भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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३२२ | योगवाशिष्ठ ।

देखके कहने लगी, हे देवि ! इसमें मैं क्योंकर प्राप्त हुई ? जब में प्रथम आई थी तब तो मुझको मन्त्री, टहलुये और अनेक पुरवासी देखते थे और वह संशय मैंने तुमसे निवृत्त किया था; फिर अब में इस प्रकार कैसे आन स्थित हुई । यह दृश्यरूप कैसा आदर्श है जिसके भीतर बाहर प्रति-बिम्ब होता है ? यह मन्त्री और टहलुये और मेरा यह स्वरूप क्या है और दृश्यभाव हो क्योंकर भासता है । मेरा यह संशय दूर करो । देवी बोली, हे लीले ! जैसे चित्तसंवित् में स्पन्द फुरता है वैसे ही तत्काल सिद्ध होता है । जिस अर्थ को चिन्तन करनेवाला चित्तसंवित् शरीर को त्यागता है उसी अर्थ को प्राप्त होता है और उसी क्षण में देश काल और पदार्थ की दीर्घता होती है । जैसे स्वप्न सृष्टि फुर आती है वैसे ही परलोकदृष्टि भास आती है । हे लीले ! जब तेरा भर्त्ता मृतक होने लगा था तब तुझ-में और मन्त्रियों में इसका बहुत स्नेह था इससे वही रूप सत् होकर अपनी वासना के अनुसार उसे भासा है जैसे सङ्कल्पपुर और स्वप्नसेना भासती है वैसे ही यह "देश काल और पदार्थ" भासे हैं । हे लीले ! जो कोई असत् पदार्थ सद्रूप होकर भासते हैं वह अज्ञानकाल में ही भासते हैं, ज्ञानकाल में सब तुल्य हो जाते हैं; न्यूनाधिक कोई नहीं रहता; जाग्रत् में स्वप्न मिथ्या भासता और स्वप्न में जाग्रत् का अभाव हो जाता है । जाग्रत् शरीर मृतक में नष्ट हो जाता है; मृतक जन्म में असत् हो जाता है और मृतक में जन्म असत् हो जाता है । हे लीले ! जब इस प्रकार इनको विचारकर देखिये तो सब अवस्था भ्रान्तिमात्र हैं, वास्तव में कोई सत्य नहीं । हे लीले ! सर्ग से आदि महाप्रलय पर्यन्त कुछ नहीं हुआ । सदा ज्यों का त्यों ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है; जगत् आभासमात्र है और अज्ञान से भासता है । जैसे आकाश में तरुवरे भासते हैं वैसे ही आत्मा में जगत् भ्रम से भासता है और वास्तव में कुछ भी नहीं जैसे समुद्र में तरंग उपजकर लीन होते हैं वैसे ही आत्मा में जगत् उपज-कर लीन होते हैं । इससे 'अहं' 'त्वं' आदि शब्द भ्रान्तिमात्र हैं । हे लीले ! यह जगत् मृगतृष्णा के जलवत् है । इसमें आस्था करनी अज्ञा-नता है और भ्रान्ति भी कुछ वस्तु नहीं । जैसे घनतम में यक्ष भासता