा करता है वह महा आपदा का पात्र है । उसका जीने से मरना श्रेष्ठ है । जीने की आशा मूर्ख करते हैं । जैसे स्त्री गर्भ की इच्छा अपने दुःख के निमित्त करती है वैसे ही जीने की आशा पुरुष
वैराग्य प्रकरण । २५
अपने नाश के निमित्त करते हैं। ज्ञानवान् पुरुष जिनकी परमपद में स्थिति है और उससे तृप्त हुए हैं, उनका जीना सुख के निमित्त है। उनके जीने से और के कार्य भी सिद्ध होते हैं। उनका जीना चिन्तामणि की नाईं श्रेष्ठ है। जिनको सदा भोग की इच्छा रहती है और आत्मपद से विमुख हैं उनका जीना किसी के सुख के निमित्त नहीं है वह मनुष्य नहीं गर्दभ है। जैसे वृक्ष पत्ती पशु का जीना है वैसे उनका भी जीना है। हे मुनीश्वर ! जो पुरुष शास्त्र पढ़ता है और उसने पाने योग्य पद नहीं पाया तो शास्त्र उसको भाररूप है। जैसे और भार होता है वैसे ही पढ़ने का भी भार है और जो पढ़कर विवाद करते हैं और उसके सार को नहीं ग्रहण करते वह भी भार है। हे मुनीश्वर ! यह मन आकाशरूप है। जो मन में शान्ति न आई तो मन भी उसको भार है और जो मनुष्य शरीर को पाकर उसका अभिमान नहीं त्यागता तो यह शरीर पाना भी उसका निष्फल है। इसका जीना तभी श्रेष्ठ है जब आत्मपद को पावे अन्यथा जीना व्यर्थ है। आत्मपद की प्राप्ति अभ्यास से होती है। जैसे जल पृथ्वी खोदने से निकलता है वैसे ही आत्मपद की प्राप्ति भी अभ्यास से होती है ! जो आत्मपद से विमुख होकर आशा की फाँसी में फँसे हैं वे संसार में भटकते रहते हैं। हे मुनीश्वर ! जैसे सागर में तरङ्ग अनेक उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं वैसे ही यह लक्ष्मी भी क्षणभंगुर है। इसको पाकर जो अभिमान करता है सो मूर्ख है। जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ने के लिये पड़ी रहती है। वैसे ही लक्ष्मी उनको नरक में डालने के लिये घर में पड़ी रहती है। जैसे अञ्जली में जल नहीं ठहरता वैसे ही लक्ष्मी भी नहीं ठहरती। ऐसी क्षणभंगुर लक्ष्मी और शरीर को पाकर जो भोग की तृष्णा करता है वह महामूर्ख है। वह मृत्यु के मुख में पड़ा हुआ जीने की आशा करता है। जैसे सर्प के मुख में मूर्ख मेढक पड़कर मच्छर खाने की इच्छा करता है वैसे ही जो जीव मृत्यु के मुख में पड़ा हुआ भोग की वाञ्छा करता है वह महामूर्ख है। जब युवा अवस्था नदी के प्रवाह की नाईं चली जाती है तब वृद्धावस्था आती है। उसमें महादुःख प्रकट होते हैं और
३० योगवाशिष्ट ।
शरीर जर्जर हो जाता है और मरता है। निदान एक क्षण भी मृत्यु इसको नहीं बिसारती। जैसे कामी पुरुष को सुन्दर स्त्री मिलती है तो उसके देखने का त्याग नहीं करता वैसे ही मृत्यु मनुष्य के देखे बिना नहीं रहती। हे मुनीश्वर ! मूर्ख पुरुष का जीना दुःख के निमित्त है। जैसे वृद्ध मनुष्य का जीना दुःख का कारण है वैसे ही अज्ञानी का जीना दुःख का कारण है। उसके बहुत जीने से मरना श्रेष्ठ है। जिस पुरुष ने मनुष्यशरीर पाकर आत्मपद पाने का यत्न नहीं किया उसने अपना आप नाश किया और