योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२४ योगवाशिष्ठ ।
फुर आता है। इस कारण तेरे भर्त्ता को भी वही मन्त्री, स्त्री और सभा वासना के अनुसार फुर आये हैं, क्योंकि आत्मा सर्वत्ररूप है, जैसा-जैसा इसमें तीव्र स्पन्द फुरता है वैसा ही होकर भासता है। हे लीले! जैसे अपने मनोराज में जो प्रतिभा उदय हो आती है वह सतरूप हो भासती है वैसे ही यह जो लीला तेरे सम्मुख बैठी है सो यहीं हुई है और तेरे भर्त्ता की जो तेरे में तीव्र वासना थी इससे उसको तेरा प्रतिबिम्बरूप होकर यह लीला प्राप्त हुई और तेरा सा शील, आचार, कुल, वपु इसको प्रतिबिम्बित हुआ है। हे लीले! सर्वगत संवित् आकाश है। जैसा-जैसा उसमें फुरना होता है वैसा ही वैसा चिद्रूप आदर्श में प्रतिबिम्ब भासता है। इस सब जगत् का चेतन दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है; वास्तव में तू और में, जगत्, आकाश, भवन, पृथ्वी, राजा आदि सब आत्मरूप हैं। आत्मा ही जगतरूप हो भासता है। जैसे बेलि से मज्जा भिन्न नहीं वैसे ही यह जगत् ब्रह्मस्वरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने अग्निदाहवर्णननाम द्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३२ ॥
देवी बोली, हे लीले! तेरा भर्त्ता राजा विदूरथ रण में संग्राम करके शरीर त्यागेगा और उसी अन्तःपुर में प्राप्त होकर राज्य करेगा। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार देवी ने कहा तब विदूरथ के पुरवाली लीला ने हाथ जोड़ के देवी को प्रणाम किया और कहा, हे देवि! भगवति! मैंने ज्ञप्तिरूप का नित्य पूजन किया और उसने स्वप्न में मुझको दर्शन दिया। जैसे वह ईश्वरी थी वैसे ही तुम भी मुझको दृष्टि आती हो। इससे मुझ पर कृपा करके मनवाञ्छित फल दो। तब देवी अपने भक्त पर प्रसन्न होकर बोली, हे लीले! तूने अनन्य होकर मेरी भक्ति की है और उससे तेरा शरीर भी जीर्ण हो गया है अब में तुझ पर प्रसन्न हूँ जो कुछ तुझको वाञ्छित हो वह वर माँग। लीला बोली, हे भगवति! जब मेरा भर्त्ता रण में देह त्याग दे तो में इसी शरीर से उसकी भार्या होऊँ। देवी बोली, तूने भावना सहित भली प्रकार पुण्यादिकों से निर्विघ्न मेरी सेवा की है इससे ऐसा ही होगा। तब पूर्व