योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । २२३
है पर वह कछु कोई वस्तु नहीं है, ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है, वैसे ही भ्रान्ति भी कछु वस्तु नहीं। जन्म, मृत्यु और मोह सब असतरूप हैं। 'अहं' 'त्वं' आदि जितने शब्द हैं उनका महाप्रलय में अभाव हो जाता है उसके पीछे जो शुद्ध शान्तरूप है अब भी वही जान कि ज्यों की त्यों ब्रह्मसत्ता है। हे लीले ! यह जो पृथ्वी आदि भासते हैं सो भी संवित्रूप हैं क्योंकि जब चित्तसंवित् स्पन्दरूप होता है तब यह जगत् होकर भासता है और इसी कारण संवित्रूप है। हे लीले ! जीवरूपी समुद्र में जगत्-रूप तरङ्ग उत्पन्न होते हैं और लीन भी होते हैं, पर वास्तव में जलरूप हैं और कुछ नहीं। जैसे अग्नि में उष्णता होती है वैसे ही जीव में सर्ग है जो ज्ञानवान् है उसको सर्वात्मा भासता है और अज्ञानी को भिन्न-भिन्न कल्पना होती है। हे लीले ! जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु भासते हैं, पवन में स्पन्द होता है और उसमें सुगन्ध होती है सो सब निराकार है वैसे ही जगत् भी आत्मा में निर्वेषु है। भाव अभाव; ग्रहण त्याग; सूक्ष्म; स्थूल; चर अचर इत्यादि सब ब्रह्म में आभास हैं। हे लीले ! यह जगत् जो साकाररूप भासता है सो आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे वृक्ष के अङ्ग पत्र, फल, टासरूप हो भासते हैं वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जगद्रूप होकर भासती है और कुछ नहीं। जैसे चेतन संवित् में जैसा स्पन्द फुरता है वैसे ही होकर भासता है, पर वह आकाशरूप संवित् ज्यों की त्यों है, उसमें और कल्पना भ्रममात्र है। हे लीले ! यह जो जगत् भासता है वह न सत् है और न असत् है। जैसे रस्सी में भ्रम से सर्प भासता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। जिसको असम्यक्ज्ञान होता है उसको रस्सी में सर्प भासता है तो वह असत् न हुआ और जिसको सम्यक् बोध होता है उसको सर्प सत् नहीं। ऐसे ही अज्ञान से जगत् असत् नहीं भासता और आत्मज्ञान होने से सत् नहीं भासता, क्योंकि कछु वस्तु नहीं है। हे लीले ! जैसे जिसके अन्तःकरण में स्पन्द फुरता है उसका वह अनुभव करता है। जब यह जीव मृतक होता है तब इसको एक क्षण में जगत् फुर आता है। किसी को अपूर्वरूप फुर आता है; किसी को पूर्वरूप फुर आता है और किसी को अपूर्व मिश्रित
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फुर आता है। इस कारण तेरे भर्त्ता को भी वही मन्त्री, स्त्री और सभा वासना के अनुसार फुर आये हैं, क्योंकि आत्मा सर्वत्ररूप है, जैसा-जैसा इसमें तीव्र स्पन्द फुरता है वैसा ही होकर भासता है। हे लीले! जैसे अपने मनोराज में जो प्रतिभा उदय हो आती है वह सतरूप हो भासती है वैसे ही यह जो लीला तेरे सम्मुख बैठी है सो यहीं हुई है और तेरे भर्त्ता की जो तेरे में तीव्र वासना थी इससे उसको तेरा प्रतिबिम्बरूप होकर यह लीला प्राप्त हुई और तेरा सा शील, आचार, कुल, वपु इसको प्रतिबिम्बित हुआ है। हे लीले! सर्वगत संवित् आकाश है। जैसा-जैसा उसमें फुरना होता है वैसा ही वैसा चिद्रूप आदर्श में प्रतिबिम्ब भासता है। इस सब जगत् का चेतन दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है; वास्तव में तू और में, जगत्, आकाश, भवन, पृथ्वी, राजा आदि सब आत्मरूप हैं। आत्मा ही जगतरूप हो भासता है। जैसे बेलि से मज्जा भिन्न नहीं वैसे ही यह जगत् ब्रह्मस्वरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने अग्निदाहवर्णननाम द्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३२ ॥
देवी बोली, हे लीले! तेरा भर्त्ता राजा विदूरथ रण में संग्राम करके शरीर त्यागेगा और उसी अन्तःपुर में प्राप्त होकर राज्य करेगा। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार देवी ने कहा तब विदूरथ के पुरवाली लीला ने हाथ जोड़ के देवी को प्रणाम किया और कहा, हे देवि! भगवति! मैंने ज्ञप्तिरूप का नित्य पूजन किया और उसने स्वप्न में मुझको दर्शन दिया। जैसे वह ईश्वरी थी वैसे ही तुम भी मुझको दृष्टि आती हो। इससे मुझ पर कृपा करके मनवाञ्छित फल दो। तब देवी अपने भक्त पर प्रसन्न होकर बोली, हे लीले! तूने अनन्य होकर मेरी भक्ति की है और उससे तेरा शरीर भी जीर्ण हो गया है अब में तुझ पर प्रसन्न हूँ जो कुछ तुझको वाञ्छित हो वह वर माँग। लीला बोली, हे भगवति! जब मेरा भर्त्ता रण में देह त्याग दे तो में इसी शरीर से उसकी भार्या होऊँ। देवी बोली, तूने भावना सहित भली प्रकार पुण्यादिकों से निर्विघ्न मेरी सेवा की है इससे ऐसा ही होगा। तब पूर्व
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लीला ने कहा, हे देवि ! तुम तो सत्यसंकल्प, सत्यकाम और ब्रह्मस्वरूप हो मुझको उसी शरीर से तुम विदूरथ के गृह में वशिष्ठ ब्राह्मण की सृष्टि में मुझे क्यों न ले गईं ? देवी बोली, हे लीले ! मैं किसी का कुछ नहीं करती । सब जीवों के संकल्पमात्र देह है और मैं ज्ञप्तिरूप हूँ । एक-एक जीव के अन्तर चैतन्यमात्र देवता होकर मैं स्थित हूँ; जो जो जीव जैसी-जैसी भावना करता है वैसी ही वैसी उसको सिद्धता होती है । हे लीले ! जब तूने मेरा आराधन किया था तब तूने यह प्रार्थना की थी कि मेरे भर्त्ता का जीव इसी आकाशमण्डप में रहे और मुझको ज्ञान की भी प्राप्ति हो । उसी के अनुसार मैंने तुझको ज्ञान का उपदेश दिया और तुझको ज्ञान प्राप्त हुआ । इसी निमित्त उसने पूजन किया था उससे उसके यही प्राप्त हुआ है कि देहसहित भर्त्ता के साथ जावेगी । जैसा-जैसा चित्त संवित् में स्पन्द दृढ़ होता है वैसे ही वैसी सिद्धता होती है । हे लीले ! जो तप करते हैं उनकी दृढ़ता से चिदात्मा ही देवतारूप होके फल को देते हैं । जैसे-जैसे सङ्कल्प की तीव्रता किसी को होती है चैतन्य संवित् से उसको वैसा ही फल प्राप्त होता है । चित्तसंवित् से भिन्न किसी से किसी को कदाचित् कुछ फल नहीं प्राप्त होता । आत्मा सर्वगत और सर्व के अन्तःकरण में स्थित है । जैसे उसमें चैत्यता होती है उसको वैसा ही शुभाशुभ भाव प्राप्त होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सत्य कामसङ्कल्पवर्णन-नाम त्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३३ ॥
