भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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वैराग्य प्रकरण । ४३

वे शरीर के संयोग से होते हैं । मान-अपमान, जरा-मृत्यु, दम्भ-भ्रान्ति, मोह-शोक आदि सर्व विकार देह के संयोग से होते हैं जिनको देह में अभिमान है उनको धिक्कार है और सब आपदा भी उन्हीं को प्राप्त होती हैं। जैसे समुद्र में नदी प्रवेश करती है वैसे ही देहाभिमान में सर्व आपदा प्रवेश करती हैं। जिसको देह का अभिमान नहीं है वह मनुष्यों में उत्तम और वन्दना करने के योग्य है। ऐसे को मेरा भी नमस्कार है और सर्व सम्पदा भी उसी को प्राप्त होती हैं जैसे मानसरोवर में सब हंस आकर रहते हैं वैसे ही जहाँ देहाभिमान नहीं रहा वहाँ सर्व सम्पदा आ रहती हैं। हे मुनीश्वर ! जैसे अपनी छाया में बालक वेताल कल्पता है और उससे भय पाता है पर जब उसको विचार की प्राप्ति होती है तब वेताल का अभाव हो जाता है वैसे ही अज्ञान से मुझको अहङ्काररूपी पिशाच ने शरीर में दृढ़ आस्था बताई है। इसलिए आप वही उपाय कहिये जिससे अहङ्काररूपी पिशाच का नाश हो और आस्थारूपी फाँसी टूटे। हे मुनीश्वर ! प्रथम मुझको अज्ञान में अहङ्काररूपी पिशाच का संयोग था; उसके अनन्तर शरीर में आस्था उपजी जैसे बीज से प्रथम अंकुर होता है फिर अंकुर से वृक्ष होता है वैसे ही अहङ्कार से शरीर की आस्था होती है। हे मुनीश्वर ! जैसे बालक छाया में वेताल देखकर दीनता को प्राप्त होता है वैसे ही अहङ्काररूपी पिशाच ने मुझको दीन किया है। वह अहङ्काररूपी पिशाच अविचार से सिद्ध है। जैसे प्रकाश से अन्धकार नाश हो जाता है वैसे ही विचार करने से अहङ्कार नष्ट हो जाता है। हे मुनीश्वर ! जिस शरीर में आस्था रखी है वह जल के प्रवाह की नाईं है, स्थिर नहीं होता। जैसे बिजली का चमकना स्थिर नहीं और गन्धर्व नगरी की आस्था व्यर्थ है वैसे ही शरीर की आस्था करना व्यर्थ है। हे मुनीश्वर ! जो शरीर की आस्था करके अहङ्कार करते हैं और जगत के पदार्थों के निमित्त यत्न करते हैं वे महामूर्ख हैं। जैसे स्वप्न मिथ्या है वैसे ही यह जगत मिथ्या है। जो उसको सत्य जानता है वह अपने बन्धन के निमित्त यत्न करता है। जैसे बुराण अर्थात् कुम्हारी अपने बन्धन के निमित्त गुफा बनाती है और पतंग अपने नाश के निमित्त दीपक की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी को