योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
वैराग्य प्रकरण । २५
हैं उनमें जो आस्था करते हैं वह महामूर्ख है मैं विचार करके ऐसा जानता हूँ कि सब आगमापायी हैं अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं। इसमें जिस पदार्थ का नाश न हो वही पदार्थ पाने योग्य है इसी कारण मैंने भोगों को त्याग दिया है। हे मुनीश्वर ! जितने सम्पदारूप पदार्थ भासते हैं वह सब आपदा हैं; इनमें रञ्चक भी सुख नहीं। जब इनका वियोग होता है तब कण्टक की नाईं मन में चुभते हैं। जब इन्द्रियों को भोग प्राप्त होते हैं तब जीव राग द्वेष में जलता है और जब नहीं प्राप्त होते तब तृष्णा में जलता है-इससे भोग दुःखरूप ही हैं। जैसे पत्थर की शिला में छिद्र नहीं होता वैसे ही भोगरूपी दुःख की शिला में सुखरूप छिद्र नहीं होता। हे मुनीश्वर ! मैं विषय की तृष्णा में बहुत काल से जलता रहा हूँ। जैसे हरे वृक्ष के छिद्र में अग्नि धरी हो तो धुवाँ हो थोड़ा थोड़ा जलता रहता है। वैसे ही भोगरूपी अग्नि से मन जलता रहता है। विषयों में कुछ भी सुख नहीं है दुःख बहुत हैं, इससे इनकी इच्छा करनी मूर्खता है। जैसे खाड के ऊपर तृण और पात होते हैं और उससे खाई आच्छा- दित हो जाती है उसको देख हरिण कूदकर दुःख पाता है वैसे ही मूर्ख भोग को सुखरूप जानकर भोगने की इच्छा करता है और जब भोगता है तब जन्म से जन्मान्तररूपी खाईं में जा पड़ता है और दुःख पाता है। हे मुनीश्वर ! भोगरूपी चोर अज्ञानरूपी रात्रि में आत्मारूपी धन लूट ले जाता है, पर उसके वियोग से जीव महादीन रहता है। जिस भोग के निमित्त यह यत्न करता है वह दुःखरूप है। उससे शान्ति प्राप्त नहीं होती और जिस शरीर का अभिमान करके यह यत्न करता है वह शरीर क्षणभंगुर और असार है। जिस पुरुष को सदा भोग की इच्छा रहती है वह मूर्ख और जड़ है। उसका बोलना और चलना भी ऐसा है जैसे सूखे बाँस के छिद्र में पवन जाता है और उसके वेग से शब्द होता है। जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़ के मार्ग की इच्छा नहीं करता वैसे ही दुःख जानकर में भोग की इच्छा नहीं करता। लक्ष्मी भी परम अनर्थ- कारी है जब तक इसकी प्राप्ति नहीं होती तब तक उसके पाने का यत्न होता है और यह अनर्थ करके प्राप्त होती है जब लक्ष्मी प्राप्ति हुई तब तब
२६ योगवाशिष्ठ ।
सदगुण अर्थात् शीलता, सन्तोष, धर्म, उदारता, कोमलता, वैराग्य विचार दयादिक का नाश कर देती है । जब ऐसे गुणों का नाश हुआ तब सुख कहाँ से हो, तब तो परम आपदा ही प्राप्त होती है । इसको परमदुःख का कारण जानकर मैंने त्याग दिया है । हे मुनीश्वर ! इस जीव में गुण तबतक हैं जब तक लक्ष्मी नहीं प्राप्त हुई । जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब सब गुण नष्ट हो जाते हैं । जैसे बसन्त ऋतु की मञ्जरी तब तक हरी रहती है जब तक ज्येष्ठ आषाढ़ नहीं आता और जब ज्येष्ठ आषाढ़ आया तब मञ्जरी जल जाती है वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब शुभ गुण जल जाते हैं । मधुर वचन तभी तक बोलता है जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं है और जब लक्ष्मी की प्राप्ति हुई तब कोमलता का अभाव होकर कठोर हो जाता है। जैसे जल पतला तब तक रहता है जब तक शीतलता का संयोग नहीं हुआ और जब शीतलता का संयोग होता है तब बर्फ होकर कठोर दुःखदायक हो जाता है; वैसे यह जीव लक्ष्मी से जड़ हो जाता है । हे मुनीश्वर ! जो कुछ सम्पदा है वह आपदा का मूल है, क्योंकि जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तब बड़े बड़े सुख भोगता है और जब उसका अभाव होता है तब तृष्णा से जलता है और जन्म से जन्मान्तर पाता है । लक्ष्मी की इच्छा करना ही मूर्खता है । यह तो क्षणभंगुर है, इसमें भोग उपजते और नष्ट होते हैं । जैसे जल से तरंग उपजते और मिट जाते हैं और जैसे बिजली स्थिर नहीं होती वैसे ही भोग भी स्थिर नहीं रहते । पुरुष में शुभ गुण तब तक हैं जब तक तृष्णा का स्पर्श नहीं और जब तृष्णा हुई तब गुणों का अभाव हो जाता है । जैसे दूध में मधुरता तब तक है जब तक उसे सर्प ने स्पर्श नहीं किया और जब सर्प न स्पर्श किया तब वही दूध विषरूप हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणेरामेणैवंराघववर्णनन्नामसप्तमसर्गः ॥७॥
श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! लक्ष्मी देखने मात्र ही सुन्दर है । जब इसकी प्राप्ति होती है तब सद्गुणों का नाश कर देती है । जैसे विष की बेल देखने मात्र ही सुन्दर होती है और स्पर्श करने से मार डालती है वैसे ही लक्ष्मी की प्राप्ति होने से जीव आत्मपद से वंचित हो महादीन
वैराग्य प्रकरण । <p align="right">२७</p>
हो जाता है । जैसे किसी के घर में चिन्तामणि दबी हो तो उसको जब तक खोदकर वह नहीं लेता तब तक दरिद्री रहता है वैसे ही (अज्ञान से) ज्ञान बिना महादीन हो रहता है और आत्मानन्द को नहीं पा सकता । आत्मानन्द में विघ्न करनेवाली लक्ष्मी है इसकी प्राप्ति से जीव अन्धा हो जाता है । हे मुनीश्वर ! जब दीपक प्रज्वलित होता है तब उसका बड़ा प्रकाश दृष्टि आता है और जब बुझ जाता है तब प्रकाश का अभाव हो जाता है पर काजल रह जाना है; वैसे ही जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तब बड़े भोग भुगाती है और तृष्णारूपी काजल उससे उपजता रहता है और जब लक्ष्मी का अभाव होता है तब तृष्णारूप वासना छोड़ जाती है । उस वासना (तृष्णा) से अनेक जन्म और मरण पाता है, कभी शान्ति नहीं पाता । हे मुनीश्वर ! जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, तब शान्ति के उपजानेवाले गुणों का नाश करती है । जैसे जब तक पवन नहीं चलता तब तक मेघ रहता है और जब पवन चलता है तो मेघ का अभाव हो जाता है वैसे ही लक्ष्मीजी की प्राप्ति होने से गुणों का अभाव होता है और गर्व की उत्पत्ति होती है । हे मुनीश्वर ! जो शूर होकर अपने मुख से अपनी बड़ाई न करे सो दुर्लभ है और सामर्थ्यवान् हो किसी की अवज्ञा न करे सब में समबुद्धि रखे सो भी दुर्लभ है वैसे ही लक्ष्मीवान् होकर शुभ गुण संयुक्त हो सो भी दुर्लभ है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी सर्प के विष के बढ़ाने को लक्ष्मीरूपी दूध है उसे पीते, पवनरूपी भोग के आहार करते कभी नहीं अघाता । महामोहरूपी उन्मत्त हस्ती है उसके फिरने का स्थान पर्वत की अटवीरूपी लक्ष्मी है और सद्गुणरूप सूर्यमुखी कमल की लक्ष्मी रात्रि है और भोगरूपी चन्द्रमुखी कमलों की लक्ष्मी चन्द्रमा है और वैराग्यरूप कमलिनी का नाश करनेवाली लक्ष्मी बरफ है और ज्ञानरूपी चन्द्रमा का आच्छादन करनेवाली लक्ष्मी राहु है और मोहरूप उलूक की लक्ष्मी मानो रात्रि है । दुःखरूप बिजली को लक्ष्मी आकाश है और तृणारूपी बेलि को बढ़ानेवाली लक्ष्मी मेघ है । तृष्णारूप तरंग को लक्ष्मी समुद्र है, तृष्णारूप भँवर को लक्ष्मी कमलिनी है और जन्म के दुःखरूप जल का लक्ष्मी
२८ योगवाशिष्ठ ।
गड्ढा है। हे मुनीश्वर ! देखने में यह सुन्दर लगती है । यह दुख का कारण है । जैसे खड्ग की धार देखने में सुन्दर होती है और स्पर्श करने से नाश करती है वैसे ही यह लक्ष्मी विचाररूपी मेघ का नाश करने को वायु है। हे मुनीश्वर ! यह मैंने विचार करके देखा है कि इसमें कुछ भी सुख नहीं । सन्तोपरूपी मेघ का नाश करनेवाली लक्ष्मी शरत्काल है । मनुष्य में गुण तक दृष्टि आते हैं जब तक लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती जब लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तब शुभ गुण नष्ट हो जाते हैं । हे मुनीश्वर ! लक्ष्मी को ऐसी दुःखदायक जानकर इसकी इच्छा मैंने त्याग दी है । यह भोग मिथ्या है जैसे बिजली प्रकट होकर छिप जाती है वैसे ही लक्ष्मी भी प्रकट होकर छिप जाती है । जैसे ही जल शीतलता से हिम होता है वैसे ही लक्ष्मी मनुष्य को जड़ सा बना देती है । इसको जलरूप जान कर मैंने त्याग दिया है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे लक्ष्मीनैराश्य- वर्णनन्नामाष्टमसर्गः ॥ ८ ॥
रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! जैसे कमलपत्र के ऊपर जल की बूंद नहीं ठहरतीं वैसे ही लक्ष्मी भी क्षण भंगुर है । जैसे जल से तरंग होकर नष्ट होती है वैसे ही लक्ष्मी वृद्धि होकर नष्ट हो जाती है । हे मुनीश्वर ! पवन को रोकना कठिन है पर उसे भी कोई रोकता है और आकाश का चूर्ण करना अति कठिन है उसे भी कोई चूर्ण कर डालता है और बिजली का रोकना अति कठिन है सो उसे भी कोई रोकता है, परन्तु लक्ष्मी को कोई स्थिर नहीं रख सकता । जैसे शश की सींगों से कोई मार नहीं सकता और आरसी के ऊपर जैसे मोती नहीं ठहरता, जैसे तरंग की गाँठ नहीं पड़ती वैसे ही लक्ष्मी भी स्थिर नहीं रहती । लक्ष्मी बिजली की चमक सी है सो होती है और मिट भी जाती है । जो लक्ष्मी पाकर अमर होना चाहे उसे अति मूर्ख जानना और लक्ष्मी पाकर जो भोग की वाञ्छा करता है वह महा आपदा का पात्र है । उसका जीने से मरना श्रेष्ठ है । जीने की आशा मूर्ख करते हैं । जैसे स्त्री गर्भ की इच्छा अपने दुःख के निमित्त करती है वैसे ही जीने की आशा पुरुष
वैराग्य प्रकरण । २५
अपने नाश के निमित्त करते हैं। ज्ञानवान् पुरुष जिनकी परमपद में स्थिति है और उससे तृप्त हुए हैं, उनका जीना सुख के निमित्त है। उनके जीने से और के कार्य भी सिद्ध होते हैं। उनका जीना चिन्तामणि की नाईं श्रेष्ठ है। जिनको सदा भोग की इच्छा रहती है और आत्मपद से विमुख हैं उनका जीना किसी के सुख के निमित्त नहीं है वह मनुष्य नहीं गर्दभ है। जैसे वृक्ष पत्ती पशु का जीना है वैसे उनका भी जीना है। हे मुनीश्वर ! जो पुरुष शास्त्र पढ़ता है और उसने पाने योग्य पद नहीं पाया तो शास्त्र उसको भाररूप है। जैसे और भार होता है वैसे ही पढ़ने का भी भार है और जो पढ़कर विवाद करते हैं और उसके सार को नहीं ग्रहण करते वह भी भार है। हे मुनीश्वर ! यह मन आकाशरूप है। जो मन में शान्ति न आई तो मन भी उसको भार है और जो मनुष्य शरीर को पाकर उसका अभिमान नहीं त्यागता तो यह शरीर पाना भी उसका निष्फल है। इसका जीना तभी श्रेष्ठ है जब आत्मपद को पावे अन्यथा जीना व्यर्थ है। आत्मपद की प्राप्ति अभ्यास से होती है। जैसे जल पृथ्वी खोदने से निकलता है वैसे ही आत्मपद की प्राप्ति भी अभ्यास से होती है ! जो आत्मपद से विमुख होकर आशा की फाँसी में फँसे हैं वे संसार में भटकते रहते हैं। हे मुनीश्वर ! जैसे सागर में तरङ्ग अनेक उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं वैसे ही यह लक्ष्मी भी क्षणभंगुर है। इसको पाकर जो अभिमान करता है सो मूर्ख है। जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ने के लिये पड़ी रहती है। वैसे ही लक्ष्मी उनको नरक में डालने के लिये घर में पड़ी रहती है। जैसे अञ्जली में जल नहीं ठहरता वैसे ही लक्ष्मी भी नहीं ठहरती। ऐसी क्षणभंगुर लक्ष्मी और शरीर को पाकर जो भोग की तृष्णा करता है वह महामूर्ख है। वह मृत्यु के मुख में पड़ा हुआ जीने की आशा करता है। जैसे सर्प के मुख में मूर्ख मेढक पड़कर मच्छर खाने की इच्छा करता है वैसे ही जो जीव मृत्यु के मुख में पड़ा हुआ भोग की वाञ्छा करता है वह महामूर्ख है। जब युवा अवस्था नदी के प्रवाह की नाईं चली जाती है तब वृद्धावस्था आती है। उसमें महादुःख प्रकट होते हैं और