रामजी बोले, हे भगवन् ! राजा विदूरथ जब देवी से कहकर संग्राम में गया तो उसने वहाँ क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब राजा गृह से निकला तो तारों में चन्द्रमा के सदृश सम्पूर्ण सेना से सुशोभित हुआ और रथ पर आरूढ़ होकर सभासहित संग्राम में आया । वह रथ मोती और मणियों से पूर्ण था और उसमें आठ घोड़े लगे थे जो वायु से भी तीक्ष्ण चलते थे और उसमें पाँच ध्वजा थीं । उस रथ पर आरूढ़ हो राजा इस भाँति संग्राम में आया जैसे सुमेरु पर्वत पंखों से समुद्र में जा पड़े । तब जैसे प्रलयकाल में समुद्र इकट्ठे हो जाते हैं वैसे ही दोनों सेनाएँ इकट्ठी हो गईं और बड़ा युद्ध होने लगा और मेघों की नाईं
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योद्धों के शब्द होने लगे । जैसे मेघ से बूँदों की वर्षा होती है और अग्नि से चिनगारियाँ निकलती हैं वैसे ही शस्त्रों की वर्षा होने लगी । जैसे प्रलयकाल की बड़वानल अग्नि होती है वैसे ही शस्त्रों से अग्नि निकलती थी और उन शस्त्रों से अनेक जीव मरे । इस प्रकार जब बड़ा युद्ध होने लगा तब विदूरथ की सेना कुछ निर्बल हुई और ऊर्ध्व में जो दोनों लीला देवी की दिव्य दृष्टि से देखती थीं उन्होंने कहा, हे देवि ! तुम तो सर्वशक्तिमान हो और हमारे पर तुम्हारी दया भी है हमारे भर्त्ता की जय क्यों नहीं होती इसका कारण कहो ? देवी बोली, हे लीले ! विदूरथ के शत्रु राजा सिद्ध ने जय के निमित्त चिरकाल पर्यन्त मेरी पूजा की है और तुम्हारे भर्त्ता ने जय के निमित्त पूजा नहीं की, मोक्ष के निमित्त की है इससे जीत सिद्ध राजा की होगी और तेरे भर्त्ता को मोक्ष की प्राप्ति होगी । हे लीले ! जिस जिस निमित्त कोई हमारी सेवा करता है हम उसको वैसा ही फल देती हैं । इससे राजा सिद्ध विदूरथ को जीतकर राज्य करेगा । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! फिर सेना को सब देखने लगीं और दोनों राजा का परस्पर तीव्र युद्ध होने लगा । दोनों राजाओं ने ऐसे बाण चलाये मानों दोनों विष्णु हो खड़े हैं । विदूरथ ने एक बाण चलाया उसके सहस्र हो गये और उसके आगे जाकर लाख हो गये और परस्पर युद्ध करते-करते टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़े । ऐसे दूर से दूर बाण चले जाते थे कि जैसे निर्वाण किया दीपक नहीं भासता । तब राजा सिद्ध ने मोहरूपी अस्त्र चलाया और उसके आने से विदूरथ के सिवा सब सेना मोहित हुई । जैसे उन्मत्तता से कुछ सुधि नहीं रहती वैसे ही उनको कुछ सुधि न रही और परस्पर देखते ही रह गये मानों चित्र लिखे हैं । तब राजा विदूरथ को भी मोह का आवेश होने लगा तो उसने प्रबोध-रूपी शास्त्र चलाया उससे सबका मोह छूट गया और जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी कमल प्रफुल्लित हो आते हैं वैसे ही सबके हृदय प्रफुल्लित हो गये । तब सिद्ध राजा ने नागास्त्र बाण चलाया उससे अनेक ऐसे नाग निकल आये मानों पर्वत उड़े आते हैं । निदान सब दिशाएँ नागों से पूर्ण हो गईं और उनके मुख से विष और अग्नि की ज्वाला
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निकली जिससे विदूरथ की सेना ने बहुत कष्ट पाया तब राजा विदूरथ ने गरुड़ास्त्र चलाया उससे अनेक गरुड़ प्रकट हुए और जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही सर्प नष्ट हुए और नागों को नष्ट करके गरुड़ भी अन्तर्धान हो गये । जैसे संकल्प के त्यागने से संकल्पसृष्टि का अभाव हो जाता है वैसे ही गरुड़ अन्तर्धान हो गये और जैसे स्वप्न से जागे हुए को स्वप्नगर का अभाव हो जाता है वैसे ही गरुड़ों का अभाव हो गया । फिर जब कोई बाण सिद्ध चलावे तो विदूरथ उसको नष्ट करे जैसे सूर्य तम को नष्ट करे और उसने बाणों की बड़ी वर्षा की उससे सिद्ध भी क्षोभ को प्राप्त हुआ । तब पिछली लीला ने झरोखे से देखके देवीजी से कहा हे देवि ! अब मेरे भर्त्ता की जय होती है। देवी सुनके मुसकराई पर मुख से कुछ न कह हृदय में विचारा कि जीव का चित्त बहुत चञ्चल है, ऐसे देखते ही थे कि सूर्य उदय हुए—मानों सूर्य भी युद्ध का कौतुक देखने आये हैं—और सिद्ध ने तमरूप अस्त्र चलाया जिससे सर्वदिशा श्याम हो गईं और कुछ भी न भासित होता था—मानों काजल की समष्टिता इकट्ठी हुई है । तब विदूरथ ने सूर्यसा प्रकाशरूपी अस्त्र चलाया जिससे सब तम नष्ट हो गया । जैसे शरदकाल में सब घटा नष्ट हो जाती हैं, केवल शुद्ध आकाश ही रहता है, जैसे आत्मज्ञान से लोभादिक का ज्ञानी को अभाव हो जाता है और जैसे लोभरूपी काजल के निवृत्त होने से ज्ञानवान् की बुद्धि निर्मल होती है वैसे ही प्रकाश से तम नष्ट हो गया और सब दिशा निर्मल हुईं । जैसे अगस्त्यमुनि समुद्र को पान कर गये थे वैसे ही प्रकाश तम का पान कर गया । तब सिद्ध ने वेतालरूपी अस्त्र चलाया जिससे विदूरथ की सेना मोहित हो गई और उसमें से महाविकराल और पर-बाहीं समान मूर्ति धारण किये ऐसे श्यामरूप वेताल भासने लगे, जो ग्रहण न किये जावें और जीव के भीतर प्रवेश कर जावें । जिनके रहने का स्थान शून्य मन्दिर, कीचड़ और पर्वत हैं, शस्त्र से निकलकर विदूरथ की सेना को दुःख देने लगे । पिशाच वह होते हैं जिनकी शास्त्रोक्त क्रिया नहीं होती और जो मरके भूत, पिशाच और वेताल