वह आत्महत्यारा है। हे मुनीश्वर ! यह माया बहुत सुन्दर भासती है पर अन्त में नष्ट हो जाती है। जैसे काठ को भीतर से घुन खा जाता है और बाहर से बहुत सुन्दर दीखता है वैसे ही यह जीव बाहर से सुन्दर दृष्टि आता है और भीतर से उसको तृष्णा खा जाती है। जो मनुष्य पदार्थ को सत्य और सुखरूप जानकर सुख के निमित्त आश्रय करता है वह सुखी नहीं होता है। जैसे कोई नदी में सर्प को पकड़के पार उतरा चाहे तो पार नहीं उतर सकता, मूर्खता से डूबेगा, वैसे ही जो संसार के पदार्थों को सुखरूप जानकर आश्रय करता है सो सुख नहीं पाता, संसारसमुद्र में डूब जाता है। हे मुनीश्वर ! यह संसार इन्द्रधनुष की नाईं है। जैसे इन्द्रधनुष बहुत रङ्ग का दृष्टि आता है और उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता वैसे ही यह संसार भ्रम-मात्र है; इसमें सुख की इच्छा रखनी व्यर्थ है। इस प्रकार जगत् को मैंने असतरूप जानकर निर्वासनिक होने की इच्छा की है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्यप्रकरणे संसारसुखनिषेध-वर्णनन्नाम नवमस्सर्गः ॥ ९ ॥
श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! अहङ्कार अज्ञान से उदय हुआ है। यह महादुष्ट है और वहाँ परम शत्रु है। इसने मुझको दबा डाला है पर मिथ्या है और सब दुःखों की खानि है। जब तक अहङ्कार है तब तक पीड़ा की उत्पत्ति का अभाव कदाचित नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जो कुछ मैंने अहङ्कार से भजन और पुण्य किया, जो कुछ लिया दिया और जो कुछ किया वह सब व्यर्थ है। इससे परमार्थ की कुछ सिद्धि नहीं है।
वैराग्य प्रकरण । ३१
जैसे राख में आहुति धरी व्यर्थ हो जाती है वैसे ही मैं इसे जानता हूँ। जितने दुःख हैं उनका बीज अहङ्कार है। जब इसका नाश हो तब कल्याण हो। इससे आप उसकी निवृत्ति का उपाय कहिए। हे मुनीश्वर ! जो वस्तु मत्य है इसके त्याग करने में दुःख होता है और जो वस्तु नाशवान् है और भ्रम से दीखती है उसके त्याग करने में आनन्द है। शान्तिरूप चन्द्रमा के आच्छादन करने को अहङ्काररूपी राहु है। जब राहु चन्द्रमा को ग्रहण करता है तब उसकी शीतलता और प्रकाश ढक जाता है वैसे ही जब अहङ्कार बढ़ जाता है तब समता ढक जाती है। जब अहङ्काररूपी मेघ गरजके वर्षता है तब तृष्णारूपी कण्टकमञ्जरी बढ़ जाती है और कभी नहीं घटती। जब अहङ्कार का नाश हो तब तृष्णा का अभाव हो। जैसे जब तक मेघ है तब तक बिजली है; जब विवेक-रूपी पवन चले तब अहङ्काररूपी मेघ का अभाव होकर तृष्णारूपी बिजली नष्ट हो जाती है और जैसे जब तक तेल और बाती है तब तक दीपक का प्रकाश है जब तेल बाती का नाश होता है तब दीपक का प्रकाश भी नष्ट हो जाता है वैसे ही जब अहङ्कार का नाश हो तब तृष्णा का भी नाश होता है। हे मुनीश्वर ! परम दुःख का कारण अहङ्कार है। जब अहङ्कार का नाश हो तब दुःख का भी नाश हो जाय। हे मुनीश्वर ! यह जो मैं राम हूँ सो नहीं और इच्छा भी कुछ नहीं, क्योंकि मैं नहीं तो इच्छा किसको