३० योगवाशिष्ट ।
शरीर जर्जर हो जाता है और मरता है। निदान एक क्षण भी मृत्यु इसको नहीं बिसारती। जैसे कामी पुरुष को सुन्दर स्त्री मिलती है तो उसके देखने का त्याग नहीं करता वैसे ही मृत्यु मनुष्य के देखे बिना नहीं रहती। हे मुनीश्वर ! मूर्ख पुरुष का जीना दुःख के निमित्त है। जैसे वृद्ध मनुष्य का जीना दुःख का कारण है वैसे ही अज्ञानी का जीना दुःख का कारण है। उसके बहुत जीने से मरना श्रेष्ठ है। जिस पुरुष ने मनुष्यशरीर पाकर आत्मपद पाने का यत्न नहीं किया उसने अपना आप नाश किया और वह आत्महत्यारा है। हे मुनीश्वर ! यह माया बहुत सुन्दर भासती है पर अन्त में नष्ट हो जाती है। जैसे काठ को भीतर से घुन खा जाता है और बाहर से बहुत सुन्दर दीखता है वैसे ही यह जीव बाहर से सुन्दर दृष्टि आता है और भीतर से उसको तृष्णा खा जाती है। जो मनुष्य पदार्थ को सत्य और सुखरूप जानकर सुख के निमित्त आश्रय करता है वह सुखी नहीं होता है। जैसे कोई नदी में सर्प को पकड़के पार उतरा चाहे तो पार नहीं उतर सकता, मूर्खता से डूबेगा, वैसे ही जो संसार के पदार्थों को सुखरूप जानकर आश्रय करता है सो सुख नहीं पाता, संसारसमुद्र में डूब जाता है। हे मुनीश्वर ! यह संसार इन्द्रधनुष की नाईं है। जैसे इन्द्रधनुष बहुत रङ्ग का दृष्टि आता है और उससे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता वैसे ही यह संसार भ्रम-मात्र है; इसमें सुख की इच्छा रखनी व्यर्थ है। इस प्रकार जगत् को मैंने असतरूप जानकर निर्वासनिक होने की इच्छा की है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्यप्रकरणे संसारसुखनिषेध-वर्णनन्नाम नवमस्सर्गः ॥ ९ ॥
श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! अहङ्कार अज्ञान से उदय हुआ है। यह महादुष्ट है और वहाँ परम शत्रु है। इसने मुझको दबा डाला है पर मिथ्या है और सब दुःखों की खानि है। जब तक अहङ्कार है तब तक पीड़ा की उत्पत्ति का अभाव कदाचित नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जो कुछ मैंने अहङ्कार से भजन और पुण्य किया, जो कुछ लिया दिया और जो कुछ किया वह सब व्यर्थ है। इससे परमार्थ की कुछ सिद्धि नहीं है।
वैराग्य प्रकरण । ३१
जैसे राख में आहुति धरी व्यर्थ हो जाती है वैसे ही मैं इसे जानता हूँ। जितने दुःख हैं उनका बीज अहङ्कार है। जब इसका नाश हो तब कल्याण हो। इससे आप उसकी निवृत्ति का उपाय कहिए। हे मुनीश्वर ! जो वस्तु मत्य है इसके त्याग करने में दुःख होता है और जो वस्तु नाशवान् है और भ्रम से दीखती है उसके त्याग करने में आनन्द है। शान्तिरूप चन्द्रमा के आच्छादन करने को अहङ्काररूपी राहु है। जब राहु चन्द्रमा को ग्रहण करता है तब उसकी शीतलता और प्रकाश ढक जाता है वैसे ही जब अहङ्कार बढ़ जाता है तब समता ढक जाती है। जब अहङ्काररूपी मेघ गरजके वर्षता है तब तृष्णारूपी कण्टकमञ्जरी बढ़ जाती है और कभी नहीं घटती। जब अहङ्कार का नाश हो तब तृष्णा का अभाव हो। जैसे जब तक मेघ है तब तक बिजली है; जब विवेक-रूपी पवन चले तब अहङ्काररूपी मेघ का अभाव होकर तृष्णारूपी बिजली नष्ट हो जाती है और जैसे जब तक तेल और बाती है तब तक दीपक का प्रकाश है जब तेल बाती का नाश होता है तब दीपक का प्रकाश भी नष्ट हो जाता है वैसे ही जब अहङ्कार का नाश हो तब तृष्णा का भी नाश होता है। हे मुनीश्वर ! परम दुःख का कारण अहङ्कार है। जब अहङ्कार का नाश हो तब दुःख का भी नाश हो जाय। हे मुनीश्वर ! यह जो मैं राम हूँ सो नहीं और इच्छा भी कुछ नहीं, क्योंकि मैं नहीं तो इच्छा किसको हो ? और इच्छा हो तो यही हो कि अहङ्कार से रहित पदकी प्राप्ति हो। जैसे जनेन्द्र को अहङ्कार का उत्थान नहीं हुआ वैसा मैं होऊँ ऐसी मुझको इच्छा है। हे मुनीश्वर ! जैसे कमल को बरफ नष्ट करता है वैसे ही अहङ्कार ज्ञान का नाश करता है। जैसे व्याध जाल से पक्षी को फँसाता है और उससे पक्षी दीन हो जाते हैं वैसे ही अहङ्काररूपी व्याधने तृष्णारूपी जाल डालकर जीवों को फँसाया है उससे वह महादीन हो गये हैं जैसे पक्षी अन्न के दाने सुख रूप जानकर चुगने आता है फिर चुगते चुगते जाल में फँस बन्धन से दीन हो जाता है वैसे ही यह जीव विषयभोग की इच्छा करने से तृष्णा-रूपी जाल में फँसकर महादीन हो जाता है। इससे हे मुनीश्वर ! मुझसे
३२ योगवाशिष्ट ।
वही उपाय कहिये जिससे अहङ्कार का नाश हो । जब अहङ्कार का नाश होगा तब मैं परमसुखी हूँगा । जैसे विन्ध्याचल पर्वत के आश्रय में उन्मत्त हस्ती गर्जते हैं वैसे ही अहङ्काररूपी विन्ध्याचल पर्वत के आश्रय में मनरूपी उन्मत्त हस्ती नाना प्रकार के सङ्कल्प विकल्परूपी शब्द करता है । इससे आप वही उपाय कहिये जिससे अहङ्कार का नाश हो जो कल्याण का मूल है । जैसे मेघ का नाश करनेवाला शरत्काल है वैसे ही वैराग्य का नाश करनेवाला अहङ्कार है । मोहादिक विकाररूप सर्पों के रहने का अहङ्काररूपी बिल है और वह कामी पुरुषों की नाईं है । जैसे कामी पुरुष काम को भोगता है और फूल की माला गले में डालकर प्रसन्न होता है वैसे ही तृष्णारूपी तागा है और मनरूपी फूल है सो तृष्णारूपी तागे के साथ गुहे हैं सो अहङ्काररूपी कामी पुरुष उनको गले में डालता है और प्रसन्न होता है । हे मुनीश्वर ! आत्मारूपी सूर्य है उसका आवरण करनेवाला मेघरूपी अहङ्कार है । जब ज्ञानरूपी शरत्काल आता है तब अहङ्काररूपी मेघ का नाश हो जाता है और तृष्णारूपी तुषार का भी नाश होता है । हे मुनीश्वर ! यह निश्चय कर मैंने देखा है कि जहाँ अहङ्कार है वहाँ सब आपदाएँ आकर प्राप्त होती हैं जैसे समुद्र में सब नदी आकर प्राप्त होती हैं वैसे ही अहङ्कार में सब आपदाओं की प्राप्ति होती है । इससे आप वही उपाय कहिये जिससे अहङ्कार का नाश हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्य प्रकरणे अहङ्कारदुर्दशावर्णनन्नाम दशमस्सर्गः ॥ १० ॥