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होते हैं और राग, द्वेष, तृष्णा और भूख से जलते रहते हैं। उनका कोई बड़ा सरदार विदूरथ के निकट आने लगा तब विदूरथ ने रूपका नामक अस्त्र चलाया और उससे महाभयानकरूप बड़े नख, केश, जिह्वा, उदर और होठसहित नग्नरूप भैरव प्रकट होकर वैतालों को भोजन करने और खप्पर में रक्त भरकर पीने और नृत्य करने लगे और सबको दुःख देने लगे। तब सिद्ध ने क्रोध करके राक्षसरूपी अस्त्र चलाया जिससे एक कोटि भयानकरूप और काले राक्षस पाताल और दिशाओं से निकले जिनकी जिह्वा निकली हुई और ऐसा चमत्कार करते थे जैसे श्याम मेघ में बिजली चमत्कार करती है । वे जिसको देखें उसको मुख में डाल- के ले जावें । उनको देखके विदूरथ की सेना बहुत डर गई, क्योंकि जिसके सम्मुख वे हँसके देखें वह भय से मर जावे। तब राजा विदूरथ ने अपनी सेना को कष्टवान् देख विष्णुअस्त्र चलाया जिससे सब राक्षस नष्ट हो गये । फिर राजा सिद्ध ने अग्नि नामक अस्त्र चलाया जिससे सम्पूर्ण दिशाओं में अग्नि फैल गई और लोग जलने लगे । तब राजा विदूरथ ने वरूणरूपी बाण चलाया जिससे जैसे सन्तों के सङ्ग से अज्ञानी के तीनों ताप मिट जाते हैं वैसे ही अग्नि का ताप मिट गया । जल से सब स्थान पूर्ण हो गये और सिद्ध की बहुत सेना जल में बह गई। तब सिद्ध ने शोषणमय अस्त्र चलाया जिससे सब जल सूख गया पर कहीं कहीं कीचड़ रह गई । उसने फिर तेजोमय बाण चलाया जिससे कीचड़ भी सूख गई और विदूरथ की सेना गरमी से व्याकुल होकर ऐसी तपने लगी जैसे मूर्ख का हृदय क्रोध से जलता है। तब विदूरथ ने मेघ नामक अस्त्र चलाया जिससे मेघ वर्षने लगे और शीतल मन्द मन्द वायु चलने लगा जैसे आत्मा की ओर आये जीव का संसरना घटता जाता है वैसे ही विदूरथ की सेना शीतल हुई । फिर सिद्ध ने वायुरूपी अस्त्र चलाया जिससे सूखे पत्र की नाईं विदूरथ फिरने लगा । तब विदूरथ ने पहाड़रूपी अस्त्र चलाया जिससे पहाड़ों की वर्षा होने लगी और वायु का मार्ग रुक गया और वायु के क्षोभ मिट जाने से सब पदार्थ स्थिरभूत हो गये । जेमे संवेदन मे रहित चित्त शान्त होता है वैसे ही सब शान्त
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हो गये । जब पहाड़ उड़ उड़के सिद्ध की सेना पर पड़े तब सिद्ध ने वज्र रूप अस्त्र चलाया जिससे पर्वत नष्ट हुए । जब इस प्रकार वज्र वर्षे तब विदूरथ ने ब्रह्म अस्त्र चलाया जिससे वज्र नष्ट हुए और ब्रह्म अस्त्र अन्त-र्धान हो गये । हे रामजी ! इस प्रकार परस्पर इनका युद्ध होता था । जो अस्त्र सिद्ध चलावे उसको विदूरथ विदारण करे और जो विदूरथ चलावे उसको सिद्ध विदारण कर डाले । निदान विदूरथ राजा ने एक ऐसा अस्त्र चलाया कि राजा सिद्ध का रथ चूर्ण हो गया और घोड़े भी सब चौपट कर डाले । तब सिद्ध राजा ने रथ से उतर ऐसा अस्त्र चलाया कि विदूरथ का रथ और घोड़े नष्ट हुए और दोनों ढाल और तलवार लेकर युद्ध करने लगे । फिर दोनों रथवाहक और रथ ले आये, उसके ऊपर दोनों आरूढ़ होकर युद्ध करने लगे । विदूरथ ने सिद्ध पर एक बरछी चलाई जो उसके हृदय में लगी और रुधिर चला । तब उसको देख लीला ने देवी से कहा, हे देवि ! मेरे भर्त्ता की जय हुई है । हे रामजी ! इस प्रकार लीला कहती ही थी कि सिद्ध ने बरछी चलाई सो विदूरथ के हृदय में लगी और उसको देख के विदूरथ की लीला शोक-वान् होकर कहने लगी, हे देवि ! मेरा भर्त्ता है; दुष्ट सिद्ध ने बड़ा कष्ट दिया है । हे रामजी ! फिर सिद्ध ने एक ऐसा खड्ग चलाया कि जिससे विदूरथ के पाँव कट गये और घोड़े भी कट गये पर तो भी विदूरथ युद्ध करता रहा । फिर सिद्ध ने विदूरथ के शिर पर खड्ग का प्रहार किया तो वह मूर्च्छा खाके गिर पड़ा । ऐसे देखके उसके सारथी रथ को गृह में ले आने लगे तो सिद्ध उसके पीछे दौड़ा कि मैं इसका शीश ले आऊँ, परन्तु पकड़ न सका । जैसे अग्नि में मच्छर प्रवेश नहीं कर सकता वैसे ही देवी के प्रभाव से विदूरथ को वह न पकड़ सका ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे विदूरथमरणवर्णनंनाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तब सारथी राजा को गृह में ले आया तो स्त्रियाँ, मन्त्री, बान्धव और कुटुम्बी रुदन करने लगे और बड़े शब्द होने लगे । सिद्ध की सेना लूटने लगी । हाथी, घोड़े, स्वामी बिना फिरते
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गे । फिर ढिंढोरा फिराया गया कि राजा सिद्ध की विजय हुई । निदान सब ओर से शान्ति हुई । सिद्ध राजा के ऊपर छत्र होने लगा और सब पृथ्वी का राजा वही हुआ । जैसे क्षीरसमुद्र से मन्दराचल निकल के शान्त हुआ वैसे ही सब ओर शान्ति हुई । हे रामजी ! जब राजा विदूरथ गृह में आया तब उसकी और दूसरी लीला को देख के प्रबुध लीला कहने लगी, हे देवि ! यह शरीर से वहाँ क्योंकर जा प्राप्त होगी ? यह तो भर्त्ता को ऐसे देखके मृतकरूप हो गई है और राजा भी मृत्यु के निकट पड़ा है केवल कुछ श्वास आते जाते हैं । देवी बोली, हे लीले ! यह जितने आरम्भ तू देखती है कि युद्ध हुआ और नाना प्रकार का जगत् है सो सब भ्रान्तिमात्र है और तेरा भर्त्ता जो पद्म था उसका हृदय जो मण्डपाकाश में था वहीं यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है । पद्म का मण्डपाकाश