योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य प्रकरण । ४५
ऐसी मूढ़ और दीन अवस्था की मुझको इच्छा नहीं, उसमें जिस पदार्थ को देखता है उसकी ओर धावता है जैसे कुत्ता क्षण-क्षण में द्वार की ओर जाता है और अपमान पाता है वैसे ही बालक अपमान पाता है। बालक को माता, पिता, बान्धव, अपने से बड़े बालक और पशु पक्षी का भी भय रहता है। हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःखरूपी अवस्था की मुझको इच्छा नहीं। जैसे स्त्री के नयन और नदी का प्रवाह चञ्चल है उससे भी मन और बालक चञ्चल हैं और सब चञ्चलता बालक के कनिष्ठ हैं। हे मुनीश्वर ! जैसे वेश्या का चित्त एक पुरुष में नहीं ठहरता वैसे ही बालक का चित्त एक पदार्थ में नहीं ठहरता और उसको यह विचार भी नहीं होता कि इस पदार्थ से मेरा नाश होगा वा कल्याण होगा। बालक ऐसी ही व्यर्थ चेष्टा करता है, सदा दीन रहता है और सुख दुःख की इच्छा से तपायमान रहता है। जैसे ज्येष्ठ-आषाढ़ में पृथ्वी तपायमान होती है वैसे ही बालक तपता रहता है शान्ति कदाचित् नहीं पाता । जब विद्या पढ़ने लगता है तब गुरु से ऐसा भयभीत होता है जैसे कोई यम को देख भय पावे और जैसे गरुड़ को देख के सर्प डरे। जब शरीर में कोई कष्ट प्राप्त होता है तब भी यह बड़े दुःख को प्राप्त होता है और उस दुःख को निवारण नहीं कर सकता और सहने की भी सामर्थ्य नहीं होती, भीतर ही जलता है और मुख से कुछ बोल नहीं सकता । जैसे वृक्ष-कुञ्ज बोल नहीं सकता और जैसे पशु-पक्षी दुःख पाते हैं, न कुछ कह सकते हैं, न दुःख का निवारण कर सकते हैं, भीतर ही भीतर जलते हैं वैसे ही बालक भी गूँगा और मूढ़ होकर दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! ऐसी बालक अवस्था की इच्छा करने वाला मूर्ख है। यह तो परम दुःख रूप अवस्था है। इसमें विवेक और विचार भी कुछ नहीं होता । बालक खाने को पाता है रुदन करता है । ऐसी अवगुणरूप अवस्था मुझको नहीं सुहानी। जैसे बिजली और जल के बुद्बुदे स्थिर नहीं रहते वैसे ही बालक भी कदाचित् स्थिर नहीं रहता । हे मुनीश्वर ! यह महामूर्ख अवस्था है । इसमें कभी कहता है कि हे पिता ! मुझको बर्फ का टुकड़ा भून दे और कभी कहता है कि मुझको चन्द्रमा उतार दे । ये सब मूर्खता के वचन हैं। इससे ऐसी मूर्खावस्था को मैं