श्रीरामजी बोले हे मुनीश्वर ! मेरा चित्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णादिक दुःख से जर्जरीभूत हो गया है और महापुरुषों के गुण जो वैराग्य, विचार, धैर्य और सन्तोष हैं उनकी ओर नहीं जाता—सर्वदा विषय की गरद में उड़ता है । जैसे मोर का पंख पवन में नहीं ठहरता वैसे ही यह चित्त सर्वदा भटका फिरता है पर कुछ लाभ नहीं होता । जैसे श्वान द्वार द्वार पर भटकता फिरता है वैसे ही यह चित्त पदार्थों के पाने के निमित्त भटकता फिरता है पर प्राप्त कुछ नहीं होता और जो कुछ प्राप्त होता है उसमें तृप्त नहीं होता बल्कि अन्तःकरण में तृष्णा बनी
वैराग्य प्रकरण । ३३
रहती है जैसे पिटारे में जल भरिये तो वह पूर्ण नहीं होता, क्योंकि छिद्रों से जल निकल जाता है और पिटारा शून्य का शून्य रहता है वैसे ही चित्त भोग और पदार्थों में संतुष्ट नहीं होता सदा तृष्णा ही रहती है। हे मुनीश्वर ! यह चित्तरूपी महामोह का समुद्र है; उसमें तृष्णारूपी तरंगें उठती ही रहती हैं, कभी स्थिर नहीं होतीं। जैसे समुद्र में तीक्ष्ण तरंगों से तट के वृक्ष बह जाते हैं वैसे ही चित्तरूपी समुद्र में विषयी बह जाते हैं। वासनारूपी तरंग के वेग से मेरा अचल स्वभाव चलायमान हो गया है; इसलिए इस चित्त में मैं महादीन हुआ हूँ। जैसे जाल में पड़ा हुआ पक्षी दीन हो जाता है वैसे ही चित्तरूपी धीवर के वासनारूपी जाल में बँधा हुआ मैं दीन हो गया हूँ। जैसे मृग के समूह से भूली मृगी अकेली खेदवान् होती है वैसे ही मैं आत्मपद से भूला हुआ खेदवान् हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! यह चित्त सदा क्षोभ-वान् रहता है, कभी स्थिर नहीं होता। जैसे क्षीरसमुद्र मन्दराचल से क्षोभवान् हुआ था वैसे ही यह चित्त संकल्प-विकल्प से खेद पाता है। जैसे पिंजरे में आया सिंह पिंजरे ही में फिरता है वैसे ही वासना में आयाचित्त स्थिर नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जैसे भारी पवन से सूखा तृण दूर से दूर जा पड़ता है वैसे ही इस चित्तरूपी पवन ने मुझको आत्मानन्द से दूर फेंका है जैसे सूखे तृण को अग्नि जलाती है वैसे ही मुझको चित्त जलाता है। जैसे अग्नि से धूम निकलता है वैसे ही चित्तरूपी अग्नि से तृष्णारूपी धूम निकलता है उसमे में परमदुःख पाता हूँ। यह चित्त हंस नहीं बनता। जैसे राजहंस मिले हुए दूध और जल को भिन्न भिन्न करता है उसकी नाईं मैं अनात्मा से अज्ञान के कारण एक हो गया हूँ, उसको भिन्न नहीं कर सकता और जब आत्मपद पाने का यत्न करता हूँ तब अज्ञान उसे प्राप्त नहीं करने देता। जैसे नदी का प्रवाह समुद्र में जाना है उसको पहाड़ सीधे नहीं चलने देता और समुद्र की ओर नहीं जाने देता वैसे ही मुझको चित्त आत्मा की ओर से रोकता है। वह परम शत्रु है। हे मुनीश्वर ! वही उपाय कहिये जिससे चित्तरूपी शत्रु का नाश हो। जैसे मृतक शरीर को श्वान खाते हैं वैसे
३४ | योगवाशिष्ठ ।
ही तृष्णा मुझे खा रही है। आत्मा के ज्ञान बिना में मृतक समान हूँ। जैसे बालक अपनी परछाहीं को बेताल मानकर भय पाता है और जब विचार करने में समर्थ होता है तब वेताल का भय नहीं होता वैसे ही चित्तरूपी वेताल ने मेरा स्पर्श किया है उससे में भय पाता हूँ। इसमें आप वही उपाय कहिये जिससे चित्तरूपी वेताल नष्ट हो जावे हे मुनीश्वर ! अज्ञान में मिथ्या वेताल चित्त में दृढ़ हो रहा है उसके नाश करने को मैं समर्थ नहीं हो सकता। अग्नि में बैठना, बड़े पर्वत के ऊपर जाना और वज्र का चूर्ण करना मैं सुगम मानता हूँ परन्तु चित का जीतना महाकठिन है। चित्त सदा ही चलायमान स्वभाववाला है। जैसे थम्भ से बाँधा हुआ वानर कभी स्थिर हो नहीं बैठता वैसे ही चित्त वासना के मारे कभी स्थिर नहीं होता। हे मुनीश्वर ! बड़े समुद्र का पान कर जाना, अग्नि का भक्षण करना और सुमेरु का उल्लंघन करना सुगम है, परन्तु चित्त का जीतना महाकठिन है जो सदा चलरूप है जैसे समुद्र अपना द्रवी स्वभाव कदाचित् नहीं त्यागता, महाद्रवीभूत रहता है और उसमें नाना प्रकार के तरंग उठते हैं वैसे ही चित्त भी चञ्चल स्वभाव को कभी नहीं त्यागता और नाना प्रकार की वासना उपजती रहती है। चित्त बालक की नाईं चञ्चल है, सदा विषय की ओर धावता है; कहीं-कहीं पदार्थ की प्राप्ति होती परन्तु भीतर सदा चञ्चल रहता है। जैसे सूर्य के उदय होने से दिन होता है और अस्त होने में दिन का नाश होता है, वैसे ही चित्त के उदय होने से त्रिलोकी की उत्पत्ति है और चित्त के लीन होने से जगत् भी लीन हो जाता है। हे मुनीश्वर ! चित्तरूपी समुद्र है, वासनारूपी जल है, उसमें छलरूपी सर्प जब जीव उसके निकट जाता है तब भोगरूपी सर्प उसको काटता है और तृष्णारूपी विष स्पर्श करता है उससे मरता है। हे मुनीश्वर ! भोग को सुखरूप जानकर चित्त दौड़ता है पर वह भोग दुःख का कारण है। जैसे तृण में आच्छादित खाई को देखकर मूर्ख मृग खाने दौड़ता है तो खाई में गिरकर दुःख पाता है वैसे ही चित्तरूपी मृग भोग को सुखरूप जानकर भोगने लगता है तब तृष्णा रूपी खाई में गिर पड़ता है और जन्म जन्मान्तर में दुःख भोगता रहता
वैराग्य प्रकरण । ३५