वशिष्ठ ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित है और वशिष्ठ ब्राह्मण का मण्डपाकाश चिदाकाश के आश्रय स्थित है । हे लीले ! यह सम्पूर्ण जगत् वशिष्ठ ब्राह्मण की पुर्यष्टक में स्थित है सो आकाश में ही आकाश स्थित है । किञ्चन है इससे सम्पूर्ण जगत् फुरता है, पर वास्तव में किञ्चन भी कुछ वस्तु नहीं आत्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है । उस आत्मसत्ता में 'अहं' 'त्वं' जगत् भ्रम से भासता है, कुछ उपजा नहीं । हे लीले ! उस वशिष्ठ ब्राह्मण के मण्डपाकाश में नाना प्रकार के स्थान हैं और उनमें प्राणी आते जाते और नाना व्यवहार करते भासते हैं । जैसे स्वप्नसृष्टि में नाना प्रकार के आरम्भ भासते हैं सो असतरूप हैं वैसे ही यह जगत् भी असतरूप है । हे लीले ! न यह द्रष्टा है और न त्यागे दृश्य है; सब भ्रमरूप हैं । द्रष्टा, दर्शन, दृश्य त्रिपुटी व्यवहार में है । जो दृश्य नहीं तो द्रष्टा कैसे हो ? सब असतरूप है । इनसे हित जो परमपद है वह उदय-अस्त से रहित, नित्य, अज, शुद्ध, अविनाशी और अद्वैतरूप अपने आप में स्थित है । जब उसको जानता है तब दृश्य भ्रम नष्ट हो जाता है । हे लीले ! दृश्य भ्रम से भासता है वास्तव में न कुछ उपजा है और न उपजेगा । जितने सुमेरु आदिक पर्वत जाल और पृथ्वी आदिक तत्त्व भासते हैं वे सब आकाशरूप हैं
उत्पत्ति प्रकरण ।
जैसे स्वप्न सृष्टि प्रत्यक्ष भासती है परन्तु वास्तव में कुछ नहीं वैसे ही इस जगत् को भी जानो। हे लीले! जीव जीव प्रति अपनी अपनी सृष्टि है परन्तु उसमें सार कुछ नहीं। जैसे केले के थम्भे में सार कुछ नहीं निकलता वैसे ही इस सृष्टि में विचार करने से सार कुछ नहीं निकलता—चित्तसंवेदन के फुरने से भासता है। हे लीले! तेरे भर्त्ता पद्म की जो सृष्टि है सो वशिष्ठ ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित है अर्थात् विदूरथ का जगत् पद्म के हृदय में स्थित है वहाँ तेरा शरीर पड़ा है और राजा पद्म का भी शव पड़ा है। हे लीले! तेरे भर्त्ता पद्म की सृष्टि हमको प्रदेशमात्र है। उस प्रदेश-मात्र में अंगुष्ठ प्रमाण हृदयकमल है; उसमें तेरे भर्त्ता का जीवाकाश है और उसी में यह जगत् फुरता है सो प्रदेशमात्र भी है और दूर से दूर कोटि योजन पर्यन्त है। मार्ग में वज्रमार की नाईं तत्त्वों का आवरण है। उसको लाँघ के तेरे भर्त्ता की सृष्टि है। जहाँ वह शव पड़ा है उसके पास यह लीला जाय प्राप्त हुई। लीला ने पूछा, हे देवि! ऐसे मार्ग को लाँघ के वह क्षण में कैसे प्राप्त हुई और जिस शरीर से जाना था वह शरीर तो यहीं पड़ा है वह किस रूप से वहाँ गई और वहाँ के लोगों ने उसको देखके कैसे जाना है सो संक्षेप से कहो। देवी बोली, हे लीले! इस लीला के वृत्तान्त की महिमा ऐसी है जिसके धारे से यह जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है। उसे मैं संक्षेप से कहती हूँ। हे लीले! जो कुछ जगत् भासता है वह सब भ्रममात्र है। यह भ्रमरूप जगत् पद्म के हृदय में फुरता है। उसमें विदूरथ का जन्म भी भ्रममात्र है; लीला का प्राप्त होना भी भ्रम है; संग्राम भी भ्रमरूप है विदूरथ का मरना भी भ्रमरूप है और उसके भ्रमरूप जगत् में तुम हम बैठे हैं। लीला तू भी और राजा भी भ्रमरूप है और मैं सर्वात्मा हूँ-मुझको सदा यही निश्चय रहता है। हे लीले! जब तेरा भर्त्ता मृतक होने लगा था तब तुझसे उसका स्नेह बहुत था, इसलिये तू महासुन्दर भूषण पहिने हुए वासना के अनुसार उसको प्राप्त हुई है। हे लीले! जब जीव मृतक होता है तब प्रथम उसका अन्तवाहक शरीर होता है; फिर वासना से आधिभौतिक होता है उसी के अनुसार तेरा भर्त्ता जब मृतक हुआ तब प्रथम उसका अन्तवाहक शरीर था, उस
२३२ योगवाशिष्ठ ।
से आधिभौतिक हो गया और जब आधिभौतिक हुआ तब प्रथम उसको जन्म भी हुआ और मरण भी हुआ। जब तेरा भर्त्ता मृतक हुआ तब उसको अपना जन्म और कुल, लीला का जन्म, माता, पिता और लीला के साथ विवाह भास आये। जैसे तू पद्म को भास आई थी वैसे ही वह सब विदूरथ को भास आये। हे लीले! ब्रह्म सर्वात्मा है; जैसा जैसा उसमें तीव्र स्पन्द होता है वैसे ही सिद्ध होता है। मैं ज्ञप्तिरूप चैतन्य शक्ति हूँ, मुझको जैसी इच्छा करके लोग पूजते हैं वैसे ही फल की प्राप्ति होती है। हे लीले! जैसी जैसी इच्छा करके कोई हमको पूजता है उसको वैसे ही सिद्धता प्राप्त होती है। लीला ने जो मुझसे वर माँगा था कि मैं विधवा न होऊँ और इसी शरीर से भर्त्ता के निकट जाऊँ और मैंने कहा था कि ऐसे ही होगा इसलिए मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर उसको अपना शरीर भास आया और अपने शरीर सहित जहाँ तेरे भर्त्त पद्म का शव पड़ा था वहाँ मण्डप में वैसे ही शरीर से उसके निकट जा प्राप्त हुई है, हे लीले! उसको यह निश्चय रहा कि मैं उसी शरीर से आई हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने मृत्युमूर्च्छानन्तरप्रतिभावर्णनन्नाम पञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जिस प्रकार वह लीला पद्म राजा के मण्डप में जा प्राप्त हुई है वह सुनिये। जब वह लीला मृत्यु-मूर्च्छा को प्राप्त हुई तो उसके अनन्तर उसको पूर्व के शरीर की नाईं वासना के अनुसार अपना शरीर भास आया और उसने जाना कि मैं देवी का वर पाके उसी शरीर से आई हूँ। वह अन्तवाहक शरीर से आकाश में पक्षी की नाईं उड़ती जाती थी, तब उसको अपने आगे एक कन्या दृष्टि आई। इससे लीला ने कहा, हे देवि! तू कौन है? देवी ने कहा; मैं ज्ञप्ति देवी की पुत्री हूँ और तुम्हे पहुँचाने के लिये आई हूँ। लीला ने कहा हे देवीजी! मुझे मेरे भर्त्ता के पास ले चलो। हे रामजी! तब वह कन्या आगे और लीला पीछे हो दोनों आकाश में उड़े और चिरकाल पर्यन्त आकाश में उड़ती गईं। पहले मेघों के स्थान मिले, फिर वायु के स्थान मिले, फिर सूर्य का मण्डप और तारामण्डल मिला, फिर और लोकपालों