हो ? और इच्छा हो तो यही हो कि अहङ्कार से रहित पदकी प्राप्ति हो। जैसे जनेन्द्र को अहङ्कार का उत्थान नहीं हुआ वैसा मैं होऊँ ऐसी मुझको इच्छा है। हे मुनीश्वर ! जैसे कमल को बरफ नष्ट करता है वैसे ही अहङ्कार ज्ञान का नाश करता है। जैसे व्याध जाल से पक्षी को फँसाता है और उससे पक्षी दीन हो जाते हैं वैसे ही अहङ्काररूपी व्याधने तृष्णारूपी जाल डालकर जीवों को फँसाया है उससे वह महादीन हो गये हैं जैसे पक्षी अन्न के दाने सुख रूप जानकर चुगने आता है फिर चुगते चुगते जाल में फँस बन्धन से दीन हो जाता है वैसे ही यह जीव विषयभोग की इच्छा करने से तृष्णा-रूपी जाल में फँसकर महादीन हो जाता है। इससे हे मुनीश्वर ! मुझसे
३२ योगवाशिष्ट ।
वही उपाय कहिये जिससे अहङ्कार का नाश हो । जब अहङ्कार का नाश होगा तब मैं परमसुखी हूँगा । जैसे विन्ध्याचल पर्वत के आश्रय में उन्मत्त हस्ती गर्जते हैं वैसे ही अहङ्काररूपी विन्ध्याचल पर्वत के आश्रय में मनरूपी उन्मत्त हस्ती नाना प्रकार के सङ्कल्प विकल्परूपी शब्द करता है । इससे आप वही उपाय कहिये जिससे अहङ्कार का नाश हो जो कल्याण का मूल है । जैसे मेघ का नाश करनेवाला शरत्काल है वैसे ही वैराग्य का नाश करनेवाला अहङ्कार है । मोहादिक विकाररूप सर्पों के रहने का अहङ्काररूपी बिल है और वह कामी पुरुषों की नाईं है । जैसे कामी पुरुष काम को भोगता है और फूल की माला गले में डालकर प्रसन्न होता है वैसे ही तृष्णारूपी तागा है और मनरूपी फूल है सो तृष्णारूपी तागे के साथ गुहे हैं सो अहङ्काररूपी कामी पुरुष उनको गले में डालता है और प्रसन्न होता है । हे मुनीश्वर ! आत्मारूपी सूर्य है उसका आवरण करनेवाला मेघरूपी अहङ्कार है । जब ज्ञानरूपी शरत्काल आता है तब अहङ्काररूपी मेघ का नाश हो जाता है और तृष्णारूपी तुषार का भी नाश होता है । हे मुनीश्वर ! यह निश्चय कर मैंने देखा है कि जहाँ अहङ्कार है वहाँ सब आपदाएँ आकर प्राप्त होती हैं जैसे समुद्र में सब नदी आकर प्राप्त होती हैं वैसे ही अहङ्कार में सब आपदाओं की प्राप्ति होती है । इससे आप वही उपाय कहिये जिससे अहङ्कार का नाश हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्य प्रकरणे अहङ्कारदुर्दशावर्णनन्नाम दशमस्सर्गः ॥ १० ॥
श्रीरामजी बोले हे मुनीश्वर ! मेरा चित्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णादिक दुःख से जर्जरीभूत हो गया है और महापुरुषों के गुण जो वैराग्य, विचार, धैर्य और सन्तोष हैं उनकी ओर नहीं जाता—सर्वदा विषय की गरद में उड़ता है । जैसे मोर का पंख पवन में नहीं ठहरता वैसे ही यह चित्त सर्वदा भटका फिरता है पर कुछ लाभ नहीं होता । जैसे श्वान द्वार द्वार पर भटकता फिरता है वैसे ही यह चित्त पदार्थों के पाने के निमित्त भटकता फिरता है पर प्राप्त कुछ नहीं होता और जो कुछ प्राप्त होता है उसमें तृप्त नहीं होता बल्कि अन्तःकरण में तृष्णा बनी
वैराग्य प्रकरण । ३३
रहती है जैसे पिटारे में जल भरिये तो वह पूर्ण नहीं होता, क्योंकि छिद्रों से जल निकल जाता है और पिटारा शून्य का शून्य रहता है वैसे ही चित्त भोग और पदार्थों में संतुष्ट नहीं होता सदा तृष्णा ही रहती है। हे मुनीश्वर ! यह चित्तरूपी महामोह का समुद्र है; उसमें तृष्णारूपी तरंगें उठती ही रहती हैं, कभी स्थिर नहीं होतीं। जैसे समुद्र में तीक्ष्ण तरंगों से तट के वृक्ष बह जाते हैं वैसे ही चित्तरूपी समुद्र में विषयी बह जाते हैं। वासनारूपी तरंग के वेग से मेरा अचल स्वभाव चलायमान हो गया है; इसलिए इस चित्त में मैं महादीन हुआ हूँ। जैसे जाल में पड़ा हुआ पक्षी दीन हो जाता है वैसे ही चित्तरूपी धीवर के वासनारूपी जाल में बँधा हुआ मैं दीन हो गया हूँ। जैसे मृग के समूह से भूली मृगी अकेली खेदवान् होती है वैसे ही मैं आत्मपद से भूला हुआ खेदवान् हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! यह चित्त सदा क्षोभ-वान् रहता है, कभी स्थिर नहीं होता। जैसे क्षीरसमुद्र मन्दराचल से क्षोभवान् हुआ था वैसे ही यह चित्त संकल्प-विकल्प से खेद पाता है। जैसे पिंजरे में आया सिंह पिंजरे ही में फिरता है वैसे ही वासना में आयाचित्त स्थिर नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जैसे भारी पवन से सूखा तृण दूर से दूर जा पड़ता है वैसे ही इस चित्तरूपी पवन ने मुझको आत्मानन्द से दूर फेंका है जैसे सूखे तृण को अग्नि जलाती है वैसे ही मुझको चित्त जलाता है। जैसे अग्नि से धूम निकलता है वैसे ही चित्तरूपी अग्नि से तृष्णारूपी धूम निकलता है उसमे में परमदुःख पाता हूँ। यह चित्त हंस नहीं बनता। जैसे राजहंस मिले हुए दूध और जल को भिन्न भिन्न करता है उसकी नाईं मैं अनात्मा से अज्ञान के कारण एक हो गया हूँ, उसको भिन्न नहीं कर सकता और जब आत्मपद पाने का यत्न करता हूँ तब अज्ञान उसे प्राप्त नहीं करने देता। जैसे नदी का प्रवाह समुद्र में जाना है उसको पहाड़ सीधे नहीं चलने देता और समुद्र की ओर नहीं जाने देता वैसे ही मुझको चित्त आत्मा की ओर से रोकता है। वह परम शत्रु है। हे मुनीश्वर ! वही उपाय कहिये जिससे चित्तरूपी शत्रु का नाश हो। जैसे मृतक शरीर को श्वान खाते हैं वैसे
३४ | योगवाशिष्ठ ।
ही तृष्णा मुझे खा रही है। आत्मा के ज्ञान बिना में मृतक समान हूँ। जैसे बालक अपनी परछाहीं को बेताल मानकर भय पाता है और जब विचार करने में समर्थ होता है तब वेताल का भय नहीं होता वैसे ही चित्तरूपी वेताल ने मेरा स्पर्श किया है उससे में भय पाता हूँ। इसमें आप वही उपाय कहिये जिससे चित्तरूपी वेताल नष्ट हो जावे हे मुनीश्वर ! अज्ञान में मिथ्या वेताल चित्त में दृढ़ हो रहा है उसके नाश करने को मैं समर्थ नहीं हो सकता। अग्नि में बैठना, बड़े पर्वत के ऊपर जाना और वज्र का चूर्ण करना मैं सुगम मानता हूँ परन्तु चित का जीतना महाकठिन है। चित्त सदा ही चलायमान स्वभाववाला है। जैसे थम्भ से बाँधा हुआ वानर कभी स्थिर हो नहीं बैठता वैसे ही चित्त वासना के