भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 233

२३६ योगवाशिष्ठ ।

को किसी की सामर्थ्य नहीं वास्तव में आदि ब्रह्मा भी अकारणरूप है अर्थात् कुछ उपजा नहीं तो जगत् का उपजना में कैसे कहूँ ? हे लीले ! कोई स्वरूप से नहीं उपजा परन्तु चेतना संवेदन के फुरने से जगत् आकार हो के भासता है। उसमें जैसे निश्चय है वैसे ही स्थित है। अग्नि उष्ण ही है; बर्फ शीतल ही है और पृथ्वी स्थितरूप ही है। जैसे उपजे हैं वैसे ही स्थित हैं। हे लीले ! जो चेतन है उस पर यह नीति है कि वह उपदेश का अधिकारी है और जो जड़ है उसमें वही जड़ता स्वभाव है। जो आदि चित्संवित् में आकाश का फुरना हुआ तो आकाशरूप होकर ही स्थित हुआ। जब काल का स्पन्द फुरता है तब वही चेतन संवित् कालरूप होकर स्थित होता है; जब वायु का फुरना होता है तब वही संवित् वायुरूप होकर स्थित होता है। इसी प्रकार अग्नि, जल, पृथ्वी नानारूप होकर स्थित हुए हैं। स्थूल, सूक्ष्म रूप होकर चेतन संवित् ही स्थित हो रहा है। जैसे स्वप्न में चेतन संवित् ही पर्वत वृक्षरूप होकर स्थित होता है वैसे ही चेतन संवित् जगतरूप होकर स्थित हुआ है। हे लीले ! जैसे आदि नीति ने पदार्थों के सङ्कल्परूप धारे हैं वैसे ही स्थित हैं उसके निवारण करने की किसी की सामर्थ्य नहीं, क्योंकि चेतन का तीव्र अभ्यास हुआ है। जब वही संवित् उलटकर और प्रकार स्पन्द हो तब और ही प्रकार हो; अन्यथा नहीं होता। हे लीले ! यह जगत् सत् नहीं। जैसे सङ्कल्पनगर भ्रमसिद्ध है और जैसे स्वप्नपुरुष और ध्याननगर असत्रूप होता है वैसे ही यह जगत् भी असत्-रूप है और अज्ञान से सत् की नांई भासता है। जैसे स्वप्न सृष्टि के आदि में तन्मात्रसत्ता होती है और उस तन्मात्रसत्ता का आभास किञ्चित् स्वप्नसृष्टि का कारण होता है वैसे ही यह जाग्रत् जगत् के आदि तन्मात्रसत्ता होती है और उससे किञ्चन अकारण रूप यह जगत् होता है। हे लीले ! यह जगत् वास्तव में कुछ उपजा नहीं; असत् ही सत् की नांई होकर भासता है। जैसे स्वप्न की अग्नि स्वप्न में असत् ही सत्-रूप हो भासती है वैसे ही अज्ञान से यह असत् जगत् सत् भासता है और जन्म, मृत्यु और कर्मों का फल होता है सो तू श्रवण कर। हे लीले !