उत्पत्ति प्रकरण । २३३
के स्थान ब्रह्मा विष्णु और रुद्र के लोक आये। इन सबको लाँघ महा- वज्रसार की नाईं ब्रह्माण्ड कपाट आया उसको भी लाँघ गई। जैसे कुम्भ में वरफ डालिये तो उसकी शीतलता बाहर प्रकट होती है वैसे ही वह ब्रह्माण्ड से बाह्य निकल गई। उस ब्रह्माण्ड से दशगुणा जल तत्त्व आया; इसी प्रकार वह अग्नि, वायु और आकाशतत्त्व आवरण को भी लाँघ गई । उसके आगे महाचैतन्य आकाश आया अन्त कहीं नहीं- वह आदि, अन्त और मध्य से रहित है। हे रामजी ! जो कोटिकल्प पर्यन्त गरुड़ उड़ते जावें तो भी उसका अन्त न पावें; ऐसे परमाकाश में वह गई और वहाँ इनको कोटि ब्रह्माण्ड दृष्टि आये । जैसे वन में अनेक वृक्षों के फल होते हैं और परस्पर नहीं जानते वैसे ही वह सृष्टि आपको न जानती थी फिर एक ब्रह्माण्डरूपी फल में दोनों प्रवेश कर गईं जैसे चींटियाँ फल के मुखमार्ग में प्रवेश कर जाती हैं। उसमें फिर उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र सहित त्रिलोकी देखी। उनके भी लोक लाँघ गई और उनके नीचे और लोकपालों के स्थान लाँघे । फिर वे चन्द्रमा, तारा, वायु और मेघमण्डलों को लाँघ के उतरीं और राजा के नगर और उस मण्डपाकाश में जहाँ पद्म राजा का शव फूलों से ढँपा पड़ा था प्रवेश कर गई। इसके अनन्तर वह कुमारी इस भाँति अन्तर्धान हो गई जैसे कोई मायावी पदार्थ हो और अन्तर्धान हो जावे। लीला पद्म के पास बैठ गई और मन में विचारने लगी कि यह मेरा भर्त्ता है यहाँ इसने संग्राम किया था, अब शूरमा की गति को प्राप्त हुआ है और इस परलोक में आय के सोया है। उसके पास में भी अपने शरीर से देवी जी के वर से आन प्राप्त हुई हूँ, मेरे ऐसा अब कोई नहीं और मैं बड़े आनन्द को प्राप्त हुई हूँ। हे रामजी ! ऐसे विचार के पास एक चमर पड़ा था उसको हाथ में लेके भर्त्ता के लिये हिलाने लगी। जैसे चन्द्रमा किरणों सहित शोभा पाता है वैसे ही उसके उठाने से वह चमर शोभा पाने लगा। देवी से लीला ने पूछा, हे देवी ! यह राजा तो मृतक होता है। इसके श्वास अब थोड़े से रहे हैं जब यहाँ से मृतक होके पदम के शरीर में जावेगा तब राजा के जागे हुए मन्त्री और नौकर कैसा जानेंगे ? देवी बोली, हे
२३४ योगवाशिष्ठ ।
लीले ! तब मन्त्री और नौकर जो होवेंगे उनको द्वैतकल्पना कुछ न भासेगी कि यह क्या आश्चर्य हुआ है । इस वृत्तान्त को तू, में और अपूर्व लीला जानेगी और न कोई जानेगा, क्योंकि इसके सङ्कल्प को और कोई कैसे जाने ? लीला ने फिर पूछा, हे देवी ! अपूर्व लीला जो यहाँ जाय प्राप्त हुई थी उसका शरीर तो यहाँ पड़ा है और तुम्हारा उसको वर भी था तो फिर इस देह के साथ वह क्यों न प्राप्त हुई ? देवी बोली, हे लीले ! छाया कभी धूप में नहीं जाती और सच झूठ भी कभी इकट्ठा नहीं होते यह आदि नीति है । जैसे जैसे आदि नीति हुई है वैसे ही होता है—अन्यथा नहीं होता । हे लीले ! जो परछाहीं में वेताल कल्पना मिटी तो परछाहीं और वेताल इकट्ठे नहीं होते वैसे ही भ्रमरूप जगत् का शरीर उस जगत् में नहीं जाता और दूसरे के संकल्प में दूसरा अपने शरीर से नहीं जा सकता, क्योंकि वह और शरीर है और यह और शरीर है; वैसे ही राजा के जगत् दर्पण में लीला के सङ्कल्प का शरीर नहीं प्राप्त हुआ । मेरे वर से वह सूक्ष्म देह से प्राप्त हुई । जब उसको मृत्यु की इच्छा प्राप्त हुई तब उसको उसका सा ही अपना शरीर भी भास आया । उसका शरीर संकल्प में स्थित था सो अपना संकल्प वह साथ ले गई है इससे अपने उसी शरीर से वह गई है । उसने आपको ऐसे जाना कि मैं वही लीला हूँ । हे लीले ! आत्मसत्ता सर्वात्मरूप है । जैसा जैसा भावना उसमें दृढ़ होती है वैसा ही वैसा रूप हो जाता है । जिसका यह निश्चय हुआ है कि पाञ्चभौतिकरूप हूँ उसको ऐसे ही दृढ़ होता है कि में उड़ नहीं सकता । हे लीले ! यह लीला तो अविदित वेद थी अर्थात् अज्ञानसहित थी और उसका आधिभौतिक भ्रम नहीं निवृत्त हुआ था, परन्तु मेरा वर था इस कारण उसको मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर यह भास आया कि में देवी के वर से चली जाऊँगी । इस वासना की दृढ़ता से वह प्राप्त हुई है । हे लीले ! यह जगत् भ्रान्तिमात्र है । जैसे भ्रम से जेवरी में सर्प भासता है वैसे ही आत्मा में भी भ्रम से जगत् भासता है । सब जगत् आत्मा में आभासरूप है । उसका अधिष्ठान् आत्मसत्ता अपने ही अज्ञान से दूर भागता है । हे लीले ! ज्ञानवान् पुरुष सदा
उत्पत्ति प्रकरण । २३५
शान्तरूप और आत्मानन्द से तृप्त रहते हैं, पर अज्ञानी शान्ति कैसे पावै। जैसे जिसको ताप चढ़ा होता है उसका अन्तःकरण जलता है और तृषा भी बहुत लगती है वैसे ही जिसको अज्ञानरूपी ताप चढ़ा हुआ है उसका अन्तर राग-द्वेष से जलता है और विषयों की तृष्णारूपी तृषा भी बहुत होती है । जिसका अज्ञानरूपी तम नष्ट हुआ है उसका अन्तर राग-द्वेषादिक से नहीं जलता और उसकी विषय की तृष्णा भी नष्ट हो जाती है। इति श्रीयोगवाशिष्ठे मण्डपाकाशगमनवर्णनन्नाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥
देवी बोली हे लीले ! जो पुरुष अविदितवेद है अर्थात् जिसने जानने योग्य पद नहीं जाना वह बड़ा पुण्यवान् भी हो तो भी उसको अन्तवाहकत्ता नहीं प्राप्त होती । अन्तवाहक शरीर भी झूठ है, क्योंकि सङ्कल्परूप है । इससे जितना जगत् तुझको भासता है वह कुछ उपजा नहीं; शुद्ध चिदाकाश सत्ता अपने आपमें स्थिर है । फिर लीला ने पूछा हे देवि ! जो यह सब जगत् सङ्कल्पमात्र है तो भाव और अभाव-रूप पदार्थ कैसे होते हैं ? अग्नि उष्णरूप है, पृथ्वी स्थिररूप है, वरफ शीतल है, आकाश की सत्ता है, काल की सत्ता है, कोई स्थूल है, कोई सूक्ष्म पदार्थ है, ग्रहण, त्याग, जन्म, मरण होता है; और मृतक हुआ फिर जन्मता है इत्यादिक सत्ता कैसे भासती है ? देवी बोली, हे लीले ! जब महाप्रलय होता है तब सब पदार्थ अभाव को प्राप्त होते हैं और काल की सत्ता भी नष्ट हो जाती है । उसके पीछे अनन्त चिदाकाश; सब कल्पनाओं से रहित और बोधमात्र ब्रह्मसत्ता ही रहती है । उस चैतन्य-मात्रसत्ता से जब चित्तसंवित् होती है तब चैतन्यसंवित् में आपको तेज अणु जानता है । जैसे स्वप्न में कोई आपको पक्षीरूप उड़ता देखे वैसे ही देखता है । उससे स्थूलता होती है; वही स्थूलता ब्रह्माण्डरूप होती है उससे तेज अणु आपको ब्रह्मारूप जानता है । फिर ब्रह्मारूप होकर जगत् को रचता है । जैसे जैसे ब्रह्मा चेतता जाता है वैसे ही वैसे स्थूल रूप होता जाता है । आदि रचना ने जैसा निश्चय किया है कि 'यह ऐसे हो' और 'इतने काल रहे' उसका नाम नीति है । जैसे आदि रचना नियत की है वह ज्यों की त्यों होती है; उसके निवारण करने
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को किसी की सामर्थ्य नहीं वास्तव में आदि ब्रह्मा भी अकारणरूप है अर्थात् कुछ उपजा नहीं तो जगत् का उपजना में कैसे कहूँ ? हे लीले ! कोई स्वरूप से नहीं उपजा परन्तु चेतना संवेदन के फुरने से जगत् आकार हो के भासता है। उसमें जैसे निश्चय है वैसे ही स्थित है। अग्नि उष्ण ही है; बर्फ शीतल ही है और पृथ्वी स्थितरूप ही है। जैसे उपजे हैं वैसे ही स्थित हैं। हे लीले ! जो चेतन है उस पर यह नीति है कि वह उपदेश का अधिकारी है और जो जड़ है उसमें वही जड़ता स्वभाव है। जो आदि चित्संवित् में आकाश का फुरना हुआ तो आकाशरूप होकर ही स्थित हुआ। जब काल का स्पन्द फुरता है तब वही चेतन संवित् कालरूप होकर स्थित होता है; जब वायु का फुरना होता है तब वही संवित् वायुरूप होकर स्थित होता है। इसी प्रकार अग्नि, जल, पृथ्वी नानारूप होकर स्थित हुए हैं। स्थूल, सूक्ष्म रूप होकर चेतन संवित् ही स्थित हो रहा है। जैसे स्वप्न में चेतन संवित् ही पर्वत वृक्षरूप होकर स्थित होता है वैसे ही चेतन संवित् जगतरूप होकर स्थित हुआ है। हे लीले ! जैसे आदि नीति ने पदार्थों के सङ्कल्परूप धारे हैं वैसे ही स्थित हैं उसके निवारण करने की किसी की सामर्थ्य नहीं, क्योंकि चेतन का तीव्र अभ्यास हुआ है। जब वही संवित् उलटकर और प्रकार स्पन्द हो तब और ही प्रकार हो; अन्यथा नहीं होता। हे लीले ! यह जगत् सत् नहीं। जैसे सङ्कल्पनगर भ्रमसिद्ध है और जैसे स्वप्नपुरुष और ध्याननगर असत्रूप होता है वैसे ही यह जगत् भी असत्-रूप है और अज्ञान से सत् की नांई भासता है। जैसे स्वप्न सृष्टि के आदि में तन्मात्रसत्ता होती है और उस तन्मात्रसत्ता का आभास किञ्चित् स्वप्नसृष्टि का कारण होता है वैसे ही यह जाग्रत् जगत् के आदि तन्मात्रसत्ता होती है और उससे किञ्चन अकारण रूप यह जगत् होता है। हे लीले ! यह जगत् वास्तव में कुछ उपजा नहीं; असत् ही सत् की नांई होकर भासता है। जैसे स्वप्न की अग्नि स्वप्न में असत् ही सत्-रूप हो भासती है वैसे ही अज्ञान से यह असत् जगत् सत् भासता है और जन्म, मृत्यु और कर्मों का फल होता है सो तू श्रवण कर। हे लीले !
उत्पत्ति प्रकरण । २३७
बड़ा और छोटा जो होता है सो देश काल और द्रव्य से होता है। एक बाल्यावस्था में मृतक होते हैं और एक यौवन अवस्था में मृतक होते हैं। जिसकी देश काल और द्रव्य की चेष्टा यथाशास्त्र होती है उसकी गति भी शास्त्र के अनुसार होती है और जो चेष्टा शास्त्र के विरुद्ध होती है तो आयु भी वैसी ही होती है। एक क्रिया ऐसी है जिससे आयु वृद्धि होती है और एक क्रिया से घट जाती है। इसी प्रकार देश, काल, क्रिया, द्रव्य, आयु के घटाने बढ़ानेवाली हैं। उनमें जीवों के शरीर बड़ी सूक्ष्म अवस्था में स्थित है। यह आदि नीति रचा हैं। युगों की मर्यादा जैसे हैं वैसे ही है। एक सौ दिव्य वर्ष कलि-युग के; दो सौ दिव्य वर्ष द्वापर के; तीन सौ त्रेता के और चार सौ सत्युग के—यह दिव्य वर्ष हैं। लौकिक वर्षों के अनुसार चार लाख बत्तीस हजार वर्ष कलियुग है; आठलाख चौंसठ हजार वर्ष द्वापरयुग है; बारह लाख छानब्बे हजार वर्ष त्रेता है और सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष सतयुग हैं। इस प्रकार युगों की मर्यादा है जिनमें जीव अपने कर्मों के फल से आयु भोगते हैं। हे लीले ! जो पाप करनेवाले हैं वह मृतक होते हैं और उनको मृत्युकाल में भी बड़ा कष्ट होता है। फिर लीला ने पूछा, हे देवि ! मृतक होने पर सुख और दुःख कैसे होते हैं और कैसे उन्हें भोगते हैं ? देवी बोली, हे लीले ! जीव की तीन प्रकार की मृत्यु होती है—एक मूर्ख की, दूसरी धारणाभ्यासी की और तीसरी ज्ञानवान् की। उनका भिन्न भिन्न वृत्तान्त सुनो। हे लीले ! जो धारणाभ्यासी हैं वह मूर्ख भी नहीं और ज्ञानवान् भी नहीं; वह जिस इष्टदेवता की धारणा करते हैं शरीर को त्याग के उसी देवता के लोक को प्राप्त होते हैं और जो ब्रह्माभ्यासी हैं पर उनको पूर्ण दशा नहीं प्राप्त हुई उनका सुख से शरीर छूटता है। जैसे सुषुप्ति हो जाती है वैसे ही धारणाभ्यासी शरीर त्यागता है और फिर सुख भोगकर आत्मतत्त्व को प्राप्त होता है। ज्ञानवान् का शरीर भी सुख से छूटता है; उसको भी यत्न कुछ नहीं होता और उस ज्ञानी के प्राण भी वहीं लीन होते हैं और वह विदेहमुक्त होता है। जब मूर्ख की मृत्यु होने लगती है तो उसे बड़ा कष्ट होता है। मूर्ख वही है जिसकी अज्ञानियों की
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संगति है; जो शास्त्रों के अनुसार नहीं विचरता और सदा विषयों की ओर धावता और पापाचार करता है। ऐसे पुरुष को शरीर त्यागने में बड़ा कष्ट होता है। हे लीले ! जब मनुष्य मृतक होने लगता है तब पदार्थों से आसक्तिबुद्धि जो बँधी थी उससे वियोग होने लगता है और कण्ठ रुक जाता है; नेत्र फट जाते हैं और शरीर की कान्ति ऐसी विरूप हो जाती है जैसे कमल का फूल कटा हुआ कुम्हिला जाता है। अङ्ग टूटने लगते हैं और प्राण नाड़ियों से निकलते हैं। जिन अङ्गों से तदात्म सम्बन्ध हुआ था और पदार्थों में बहुत स्नेह था उनसे वियोग होने लगता है इससे बड़ा कष्ट होता है। जैसे किसी को अग्नि के कुण्ड में डालने से कष्ट होता है वैसे ही उसको भी कष्ट होता है। सब पदार्थ भ्रम से भासते हैं पृथ्वी आकाशरूप और आकाश पृथ्वीरूप भासते हैं। निदान महाविपर्यय दशा में प्राप्त होता है और चित्त की चेतनता घटती जाती है। ज्यों-ज्यों चित्त की चेतनता घटती जाती है त्यों-त्यों पदार्थ के ज्ञान से अन्धा हो जाता है। जैसे सायंकाल में सूर्य अस्त होता है तो भ्रान्तिमान नेत्र को दिशा का ज्ञान नहीं रहता वैसे ही इसको पदार्थों का ज्ञान नहीं रहता और कष्ट का अनुभव करता है। जैसे आकाश से गिरता है और पाषाण में पीसा जाता है, जैसे अन्ध कूप में गिरता है और कोल्हू में पेरा जाता है, जैसे रथ से गिरता है और गले में फाँसी डाल के खींचा जाता है; और जैसे वायु से तरङ्गों में उछलता और बड़वाग्नि में जलता कष्ट पाता है वैसे ही मूर्ख मृत्युकाल में कष्ट पाता है। जब पुर्यष्टक का वियोग होता है तब मूर्च्छा से जड़ता हो जाता है और शरीर अखण्डित पड़ा रहता है। लीला ने पूछा, हे देवि ! जब जीव मृतक होने लगता है तब इसको मूर्च्छा कैसे होती है ? शरीर तो अखण्डित पड़ा रहता है, कष्ट कैसे पाता है ? देवी बोली, हे लीले ! जो कुछ जीव ने अहंकारभाव को लेकर कर्म किये हैं वे सब इकट्ठे हो जाते हैं और समय पाके प्रकट होते हैं जैसे बोया बीज समय पाके फल देता है वैसे ही उसको कर्मवासनासहित फल आन प्रकट होता है। जब इस प्रकार शरीर छूटने लगता है तब शरीर
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की तादात्म्यता और पदार्थों के स्नेह के वियोग से इसको कष्ट होता है। प्राण अपान की जो कला है और जिसके आश्रय शरीर होता है सो टूटने लगता है। जिन स्थानों में प्राण फुरते थे उन स्थानों और नाड़ियों से निकल जाते हैं और जिन स्थानों से निकलते हैं वहाँ फिर प्रवेश नहीं करते। जब नाड़ियाँ जर्जरीभूत हो जाती हैं और सब स्थानों को प्राण त्याग जाते हैं तब यह पुर्यष्टक शरीर को त्याग निर्वाण होता है। जैसे दीपक निर्वाण हो जाता है और पत्थर की शिला जड़ीभूत होती है वैसे ही पुर्यष्टक शरीर को त्यागकर जड़ीभूत हो जाती है और प्राण अपान की कला टूट पड़ती है। हे लीले! मरना और जन्म भी भ्रान्ति से भासता है—आत्मा में कोई नहीं। संवित्मात्र में जो संवेदन फुरता है सो अन्य स्वभाव से सत्य की नाईं होकर स्थित होता है और मरण और जन्म उसमें भासते हैं और जैसी-जैसी वासना होती है उसके अनुसार सुखदुःख का अनुभव करता है। जैसे कोई पुरुष नदी में प्रवेश करता है तो उसमें कहीं बहुत जल और कहीं थोड़ा होता है, कहीं बड़े तरङ्ग होते हैं और कहीं सोमजल होता है पर वे सब सोमजल में होते हैं, वैसे ही जैसी वासना होती है उसी के अनुसार सुख दुःख का अनुभव होता है और अधः, ऊर्ध्व, मध्य, वासनारूपी गढ़े में गिरते हैं। शुद्ध चैतन्यमात्र में कोई कल्पना नहीं अनेक शरीर नष्ट हो जाते हैं और चैतन्यसत्ता ज्यों की त्यों रहती है। जो चैतन्यसत्ता भी मृतक हो तो एक के नष्ट हुए सब नष्ट हो जाये पर ऐसा तो नहीं होता चैतन्यसत्ता से सब कुछ सिद्ध होता है; जो वह न हो तो कोई किसी को न जाने। हे लीले! चैतन्यसत्ता न जन्मती है और न मरती है, वह तो सर्वकल्पना से रहित केवल चिन्मात्र है उसका किसी काल में कैसे नाश हो? जन्ममरण की कल्पना संवेदन में होती है अचेत चिन्मात्र में कुछ नहीं हुआ। हे लीले! मरता वही है जिसके निश्चय में मृत्यु का सद्भाव होता है। जिसके निश्चय में मृत्यु का सद्भाव नहीं वह कैसे मरे? जीव जब को दृश्य का अत्यन्त अभाव हो तब बन्धों से मुक्त हो। वासना ही इनके बन्धन का कारण है; जब वासना से मुक्त होता है तब बन्धन कोई नहीं रहता! हे लीले! आत्मविचार से
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ज्ञान होता है और ज्ञान से दृश्य का अत्यन्ताभाव होता है। जब दृश्य का अत्यन्ताभाव हुआ तब सब वासना नष्ट हो जाती हैं । यह जगत् उदय हुआ नहीं, परन्तु उदय हुए की नाईं वासना से भासता है। इससे वासना का त्याग करो । जब वासना निवृत्त होगी तब वन्धन कोई न रहेगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मृत्युविचारवर्णनंनाम सप्तत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३७ ॥