है । हे मुनीश्वर ! यह चित्त कभी-कभी बड़ा गम्भीर भी हो बैठता है । जैसे चील पक्षी आकाश में ऊँचे फिरता है पर जब पृथ्वी पर मांस देखता है तो वहाँ से पृथ्वी पर आकर मांस लेता है वैसे ही यह चित्त तब तक उदार है जब तक भोग नहीं देखता और जब विषय देखता है तब आसक्त हो विषय में गिर जाता है । यह चित्त वासनारूपी शय्या में सोया रहता है और आत्मपद की ओर नहीं जागता । मैं इस चित्त के जाल में पड़ गया हूँ । वह कैसा जाल है कि उसमें वासनारूपी सूत है, संसार की सत्यतारूपी गाँठ है और भोगरूपी चून है जिसको देखकर मैं फँसा हूँ और कभी पाताल में और कभी आकाश में वासनारूपी रस्सी से बँधा घटीयन्त्र की नाईं फिरता हूँ । इससे हे मुनीश्वर ! तुम वही उपाय कहो जिससे चित्तरूपी शत्रु को जीतूँ । अब मुझको किसी भोग की इच्छा नहीं और जगत् की लक्ष्मी मुझको विरस भासती है । जैसे चन्द्रमा बादल की इच्छा नहीं करता पर चतुरमास में आच्छादित हो जाता है वैसे ही मैं भोग की इच्छा नहीं करता और जगत् की लक्ष्मी भी नहीं चाहता पर मेरा चित्त ही मेरा परमशत्रु है । महापुरुष जब इसके जीतने का यत्न करते हैं तब परमपद पाते हैं, इससे मुझे वही उपाय कहो जिससे मन को जीतूँ जैसे पर्वत पर के वन पर्वत के आश्रय में रहते हैं वैसे ही सब दुःख इसके आश्रय से रहते हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे चित्तदौरात्म्य- वर्णनन्नामैकादशन्सर्गः ॥ ११ ॥
श्रीरामजी बोले कि हे ब्राह्मण ! चेतनरूपी आकाश में तृष्णारूपी रात्रि आई है और उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोहादिक उल्लू विचरते हैं । जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय हो तब तृष्णारूपी रात्रि का अभाव हो जावे और जब रात्रि नष्ट हो तब मोहादिक उलूक भी नष्ट हों । जैसे जब सूर्य उदय होता है तब बरफ़ उष्ण हो पिघल जाती है वैसे ही सन्तोषरूपी रसको तृष्णारूपी उष्णता पिघला देती है । आत्मपद से शून्य चित्त भयानक वन है, उसमें तृष्णारूपी पिशाचिनी मोहादिक परिवार को अपने साथ लिये फिरती रहती है और प्रसन्न होती है । हे मुनीश्वर ! चित्तरूपी पर्वत है उस
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के आश्रय तृष्णारूपी नदी का प्रवाह चलता है और नाना प्रकार के सङ्कल्परूपी तरङ्ग को फैलाता है। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है वैसे ही तृष्णारूपी मोर भोगरूपी मेघ को देखकर प्रसन्न होता है इससे सब दुःखों का मूल तृष्णा है। जब में किसी सन्तोषादि गुण का आश्रय करता हूँ तब तृष्णा उसको नष्ट कर देता है। जैसे सुन्दर सारङ्गी को चूहा काट डालता है। वैसे ही सन्तोषादि गुणों को तृष्णा नष्ट करती है। हे मुनीश्वर ! सबसे उत्कृष्ट पद में बिराजने का मैं यत्न करता हूँ पर तृष्णा मुझे बिराजने नहीं देती। जैसे जाल में फँसा हुआ पक्षी आकाश में उड़ने का यत्न करता है परन्तु उड़ नहीं सकता वैसे ही अनात्म से आत्मपद को प्राप्त नहीं हो सकता। स्त्री, पुरुष, पुत्र और कुटुम्ब का उसने जाल बिछाया है उसमें फँसा हूँ निकल नहीं सकता। और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ कभी ऊर्ध्व को जाता हूँ कभी अधःपात होता हूँ, घटीयन्त्र की नाईं मेरी गति है। जैसे इन्द्र का धनुष मलीन मेघ में बड़ा और बहुत रङ्गों से भरा होता है परन्तु मध्य में शून्य है वैसे ही तृष्णा मलीन अन्तःकरण में होती है सो बढ़ी हुई है और सद्गुणों से रहित है। यह ऊपर से देखने मात्र सुन्दर है परन्तु इससे कुछ कार्य नहीं सिद्ध होता। हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी मेघ है उसमें दुःखरूपी बूँदें निकलती हैं और तृष्णारूपी काली नागिन है उसका स्पर्श तो कोमल है परन्तु विष से पूर्ण है उसके डसने से मृतक हो जाता है। तृष्णारूपी बादल है सो आत्मारूपी सूर्य के आगे आवरण करता है। जब ज्ञानरूपी पवन चले तब तृष्णारूपी बादल का नाश होकर आत्मपद का साक्षात्कार हो। ज्ञानरूपी कमल को सङ्कोच करनेवाली तृष्णारूपी निशा है । उस तृष्णारूपी महाभयानक कालीरात्रि में बड़े धीरवान भी भयभीत होते हैं और नयनवालों को भी अन्धा कर डालती है। जब यह आती है तब वैराग्य और अभ्यासरूपी नेत्र को अन्धा कर डालती। अर्थात सत्य असत्य विचारने नहीं देती। हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी डाकिनी है वह सन्तोषादिक गुणों को मार डालती है। तृष्णारूपी कन्दर है उसमें मोहरूपी उन्मत्त हाथी गरजते हैं। तृष्णारूपी समुद्र है उसमें आपदारूपी नदी आकर प्रवेश करती है इससे वही उपाय
वैराग्य प्रकरण । ३७
मुझसे कहिये जिससे तृष्णारूपी दुःख से छूटूँ । हे मुनीश्वर ! अग्नि और खङ्ग के प्रहार और इन्द्र के वज्र से भी ऐसा दुःख नहीं होता जैसा दुःख तृष्णा से हो सो तृष्णा के प्रहार से घायल हुआ मैं बड़े दुःख को पाता हूँ और तृष्णारूपी दीपक जलता है उसमें सन्तोषादिक पतङ्ग जल जाते हैं । जैसे जल में मछली रहती है सो जल में कंकड़ रेत आदि को देख मांस जानकर मुख में लेती है उससे उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता वैसे ही तृष्णा भी जो कुछ पदार्थ देखती है उसके पास उड़ती है और तृप्ति किसी से नहीं होती । तृष्णारूपी एक पक्षिणी है सो इधर उधर उड़ जाती है और स्थिर कभी नहीं होती । तृष्णारूपी वानर है वह कभी किसी वृक्ष पर और कभी किसी के ऊपर जाता है स्थिर कहीं नहीं होता । जो पदार्थ नहीं प्राप्त होता उसके निमित्त यत्न करता है और भोग से तृप्त कदाचित् नहीं होता । जैसे घृत की आहुति से अग्नि तृप्त नहीं होती वैसे ही जो पदार्थ प्राप्त योग्य नहीं है उसकी ओर भी तृष्णा दौड़ती है शान्ति नहीं पाती । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी उन्मत्त नदी है वह बहे हुए पुरुष को कहाँ से कहाँ ले जाती है । कभी तो पहाड़ के बाजू में ले जाती और कभी दिशा में ले जाती है । तृष्णारूपी नदी है उसमें वासनारूपी अनेक तरंग उठते हैं कदाचित् मिटते नहीं । तृष्णारूपी नटिनी है और जगतरूपी अखाड़ा उसने लगाया है उसको शिर ऊँचा कर देखती और मूर्ख बड़े प्रसन्न होते हैं जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी कमल खिलकर ऊँचा होता है वैसे ही मूर्ख भी तृष्णा को देखकर प्रसन्न होता है । तृष्णारूपी वृद्ध स्त्री है जो पुरुष इसका त्याग करता है तो उसके पीछे लगी फिरती है कभी उसका त्याग नहीं करती । तृष्णारूपी डोर है उसके साथ जीव रूपी पशु बँधे हुए भ्रमते फिरते हैं । तृष्णा दृष्टिनी है जब शुभगुण देखती है तब उसको मार डालती है । उसके संयोग से मैं दीन होता हूँ । जैसे पपीहा मेघ को देखकर प्रसन्न होता है और बूँद ग्रहण करने लगता है और मेघ को जब पवन ले जाता है तब पपीहा दीन हो जाता है वैसे ही तृष्णा जब शुभ गुणों का नाश करती है तब मैं दीन हो जाता हूँ । हे मुनीश्वर ! जैसे सूखे तृण को पवन उड़ाकर दूर से दूर
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डालता है वैसे ही तृष्णारूपी पवन ने मुझको दूर में दूर डाल दिया है और आत्मपद से दूर पड़ा हूँ। हे मुनीश्वर ! जैसे भँवरा कमल के ऊपर और कभी नीचे बैठता है और कभी आस पास फिरता है स्थिर नहीं होता वैसे ही तृष्णारूपी भँवरा संसाररूपी कमल के नीचे ऊपर फिरता है कदाचित् नहीं ठहरता । जैसे मोती के बाँस में अनेक मोती निकलते हैं वैसे ही तृष्णारूपी बाँस में जगतरूपी अनेक मोती निकलते हैं उसमें लोभी का मन पूर्ण नहीं होता । तृष्णारूपी डब्बे में अनेक दुःखरूपी रत्न भरे हैं इससे आप वही उपाय कहिये जिससे तृष्णा निवृत्त हो । हे मुनीश्वर ! यह वैराग्य से निवृत्त होती है और किसी उपाय से नहीं निवृत्त होती । जैसे अन्धकार का प्रकाश में नाश होता है और किसी उपाय से नहीं होता वैसे ही तृष्णा का नाश और उपाय से नहीं होता । तृष्णारूपी हल गुणरूपी पृथ्वी को खोद डालता है और तृष्णारूपी बेलि गुणरूपी रस को पीती है । तृष्णारूपी धूलि है वह अन्तःकरणरूपी जल में उछल के मलीन करती है । हे मुनीश्वर ! जैसे वर्षाकाल में नदी बढ़ती है और फिर घट जाती है वैसे ही जब इष्ट भोगरूपी जल प्राप्त होता है तब हर्ष में बढ़ती है और जब वह जल घट जाता है तब सुख के क्षीण हो जाती है । हे मुनीश्वर ! इस तृष्णा ने मुझको दीन किया है । जैसे सूखे तृण को पवन उड़ा ले जाता है वैसे ही मुझको भी तृष्णा उड़ाती है । इसमें आप वही उपाय कहिये जिससे तृष्णा का नाश होकर आत्मपद की प्राप्ति हो और दुःखों का नाश होकर आनन्द हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे तृष्णागारूडीवर्णनन्नाम द्वादशस्सर्गः ॥ १२ ॥
श्रीरामजी बोले हे मुनीश्वर ! यह अमंगलरूप शरीर जो जगत् में उत्पन्न हुआ है बड़ा अभाग्यरूप है और सदा विकारवान् मांस मज्जा से पूर्ण और अपवित्र है । इसमें कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता इसलिये इस विकाररूप शरीर की मैं इच्छा नहीं रखता । यह शरीर न अज्ञ है और न तज्ञ है-अर्थात् न जड़ है और न चैतन्य है । जैसे अग्नि के संयोग में लोहा अग्निवत् होता है सो जलाता भी है परन्तु आप नहीं जलता वैसे
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ही यह देह न जड़ है न चैतन्य है। जड़ इस कारण नहीं है कि इसमें कार्य भी होता है और चैतन्य इस कारण नहीं कि इसको आपसे कुछ ज्ञान नहीं होता। इसलिये मध्यम भाव में है, क्योंकि चैतन्य आत्मा इसमें व्याप रहा है, पर आप तो अपवित्ररूप अस्थि, मांस, रुधिर मूत्र और विष्ठा से पूर्ण और विकारवान् है। ऐसी देह दुःख का स्थान है। इष्ट के पाने से हर्षवान् और अनिष्ट के पाने से शोकवान् होता है, इससे ऐसे शरीर की मुझको इच्छा नहीं। यह अज्ञान से उपजती है। हे मुनीश्वर ! ऐसे अमङ्गलरूपी शरीर में ही अहंपन फुरता है सो दुःख का कारण है। यह संसार में स्थित होकर नाना प्रकार के शब्द करता है। जैसे कोठरी में बैठा हुआ बिलाव नाना प्रकार के शब्द करता है वैसे ही अहंकाररूपी बिलाव देह में बैठा हुआ अहं अहं करता है चुप कदाचित् नहीं रहता। हे मुनीश्वर ! जो किसी के निमित्त शब्द हो वही सुन्दर है अन्यथा सब शब्द व्यर्थ हैं। जैसे जय के निमित्त ढोल का शब्द सुन्दर होता है वैसे ही अहंकार में रहित जो पद है वही शोभनीय है और सब व्यर्थ हैं। शरीररूपी नौका भोगरूपी रेत में पड़ी है, इसलिये इसका पार होना कठिन है। जब वैराग्यरूपी जल बढ़े और प्रवाह हो और अभ्यासरूपी पतवार का बल लगे तब संसार के पाररूपी किनारे पर पहुँचे। शरीररूपी बेड़ा है जो संसाररूपी समुद्र और तृष्णारूपी जल में पड़ा है, जिसका बड़ा प्रवाह है और भोगरूपी उसमें मगर हैं सो शरीररूपी बेड़े को पार नहीं लगने देते। जब शरीररूपी बेड़े को वैराग्यरूपी वायु और अभ्यासरूपी पतवार का बल लगे तब शरीररूपी बेड़ा पार हो। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने उपाय करके ऐसे बेड़े को संसार समुद्र से पार किया है वही सुखी हुआ है और जिसने नहीं किया वह परम आपदा को प्राप्त होता है, वह उस बेड़े से उलटा डूबेगा क्योंकि उस शरीररूपी बेड़े का तृष्णारूपी छिद्र है। उससे संसार समुद्र में डूब जाना है और भोगरूपी मगर इसको खा लेता है। यही आश्चर्य है कि देह अपना आप नहीं और मनुष्य मूर्खता करके आपकी देह मानता है और तृष्णारूपी छिद्र करके दुःख पाता है। शरीररूपी वृक्ष है उसमें भुजारूपी शाखा, उँगली पत्र, जंघा स्तम्भ, मांसरूपी अन्दर
