भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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४२योगवाशिष्ठ ।

भोग भोगते हैं; परन्तु जरा अवस्था और मृत्यु दोनों को होती है, इसमें विशे- षता कुछ नहीं। शरीर का उपकार करना और भोग भुगतना तृष्णा के कारण उलटा दुःख का कारण है जैसे कोई नागिन को घर में रखकर दूध पिलावे तो अन्त में वह उसे काटकर मारेगी वैसे ही जिस जीव ने तृष्णा- रूपी नागिनी के साथ मित्रता की है वह मरेगा, क्योंकि नाशवन्त है। इसके निमित्त भोग भुगतने का यत्न करना मूर्खता है। जैसे पवन का वेग आता और जाता है वैसे ही यह शरीर भी आना और जाता है, इसमें प्रीति करना दुःख का कारण है। जैसे कोई विरला मृग मरुस्थल की आस्था त्यागता है और सब पड़े भ्रमते हैं वैसे ही सब जीव इसकी आस्था में बँधे हुए हैं, इसका त्याग कोई विरले ही ने किया है। हे मुनीश्वर ! बिजली और दीपक का प्रकाश भी आता जाता दीखता है; परन्तु इस शरीर का आदि अन्त नहीं दीखता कि कहाँ से आता है और कहाँ जाता है। जैसे समुद्र में बुद्बुदे उपजते और मिट जाते हैं उसकी आस्था करने में कुछ लाभ नहीं वैसे ही यह शरीर इसकी आस्था करना योग्य नहीं। यह अत्यन्त नाश- रूप है स्थिर कदाचित् नहीं होता है। जैसे बिजली स्थिर नहीं होती वैसे ही शरीर भी स्थिर नहीं रहता इसलिए इसकी में आस्था नहीं करता। इसका अभिमान मैंने त्याग दिया है। जैसे कोई सूखे तृण को त्याग देता है वैसे ही मैंने अहंममता त्यागी है। हे मुनीश्वर ! ऐसे शरीर को पुष्ट करना दुःख का निमित्त है। यह शरीर किसी अर्थ नहीं आता जलाने योग्य है। जैसे लकड़ी जलाने के सिवाय और काम में नहीं आती वैसे ही यह शरीर भी जड़ और गूँगा जलाने के अर्थ है। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने काष्ठ- रूपी शरीर को ज्ञानाग्नि से जलाया है उसका परम अर्थ सिद्ध हुआ है और जिसने नहीं जलाया उसने परम दुःख पाया है। हे मुनीश्वर ! न मैं शरीर हूँ, न मेरा शरीर है; न इसका में हूँ, न मेरा यह है; अब मुझको कामना कोई नहीं, मैं निराशी पुरुष हूँ और शरीर से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं इसलिये आप वही उपाय कहिये जिससे में परमपद पाऊँ। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने शरीर का अभिमान त्यागा है वह परमानन्दरूप है और जिसको देह का अभिमान है वह परम दुःखी है। जितने दुःख हैं