लीला ने पूछा, हे देवि ! यह जीव मृतक कैसे होता है और जन्म कैसे लेता है, मेरे बोध की दृढ़ता के निमित्त फिर कहो ? देवि बोली, हे लीले ! प्राण अपान की कला के आश्रय यह शरीर रहता है और जब मृतक होने लगता है तब प्राणवायु अपने स्थान को त्यागता है और जिस जिस स्थान की नाड़ी से वह निकलता है वह स्थान शिथिल हो जाता है। जब पुर्यष्टक शरीर से निकलता है तब प्राणकला टूट पड़ती है और चैतन्यता जड़ी भूत हो जाती है। तब परिवारवाले लोग उसको प्रेत कहते हैं। हे लीले ! तब चित्त की चैतन्यता जड़ी भूत हो जाती है और केवल चैतन्य जो ब्रह्मसत्ता है सो ज्यों की त्यों रहती है। जो स्थावर जङ्गम सर्व जगत् और आकाश, पहाड़, वृक्ष, अग्नि, वायु आदिक सर्व पदार्थों में व्याप रहा है और उदय अस्त से रहित है। हे लीले ! जब मृत्यु मूर्च्छा होती है तब प्राणपवन आकाश में लीन होते हैं। उन प्राणों में चैतन्यता होती है और चैतन्यता में वासना होती है। ऐसी जो प्राण और चैतन्य-सत्ता है सो वासना को लेकर आकाश में आकाशरूप स्थित होती है। जैसे गन्ध को लेकर आकाश में वायु स्थित होता है वैसे ही वासना को लेकर चैतन्यता स्थित होती है। हे लीले ! उस अपनी वासना के अनुसार उसे जगत् फुर आता है वह देश, काल, क्रिया और द्रव्य सहित देखता है। मृत्यु भी दो प्रकार की है एक पापात्मा की और दूसरी पुण्यात्मा की। पापी तीन प्रकार के हैं-एक महापापी, दूसरे मध्यम पापी और तीसरे अल्प पापी। ऐसे ही पुण्यवान् भी तीन प्रकार के हैं-एक महापुण्यवान्, दूसरा मध्यम पुण्यवान् और तीसरा अल्प पुण्यवान् । प्रथम पापियों की मृत्यु सुनिये। जब बड़ा पापी मृतक होता
उत्पत्ति प्रकरण । २४१
है तब वह जर्जरीभूत हो जाता है और घन पाषाण की नाई सहस्रों वर्षों तक मूर्च्छा में पड़ा रहता है। कितने ऐसे जीव हैं जिनको उस मूर्च्छा में भी दुःख होता है। बाहर इन्द्रियों को दुःख होता है तब उसके रागद्वेष को लेकर चित्त की वृत्ति हृदय में स्थित होती है वैसे ही पाप-वासना का दुःख हृदय में होता है और भीतर से जलता है। इस प्रकार जड़ीभूत मूर्च्छा में रहता है। इसके अनन्तर उसको फिर चैतन्यता फुर आती है तब अपने साथ शरीर देखता है। फिर नरक भोगता है और चिरकाल पर्यन्त नरक भोग के बहुतेरे जन्म पशु आदिकों के लेता है और महानीच और दरिद्री निर्धनों के गृह में जन्म लेकर वहाँ भी दुःखों से तप्त रहता है। हे लीले ! यह महापापियों की मृत्यु तुझसे कही। अब मध्यम पापी की मृत्यु सुन। जब मध्यम पापी की मृत्यु होती है तब वह भी वृक्ष की नाईं मूर्च्छा से जड़ीभूत हो जाता है और भीतर दुःख से जलता है। जड़ीभूत से थोड़े काल में फिर चेतनता पाता है। फिर नरक भुगत्तता है और नरक भोग के तिर्यगादिक योनि भुगत्तता है। उसके पीछे वासना के अनुसार मनुष्य-शरीर पाता है। अब अल्प पापी की मृत्यु सुनो। हे लीले ! जब अल्पपापी मृतक होता है तब मूर्च्छित हो जाता है और कुछ काल में उसको चेतनता फुरती है। फिर नरक में जाकर भुगत्तता है; फिर कर्मों के अनुसार और जन्मों को भुगत्तता है। और फिर मनुष्य शरीर धारता है। हे लीले ! यह पापात्मा की मृत्यु कही अब धर्मात्मा की मृत्यु सुन। जो महा धर्मात्मा है वह जब मृतक होता है तब उसके निमित्त विमान आते हैं उन पर आरूढ़ कराके उसे स्वर्ग में ले जाते हैं। जिस इष्टदेवता की वासना उसके हृदय में होती है उसके लोक में उसे ले जाते हैं और उसके कर्मानुसार स्वर्ग सुख भुगत्तता है स्वर्ग सुख जो गन्धर्व, विद्याधर, अप्सरा आदिक भोग हैं उनको भोग के फिर गिरता है और किसी फल में स्थित होता है। तब उस फल को मनुष्य भोजन करता है तब वीर्य में जा स्थित होता है और उस वीर्य से माता के गर्भ में स्थित होता है। वहाँ से वासना के अनुसार फिर जन्म लेता है; जो भोग की कामना होती है तो श्रीमान् धर्मात्मा के
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गृह में जन्म होता है और जो भोग से निष्काम होता है तब सन्तजनों के गृह में जन्म लेता है । अब मध्यम धर्मात्मा की मृत्यु सुनो । हे लीले ! जो मध्यम धर्मात्मा मृतक होता है उसको शीघ्र ही चैतन्यता फुर आती है और वह स्वर्ग में जाकर अपने पुण्य के अनुसार स्वर्ग भोग के फिर गिरकर किसी फल में स्थित होता है । जब फिर उस फल को कोई पुरुष भोजन करता है तब पिता के वीर्य द्वारा माता के गर्भ में आता है और वासना के अनुसार जन्म लेता है । अल्प धर्मात्मा जब मृतक होता है तब उसको यह फुर आता है कि मैं मृतक हुआ हूँ; मेरे बान्धवों और पुत्रों ने मेरी पिण्डक्रिया की है और पितरलोक में चला जाता हूँ । वहाँ वह पितरलोक का अनुभव करता है और वहाँ के सुख भोग के गिरता है तब धान्य में स्थित होता है । जब उस धान्य को पुरुष भोजन करता है तब वीर्यरूप होके स्थित होता है । फिर उस वीर्य द्वारा माता के गर्भ में आ जाता है और वासना के अनुसार जन्म लेता है । हे लीले ! जब पापी मृतक होता है तब उसको महाक्रूर मार्ग भासता है और उस मार्ग पर चलता है जिसमें चरणों में कण्टक चुभते हैं; शीश पर सूर्य तपता है और धूप से शरीर कष्टवान् होता है । जो पुण्यवान् होता है उसको सुन्दर छाया का अनुभव होता है और वावली और सुन्दर स्थानों के मार्ग से यमदूत उसको धर्मराज के पास ले जाते हैं । धर्मराज चित्रगुप्त से पूछते हैं तो चित्रगुप्त पुण्यवानों के पुण्य और पापियों के पाप प्रकट करते हैं और वह कर्मों के अनुसार स्वर्ग और नरक को भुगत्तता है फिर वहाँ से गिरके धान्य अथवा और किसी फल में आन स्थित होता है । जब उस अन्न को पुरुष भोजन करता है तब वह स्वप्नवासना को लेकर वीर्य में आन स्थित होता है । जब पुरुष का स्त्री के साथ संयोग होता है तब वीर्य द्वारा माता के गर्भ में आता है । वहाँ भी अपने कर्मों के अनुसार माता के गर्भ को प्राप्त होता है और उस माता के गर्भ में इसको अनेक जन्मों का स्मरण होता है । फिर बाहर निकल के महामूढ़ बाल अवस्था धारण करता है; तब उसे पिछली स्मृति विस्मरण हो जाती है और परमार्थ की कुछ सुध नहीं