मारे कभी स्थिर नहीं होता। हे मुनीश्वर ! बड़े समुद्र का पान कर जाना, अग्नि का भक्षण करना और सुमेरु का उल्लंघन करना सुगम है, परन्तु चित्त का जीतना महाकठिन है जो सदा चलरूप है जैसे समुद्र अपना द्रवी स्वभाव कदाचित् नहीं त्यागता, महाद्रवीभूत रहता है और उसमें नाना प्रकार के तरंग उठते हैं वैसे ही चित्त भी चञ्चल स्वभाव को कभी नहीं त्यागता और नाना प्रकार की वासना उपजती रहती है। चित्त बालक की नाईं चञ्चल है, सदा विषय की ओर धावता है; कहीं-कहीं पदार्थ की प्राप्ति होती परन्तु भीतर सदा चञ्चल रहता है। जैसे सूर्य के उदय होने से दिन होता है और अस्त होने में दिन का नाश होता है, वैसे ही चित्त के उदय होने से त्रिलोकी की उत्पत्ति है और चित्त के लीन होने से जगत् भी लीन हो जाता है। हे मुनीश्वर ! चित्तरूपी समुद्र है, वासनारूपी जल है, उसमें छलरूपी सर्प जब जीव उसके निकट जाता है तब भोगरूपी सर्प उसको काटता है और तृष्णारूपी विष स्पर्श करता है उससे मरता है। हे मुनीश्वर ! भोग को सुखरूप जानकर चित्त दौड़ता है पर वह भोग दुःख का कारण है। जैसे तृण में आच्छादित खाई को देखकर मूर्ख मृग खाने दौड़ता है तो खाई में गिरकर दुःख पाता है वैसे ही चित्तरूपी मृग भोग को सुखरूप जानकर भोगने लगता है तब तृष्णा रूपी खाई में गिर पड़ता है और जन्म जन्मान्तर में दुःख भोगता रहता
वैराग्य प्रकरण । ३५
है । हे मुनीश्वर ! यह चित्त कभी-कभी बड़ा गम्भीर भी हो बैठता है । जैसे चील पक्षी आकाश में ऊँचे फिरता है पर जब पृथ्वी पर मांस देखता है तो वहाँ से पृथ्वी पर आकर मांस लेता है वैसे ही यह चित्त तब तक उदार है जब तक भोग नहीं देखता और जब विषय देखता है तब आसक्त हो विषय में गिर जाता है । यह चित्त वासनारूपी शय्या में सोया रहता है और आत्मपद की ओर नहीं जागता । मैं इस चित्त के जाल में पड़ गया हूँ । वह कैसा जाल है कि उसमें वासनारूपी सूत है, संसार की सत्यतारूपी गाँठ है और भोगरूपी चून है जिसको देखकर मैं फँसा हूँ और कभी पाताल में और कभी आकाश में वासनारूपी रस्सी से बँधा घटीयन्त्र की नाईं फिरता हूँ । इससे हे मुनीश्वर ! तुम वही उपाय कहो जिससे चित्तरूपी शत्रु को जीतूँ । अब मुझको किसी भोग की इच्छा नहीं और जगत् की लक्ष्मी मुझको विरस भासती है । जैसे चन्द्रमा बादल की इच्छा नहीं करता पर चतुरमास में आच्छादित हो जाता है वैसे ही मैं भोग की इच्छा नहीं करता और जगत् की लक्ष्मी भी नहीं चाहता पर मेरा चित्त ही मेरा परमशत्रु है । महापुरुष जब इसके जीतने का यत्न करते हैं तब परमपद पाते हैं, इससे मुझे वही उपाय कहो जिससे मन को जीतूँ जैसे पर्वत पर के वन पर्वत के आश्रय में रहते हैं वैसे ही सब दुःख इसके आश्रय से रहते हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे चित्तदौरात्म्य- वर्णनन्नामैकादशन्सर्गः ॥ ११ ॥
श्रीरामजी बोले कि हे ब्राह्मण ! चेतनरूपी आकाश में तृष्णारूपी रात्रि आई है और उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोहादिक उल्लू विचरते हैं । जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय हो तब तृष्णारूपी रात्रि का अभाव हो जावे और जब रात्रि नष्ट हो तब मोहादिक उलूक भी नष्ट हों । जैसे जब सूर्य उदय होता है तब बरफ़ उष्ण हो पिघल जाती है वैसे ही सन्तोषरूपी रसको तृष्णारूपी उष्णता पिघला देती है । आत्मपद से शून्य चित्त भयानक वन है, उसमें तृष्णारूपी पिशाचिनी मोहादिक परिवार को अपने साथ लिये फिरती रहती है और प्रसन्न होती है । हे मुनीश्वर ! चित्तरूपी पर्वत है उस
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के आश्रय तृष्णारूपी नदी का प्रवाह चलता है और नाना प्रकार के सङ्कल्परूपी तरङ्ग को फैलाता है। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है वैसे ही तृष्णारूपी मोर भोगरूपी मेघ को देखकर प्रसन्न होता है इससे सब दुःखों का मूल तृष्णा है। जब में किसी सन्तोषादि गुण का आश्रय करता हूँ तब तृष्णा उसको नष्ट कर देता है। जैसे सुन्दर सारङ्गी को चूहा काट डालता है। वैसे ही सन्तोषादि गुणों को तृष्णा नष्ट करती है। हे मुनीश्वर ! सबसे उत्कृष्ट पद में बिराजने का मैं यत्न करता हूँ पर तृष्णा मुझे बिराजने नहीं देती। जैसे जाल में फँसा हुआ पक्षी आकाश में उड़ने का यत्न करता है परन्तु उड़ नहीं सकता वैसे ही अनात्म से आत्मपद को प्राप्त नहीं हो सकता। स्त्री, पुरुष, पुत्र और कुटुम्ब का उसने जाल बिछाया है उसमें फँसा हूँ निकल नहीं सकता। और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ कभी ऊर्ध्व को जाता हूँ कभी अधःपात होता हूँ, घटीयन्त्र की नाईं मेरी गति है। जैसे इन्द्र का धनुष मलीन मेघ में बड़ा और बहुत रङ्गों से भरा होता है परन्तु मध्य में शून्य है वैसे ही तृष्णा मलीन अन्तःकरण में होती है सो बढ़ी हुई है और सद्गुणों से रहित है। यह ऊपर से देखने मात्र सुन्दर है परन्तु इससे कुछ कार्य नहीं सिद्ध होता। हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी मेघ है उसमें दुःखरूपी बूँदें निकलती हैं और तृष्णारूपी काली नागिन है उसका स्पर्श तो कोमल है परन्तु विष से पूर्ण है उसके डसने से मृतक हो जाता है। तृष्णारूपी बादल है सो आत्मारूपी सूर्य के आगे आवरण करता है। जब ज्ञानरूपी पवन चले तब तृष्णारूपी बादल का नाश होकर आत्मपद का साक्षात्कार हो। ज्ञानरूपी कमल को सङ्कोच करनेवाली तृष्णारूपी निशा है । उस तृष्णारूपी महाभयानक कालीरात्रि में बड़े धीरवान भी भयभीत होते हैं और नयनवालों को भी अन्धा कर डालती है। जब यह आती है तब वैराग्य और अभ्यासरूपी नेत्र को अन्धा कर डालती। अर्थात सत्य असत्य विचारने नहीं देती। हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी डाकिनी है वह सन्तोषादिक गुणों को मार डालती है। तृष्णारूपी कन्दर है उसमें मोहरूपी उन्मत्त हाथी गरजते हैं। तृष्णारूपी समुद्र है उसमें आपदारूपी नदी आकर प्रवेश करती है इससे वही उपाय