योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २२५
लीला ने कहा, हे देवि ! तुम तो सत्यसंकल्प, सत्यकाम और ब्रह्मस्वरूप हो मुझको उसी शरीर से तुम विदूरथ के गृह में वशिष्ठ ब्राह्मण की सृष्टि में मुझे क्यों न ले गईं ? देवी बोली, हे लीले ! मैं किसी का कुछ नहीं करती । सब जीवों के संकल्पमात्र देह है और मैं ज्ञप्तिरूप हूँ । एक-एक जीव के अन्तर चैतन्यमात्र देवता होकर मैं स्थित हूँ; जो जो जीव जैसी-जैसी भावना करता है वैसी ही वैसी उसको सिद्धता होती है । हे लीले ! जब तूने मेरा आराधन किया था तब तूने यह प्रार्थना की थी कि मेरे भर्त्ता का जीव इसी आकाशमण्डप में रहे और मुझको ज्ञान की भी प्राप्ति हो । उसी के अनुसार मैंने तुझको ज्ञान का उपदेश दिया और तुझको ज्ञान प्राप्त हुआ । इसी निमित्त उसने पूजन किया था उससे उसके यही प्राप्त हुआ है कि देहसहित भर्त्ता के साथ जावेगी । जैसा-जैसा चित्त संवित् में स्पन्द दृढ़ होता है वैसे ही वैसी सिद्धता होती है । हे लीले ! जो तप करते हैं उनकी दृढ़ता से चिदात्मा ही देवतारूप होके फल को देते हैं । जैसे-जैसे सङ्कल्प की तीव्रता किसी को होती है चैतन्य संवित् से उसको वैसा ही फल प्राप्त होता है । चित्तसंवित् से भिन्न किसी से किसी को कदाचित् कुछ फल नहीं प्राप्त होता । आत्मा सर्वगत और सर्व के अन्तःकरण में स्थित है । जैसे उसमें चैत्यता होती है उसको वैसा ही शुभाशुभ भाव प्राप्त होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सत्य कामसङ्कल्पवर्णन-नाम त्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३३ ॥
रामजी बोले, हे भगवन् ! राजा विदूरथ जब देवी से कहकर संग्राम में गया तो उसने वहाँ क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब राजा गृह से निकला तो तारों में चन्द्रमा के सदृश सम्पूर्ण सेना से सुशोभित हुआ और रथ पर आरूढ़ होकर सभासहित संग्राम में आया । वह रथ मोती और मणियों से पूर्ण था और उसमें आठ घोड़े लगे थे जो वायु से भी तीक्ष्ण चलते थे और उसमें पाँच ध्वजा थीं । उस रथ पर आरूढ़ हो राजा इस भाँति संग्राम में आया जैसे सुमेरु पर्वत पंखों से समुद्र में जा पड़े । तब जैसे प्रलयकाल में समुद्र इकट्ठे हो जाते हैं वैसे ही दोनों सेनाएँ इकट्ठी हो गईं और बड़ा युद्ध होने लगा और मेघों की नाईं