भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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वैराग्य प्रकरण । २५

हैं उनमें जो आस्था करते हैं वह महामूर्ख है मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि सब आगमापायी हैं अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं। इसमें जिस पदार्थ का नाश न हो वही पदार्थ पाने योग्य है इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है। हे मुनीश्वर ! जितने सम्पदारूप पदार्थ भासते हैं वह सब आपदा हैं; इनमें रञ्चक भी सुख नहीं। जब इनका वियोग होता है तब कण्टक की नाईं मन में चुभते हैं। जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं तब जीव राग द्वेष में जलता है और जब नहीं प्राप्त होते तब तृष्णा में जलता है-इससे भोग दुःखरूप ही हैं। जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता वैसे ही भोगरूपी दुःख की शिला में सुखरूप छिद्र नहीं होता। हे मुनीश्वर ! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ। जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो तो धुवाँ हो थोड़ा थोड़ा जलता रहता है। वैसे ही भोगरूपी अग्नि से मन जलता रहता है। विषयों में कुछ भी सुख नहीं है दुःख बहुत हैं, इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है। जैसे खाड के ऊपर तृण और पात होते हैं और उससे खाई आच्छा- दित हो जाती है उसको देख हरिण कूदकर दुःख पाता है वैसे ही मूर्ख भोग को सुखरूप जानकर भोगने की इच्छा करता है और जब भोगता है तब जन्म से जन्मान्तररूपी खाईं में जा पड़ता है और दुःख पाता है। हे मुनीश्वर ! भोगरूपी चोर अज्ञानरूपी रात्रि में आत्मारूपी धन लूट ले जाता है, पर उसके वियोग से जीव महादीन रहता है। जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है वह दुःखरूप है। उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है वह शरीर क्षणभंगुर और असार है। जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है वह मूर्ख और जड़ है। उसका बोलना और चलना भी ऐसा है जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है और उसके वेग से शब्द होता है। जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता वैसे ही दुःख जानकर में भोग की इच्छा नहीं करता। लक्ष्मी भी परम अनर्थ- कारी है जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती तब तक उसके पाने का यत्न होता है और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है जब लक्ष्मी प्राप्ति हुई तब तब