योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २३५
शान्तरूप और आत्मानन्द से तृप्त रहते हैं, पर अज्ञानी शान्ति कैसे पावै। जैसे जिसको ताप चढ़ा होता है उसका अन्तःकरण जलता है और तृषा भी बहुत लगती है वैसे ही जिसको अज्ञानरूपी ताप चढ़ा हुआ है उसका अन्तर राग-द्वेष से जलता है और विषयों की तृष्णारूपी तृषा भी बहुत होती है । जिसका अज्ञानरूपी तम नष्ट हुआ है उसका अन्तर राग-द्वेषादिक से नहीं जलता और उसकी विषय की तृष्णा भी नष्ट हो जाती है। इति श्रीयोगवाशिष्ठे मण्डपाकाशगमनवर्णनन्नाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥
देवी बोली हे लीले ! जो पुरुष अविदितवेद है अर्थात् जिसने जानने योग्य पद नहीं जाना वह बड़ा पुण्यवान् भी हो तो भी उसको अन्तवाहकत्ता नहीं प्राप्त होती । अन्तवाहक शरीर भी झूठ है, क्योंकि सङ्कल्परूप है । इससे जितना जगत् तुझको भासता है वह कुछ उपजा नहीं; शुद्ध चिदाकाश सत्ता अपने आपमें स्थिर है । फिर लीला ने पूछा हे देवि ! जो यह सब जगत् सङ्कल्पमात्र है तो भाव और अभाव-रूप पदार्थ कैसे होते हैं ? अग्नि उष्णरूप है, पृथ्वी स्थिररूप है, वरफ शीतल है, आकाश की सत्ता है, काल की सत्ता है, कोई स्थूल है, कोई सूक्ष्म पदार्थ है, ग्रहण, त्याग, जन्म, मरण होता है; और मृतक हुआ फिर जन्मता है इत्यादिक सत्ता कैसे भासती है ? देवी बोली, हे लीले ! जब महाप्रलय होता है तब सब पदार्थ अभाव को प्राप्त होते हैं और काल की सत्ता भी नष्ट हो जाती है । उसके पीछे अनन्त चिदाकाश; सब कल्पनाओं से रहित और बोधमात्र ब्रह्मसत्ता ही रहती है । उस चैतन्य-मात्रसत्ता से जब चित्तसंवित् होती है तब चैतन्यसंवित् में आपको तेज अणु जानता है । जैसे स्वप्न में कोई आपको पक्षीरूप उड़ता देखे वैसे ही देखता है । उससे स्थूलता होती है; वही स्थूलता ब्रह्माण्डरूप होती है उससे तेज अणु आपको ब्रह्मारूप जानता है । फिर ब्रह्मारूप होकर जगत् को रचता है । जैसे जैसे ब्रह्मा चेतता जाता है वैसे ही वैसे स्थूल रूप होता जाता है । आदि रचना ने जैसा निश्चय किया है कि 'यह ऐसे हो' और 'इतने काल रहे' उसका नाम नीति है । जैसे आदि रचना नियत की है वह ज्यों की त्यों होती है; उसके निवारण करने