भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

उत्पत्ति प्रकरण । २२३

है पर वह कछु कोई वस्तु नहीं है, ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है, वैसे ही भ्रान्ति भी कछु वस्तु नहीं। जन्म, मृत्यु और मोह सब असतरूप हैं। 'अहं' 'त्वं' आदि जितने शब्द हैं उनका महाप्रलय में अभाव हो जाता है उसके पीछे जो शुद्ध शान्तरूप है अब भी वही जान कि ज्यों की त्यों ब्रह्मसत्ता है। हे लीले ! यह जो पृथ्वी आदि भासते हैं सो भी संवित्‌रूप हैं क्योंकि जब चित्तसंवित् स्पन्दरूप होता है तब यह जगत् होकर भासता है और इसी कारण संवित्‌रूप है। हे लीले ! जीवरूपी समुद्र में जगत्‌-रूप तरङ्ग उत्पन्न होते हैं और लीन भी होते हैं, पर वास्तव में जलरूप हैं और कुछ नहीं। जैसे अग्नि में उष्णता होती है वैसे ही जीव में सर्ग है जो ज्ञानवान् है उसको सर्वात्मा भासता है और अज्ञानी को भिन्न-भिन्न कल्पना होती है। हे लीले ! जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु भासते हैं, पवन में स्पन्द होता है और उसमें सुगन्ध होती है सो सब निराकार है वैसे ही जगत् भी आत्मा में निर्वेषु है। भाव अभाव; ग्रहण त्याग; सूक्ष्म; स्थूल; चर अचर इत्यादि सब ब्रह्म में आभास हैं। हे लीले ! यह जगत् जो साकाररूप भासता है सो आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे वृक्ष के अङ्ग पत्र, फल, टासरूप हो भासते हैं वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जगद्रूप होकर भासती है और कुछ नहीं। जैसे चेतन संवित् में जैसा स्पन्द फुरता है वैसे ही होकर भासता है, पर वह आकाशरूप संवित् ज्यों की त्यों है, उसमें और कल्पना भ्रममात्र है। हे लीले ! यह जो जगत् भासता है वह न सत् है और न असत् है। जैसे रस्सी में भ्रम से सर्प भासता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। जिसको असम्यक्ज्ञान होता है उसको रस्सी में सर्प भासता है तो वह असत् न हुआ और जिसको सम्यक् बोध होता है उसको सर्प सत् नहीं। ऐसे ही अज्ञान से जगत् असत् नहीं भासता और आत्मज्ञान होने से सत् नहीं भासता, क्योंकि कछु वस्तु नहीं है। हे लीले ! जैसे जिसके अन्तःकरण में स्पन्द फुरता है उसका वह अनुभव करता है। जब यह जीव मृतक होता है तब इसको एक क्षण में जगत् फुर आता है। किसी को अपूर्वरूप फुर आता है; किसी को पूर्वरूप फुर आता है और किसी को अपूर्व मिश्रित