योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९४ | योगवाशिष्ठ । |
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अपने देह का अभिमान और भोग की इच्छा अपने ही नाश के निमित्त है । हे मुनीश्वर ! मैं तो इस शरीर को अङ्गीकार नहीं करता । इस शरीर का अभिमान परम दुःख देनेवाला है जिसको देह का अभिमान नहीं रहा उसको भोग की इच्छा भी न रहेगी । इससे में निराश हूँ और मुझे परमपद की इच्छा है जिसके पाने से फिर संसारसमुद्र की प्राप्ति न हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे देहनैराश्य वर्णनन्नाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥
रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस जीव को संसारसमुद्र में जन्म पाकर प्रथम बाल अवस्था प्राप्त होती है वह भी परम दुःख का मूल है । उससे वह परम दीन हो जाता है और इतने अवगुण इसमें आ प्रवेश करते हैं अर्थात् अशक्तता, मूर्खता, इच्छा, चपलता, दीनता, दुःख, सन्ताप इतने विकार इसको प्राप्त होते हैं । यह बाल्यावस्था महाविकारवान् है । बालक पदार्थ की ओर धावता है और एक वस्तु का ग्रहणकर दूसरी को चाहता है स्थिर नहीं रहता, फिर और में लग जाता है । जैसे वानर स्थिर नहीं बैठता और जो किसी पर क्रोध करता है तो भीतर से जलता है । वह बड़ी बड़ी इच्छा करता है, पर उसकी प्राप्ति नहीं होती, सदा तृष्णा में रहता है और क्षण में भयभीत हो जाता है; शान्ति प्राप्त नहीं होती । जैसे कदली वन का हाथी जंजीर से बँधा हुआ दीन हो जाता है वैसे ही यह चैतन्य पुरुष बालक अवस्था में दीन हो जाता है । वह जो कुछ इच्छा करता है सो विचार बिना है, उसमे दुःख पाता है । यह मूढ़ रँगों अवस्था है उससे कुछ सिद्धि नहीं होती और जो किसी पदार्थ की प्राप्ति होती है तो उसमें क्षणमात्र सुखी रहता है फिर तपने लगता है । जैसे तपती पृथ्वी पर जल डालिये तो एक क्षण शीतल होती है फिर उसी प्रकार से तपती है वैसे ही यह भी तपता रहता है । जैसे रात्रि के अन्त में सूर्य उदय होता है उसमे उलकादि कष्टवान् होते हैं वैसे ही इस जीव को स्वरूप के अज्ञान से बाल्यावस्था में कष्ट होता है । हे मुनीश्वर ! जो बालक अवस्था की संगति करता है वह भी मूर्ख है, क्योंकि वह विवेकरहित अवस्था है और सदा अपवित्र है और सदा पदार्थ की ओर धावती है ।