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की भोगवासना उसकी जड़ और सुख दुःख इसके फल हैं । तृष्णारूपी घुन उस शरीररूपी वृक्ष को खाता रहता है जब उसमें श्वेत फूल लगे तो नाश का समय आता है अर्थात मृत्यु के निकटवर्ती होता है । शरीर रूपी वृक्ष की भुजारूपी शाखा हैं और हाथ पाँव पत्र हैं। टखने इसके गुच्छे और दाँत फूल हैं; जंघास्तम्भ हैं और कर्मजल में बढ़ जाता है। जैसे वृक्ष में जल चिकटा निकलता है वैसे ही जल शरीर के द्वारा निकलता रहता है । इसमें तृष्णारूपी विष में पूर्ण सर्पिणी रहती है जो कामना के लिए इस वृक्ष का आश्रय लेता है तो तृष्णारूपी सर्पिणी उसको डसती है और उस विष में वह मर जाता है । हे मुनीश्वर ! ऐसे अमङ्गलरूपी शरीर वृक्ष की इच्छा मुझको नहीं है । यह परम दुःख का कारण है । जब यह पुरुष अपने परिवार अर्थात् देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और उनमें जो अहंभाव है इसका त्याग करे तब मुक्ति हो अन्यथा मुक्ति नहीं होती । हे मुनीश्वर ! जो श्रेष्ठ पुरुष हैं वे पवित्र स्थान में ही रहते हैं अपवित्र में नहीं रहते । यह अपवित्र स्थान यह देह है और इसमें रहने वाला भी अपवित्र है । आस्थारूपी इस घर में ईंटें हैं रुधिर, मूत्र और विष्ठा का गारा लगा है और मांस की कहगिल की है । अहङ्काररूपी इसमें श्वपच रहता है, तृष्णारूपी श्वपचनी उसकी स्त्री और काम, क्रोध, मोह और लोभ इसके पुत्र हैं और आँतों और विष्ठादि से भरा हुआ है ऐसे अपवित्र स्थान अमङ्गलरूपी शरीर को मैं अङ्गीकार नहीं करता । यह शरीर रहे चाहे न रहे इसके साथ अब मुझे कुछ प्रयोजन नहीं । हे मुनीश्वर ! शरीररूपी बड़ा गृह है और उसमें इन्द्रियरूपी पशु हैं । जब कोई उस गृह में बैठता है तब बड़ी आपदा को प्राप्त होता है । तात्पर्य यह कि जो इसमें अहंभाव करता है तो इन्द्रियरूपी पशु विषयरूपी सींगों को मारते हैं और तृष्णारूपी धूलि उसको मलीन करती है । हे मुनीश्वर ! ऐसे शरीर का में अङ्गीकार नहीं करता जिसमें सदा कलह रहती है और ज्ञान-रूपी सम्पदा प्रवेश नहीं होती । शरीररूपी गृह में तृष्णारूपी चण्डी स्त्री रहती है; वह इन्द्रियरूपी द्वार में देखती रहती और सदा कल्पना करती रहती है उससे शम दमादिरूप सम्पदा का प्रवेश नहीं होता ।
वैराग्य प्रकरण । ४१
उस घर में एक सुषुप्तिरूप शय्या है जब उसके ऊपर वह विश्राम करता है तब वह कुछ सुख पाता है, परन्तु तृष्णा का परिवार अर्थात् काम, क्रोधादिक विश्राम नहीं करने देते । हे मुनीश्वर ! ऐसे दुःख के मूल शरीररूपी गृह की इच्छा मैंने त्याग दी है । यह परम दुःख देनेवाला है, इसकी इच्छा मुझको नहीं । हे मुनीश्वर ! शरीररूपी वृक्ष है उसमें तृष्णा रूपी काकिनी आकर स्थित हुई है । जैसे काकिनी नीच पदार्थ के पास उड़ती है वैसे ही तृष्णा भोग आदिक मलिन पदार्थों के पास उड़ती है । तृष्णा बन्दरी की नाईं शरीररूपी वृक्ष को हिलाती है; स्थिर नहीं होने देती । जैसे उन्मत्त हाथी कीच में फँस जाता है तब निकल नहीं सकता और खेदवान् होता है वैसे ही अज्ञानरूपी मद में उन्मत्त हुआ जीव शरीररूपी कीच में फँसा है सो निकल नहीं सकता, पड़ा हुआ दुःख पाता है । ऐसा दुःख देनेवाला शरीर है उसको में अङ्गीकार नहीं करता । हे मुनीश्वर ! यह शरीर अस्थि, मांस, रुधिर से पूर्ण अपवित्र है । जैसे हाथी के कान सदा हिलते हैं, वैसे ही मृत्यु इसको हिलाती है। कुछ काल का विलम्ब है मृत्यु इसका ग्रास कर लेवेगी; इससे में इस शरीर को अङ्गीकार नहीं करता हूँ । यह शरीर कृतघ्न है । भोग भुगताता है और बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त करता है, परन्तु मृत्यु इससे सम्भाषण नहीं करना । जीव इसको अकेला छोड़कर परलोक जाता है । जीव इसके सुख निमित्त अनेक यत्न करता है, परन्तु संग में सदा नहीं रहता । ऐसे कृतघ्न शरीर को मैंने मन से त्याग दिया है । हे मुनीश्वर ! और आश्चर्य देखिये कि यह इसी के लिये भोग करता है पर उसके साथ नहीं चलता । जैसे धूल से मार्ग नहीं भासता वैसे ही यह जीव जब चलने लगता है तब शरीर से क्षोभवान् होता और वासणारूपी धूलिसंयुक्त चलता है परन्तु दीखता नहीं कि कहाँ गया । जब परलोक जाता है तब बड़ा कष्ट होता है, क्योंकि शरीर के साथ इसने स्पर्श किया है । हे मुनीश्वर ! जैसे जल की बूँद पत्र के ऊपर क्षणमात्र रहती है वैसे ही शरीर भी क्षणभंग है। ऐसे शरीर में आस्था करनी मूर्खता है और ऐसे शरीर के ऊपर उपकार करना भी दुःख के निमित्त है सुख कुछ नहीं । अनाद्यन्त इस शरीर से बड़े भोग भोगते हैं और निर्धन थोड़े
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भोग भोगते हैं; परन्तु जरा अवस्था और मृत्यु दोनों को होती है, इसमें विशे- षता कुछ नहीं। शरीर का उपकार करना और भोग भुगतना तृष्णा के कारण उलटा दुःख का कारण है जैसे कोई नागिन को घर में रखकर दूध पिलावे तो अन्त में वह उसे काटकर मारेगी वैसे ही जिस जीव ने तृष्णा- रूपी नागिनी के साथ मित्रता की है वह मरेगा, क्योंकि नाशवन्त है। इसके निमित्त भोग भुगतने का यत्न करना मूर्खता है। जैसे पवन का वेग आता और जाता है वैसे ही यह शरीर भी आना और जाता है, इसमें प्रीति करना दुःख का कारण है। जैसे कोई विरला मृग मरुस्थल की आस्था त्यागता है और सब पड़े भ्रमते हैं वैसे ही सब जीव इसकी आस्था में बँधे हुए हैं, इसका त्याग कोई विरले ही ने किया है। हे मुनीश्वर ! बिजली और दीपक का प्रकाश भी आता जाता दीखता है; परन्तु इस शरीर का आदि अन्त नहीं दीखता कि कहाँ से आता है और कहाँ जाता है। जैसे समुद्र में बुद्बुदे उपजते और मिट जाते हैं उसकी आस्था करने में कुछ लाभ नहीं वैसे ही यह शरीर इसकी आस्था करना योग्य नहीं। यह अत्यन्त नाश- रूप है स्थिर कदाचित् नहीं होता है। जैसे बिजली स्थिर नहीं होती वैसे ही शरीर भी स्थिर नहीं रहता इसलिए इसकी में आस्था नहीं करता। इसका अभिमान मैंने त्याग दिया है। जैसे कोई सूखे तृण को त्याग देता है वैसे ही मैंने अहंममता त्यागी है। हे मुनीश्वर ! ऐसे शरीर को पुष्ट करना दुःख का निमित्त है। यह शरीर किसी अर्थ नहीं आता जलाने योग्य है। जैसे लकड़ी जलाने के सिवाय और काम में नहीं आती वैसे ही यह शरीर भी जड़ और गूँगा जलाने के अर्थ है। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने काष्ठ- रूपी शरीर को ज्ञानाग्नि से जलाया है उसका परम अर्थ सिद्ध हुआ है और जिसने नहीं जलाया उसने परम दुःख पाया है। हे मुनीश्वर ! न मैं शरीर हूँ, न मेरा शरीर है; न इसका में हूँ, न मेरा यह है; अब मुझको कामना कोई नहीं, मैं निराशी पुरुष हूँ और शरीर से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं इसलिये आप वही उपाय कहिये जिससे में परमपद पाऊँ। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने शरीर का अभिमान त्यागा है वह परमानन्दरूप है और जिसको देह का अभिमान है वह परम दुःखी है। जितने दुःख हैं
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वे शरीर के संयोग से होते हैं । मान-अपमान, जरा-मृत्यु, दम्भ-भ्रान्ति, मोह-शोक आदि सर्व विकार देह के संयोग से होते हैं जिनको देह में अभिमान है उनको धिक्कार है और सब आपदा भी उन्हीं को प्राप्त होती हैं। जैसे समुद्र में नदी प्रवेश करती है वैसे ही देहाभिमान में सर्व आपदा प्रवेश करती हैं। जिसको देह का अभिमान नहीं है वह मनुष्यों में उत्तम और वन्दना करने के योग्य है। ऐसे को मेरा भी नमस्कार है और सर्व सम्पदा भी उसी को प्राप्त होती हैं जैसे मानसरोवर में सब हंस आकर रहते हैं वैसे ही जहाँ देहाभिमान नहीं रहा वहाँ सर्व सम्पदा आ रहती हैं। हे मुनीश्वर ! जैसे अपनी छाया में बालक वेताल कल्पता है और उससे भय पाता है पर जब उसको विचार की प्राप्ति होती है तब वेताल का अभाव हो जाता है वैसे ही अज्ञान से मुझको अहङ्काररूपी पिशाच ने शरीर में दृढ़ आस्था बताई है। इसलिए आप वही उपाय कहिये जिससे अहङ्काररूपी पिशाच का नाश हो और आस्थारूपी फाँसी टूटे। हे मुनीश्वर ! प्रथम मुझको अज्ञान में अहङ्काररूपी पिशाच का संयोग था; उसके अनन्तर शरीर में आस्था उपजी जैसे बीज से प्रथम अंकुर होता है फिर अंकुर से वृक्ष होता है वैसे ही अहङ्कार से शरीर की आस्था होती है। हे मुनीश्वर ! जैसे बालक छाया में वेताल देखकर दीनता को प्राप्त होता है वैसे ही अहङ्काररूपी पिशाच ने मुझको दीन किया है। वह अहङ्काररूपी पिशाच अविचार से सिद्ध है। जैसे प्रकाश से अन्धकार नाश हो जाता है वैसे ही विचार करने से अहङ्कार नष्ट हो जाता है। हे मुनीश्वर ! जिस शरीर में आस्था रखी है वह जल के प्रवाह की नाईं है, स्थिर नहीं होता। जैसे बिजली का चमकना स्थिर नहीं और गन्धर्व नगरी की आस्था व्यर्थ है वैसे ही शरीर की आस्था करना व्यर्थ है। हे मुनीश्वर ! जो शरीर की आस्था करके अहङ्कार करते हैं और जगत के पदार्थों के निमित्त यत्न करते हैं वे महामूर्ख हैं। जैसे स्वप्न मिथ्या है वैसे ही यह जगत मिथ्या है। जो उसको सत्य जानता है वह अपने बन्धन के निमित्त यत्न करता है। जैसे बुराण अर्थात् कुम्हारी अपने बन्धन के निमित्त गुफा बनाती है और पतंग अपने नाश के निमित्त दीपक की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी को
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अपने देह का अभिमान और भोग की इच्छा अपने ही नाश के निमित्त है । हे मुनीश्वर ! मैं तो इस शरीर को अङ्गीकार नहीं करता । इस शरीर का अभिमान परम दुःख देनेवाला है जिसको देह का अभिमान नहीं रहा उसको भोग की इच्छा भी न रहेगी । इससे में निराश हूँ और मुझे परमपद की इच्छा है जिसके पाने से फिर संसारसमुद्र की प्राप्ति न हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे देहनैराश्य वर्णनन्नाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥
रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस जीव को संसारसमुद्र में जन्म पाकर प्रथम बाल अवस्था प्राप्त होती है वह भी परम दुःख का मूल है । उससे वह परम दीन हो जाता है और इतने अवगुण इसमें आ प्रवेश करते हैं अर्थात् अशक्तता, मूर्खता, इच्छा, चपलता, दीनता, दुःख, सन्ताप इतने विकार इसको प्राप्त होते हैं । यह बाल्यावस्था महाविकारवान् है । बालक पदार्थ की ओर धावता है और एक वस्तु का ग्रहणकर दूसरी को चाहता है स्थिर नहीं रहता, फिर और में लग जाता है । जैसे वानर स्थिर नहीं बैठता और जो किसी पर क्रोध करता है तो भीतर से जलता है । वह बड़ी बड़ी इच्छा करता है, पर उसकी प्राप्ति नहीं होती, सदा तृष्णा में रहता है और क्षण में भयभीत हो जाता है; शान्ति प्राप्त नहीं होती । जैसे कदली वन का हाथी जंजीर से बँधा हुआ दीन हो जाता है वैसे ही यह चैतन्य पुरुष बालक अवस्था में दीन हो जाता है । वह जो कुछ इच्छा करता है सो विचार बिना है, उसमे दुःख पाता है । यह मूढ़ रँगों अवस्था है उससे कुछ सिद्धि नहीं होती और जो किसी पदार्थ की प्राप्ति होती है तो उसमें क्षणमात्र सुखी रहता है फिर तपने लगता है । जैसे तपती पृथ्वी पर जल डालिये तो एक क्षण शीतल होती है फिर उसी प्रकार से तपती है वैसे ही यह भी तपता रहता है । जैसे रात्रि के अन्त में सूर्य उदय होता है उसमे उलकादि कष्टवान् होते हैं वैसे ही इस जीव को स्वरूप के अज्ञान से बाल्यावस्था में कष्ट होता है । हे मुनीश्वर ! जो बालक अवस्था की संगति करता है वह भी मूर्ख है, क्योंकि वह विवेकरहित अवस्था है और सदा अपवित्र है और सदा पदार्थ की ओर धावती है ।