योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
२३६ योगवाशिष्ठ ।
को किसी की सामर्थ्य नहीं वास्तव में आदि ब्रह्मा भी अकारणरूप है अर्थात् कुछ उपजा नहीं तो जगत् का उपजना में कैसे कहूँ ? हे लीले ! कोई स्वरूप से नहीं उपजा परन्तु चेतना संवेदन के फुरने से जगत् आकार हो के भासता है। उसमें जैसे निश्चय है वैसे ही स्थित है। अग्नि उष्ण ही है; बर्फ शीतल ही है और पृथ्वी स्थितरूप ही है। जैसे उपजे हैं वैसे ही स्थित हैं। हे लीले ! जो चेतन है उस पर यह नीति है कि वह उपदेश का अधिकारी है और जो जड़ है उसमें वही जड़ता स्वभाव है। जो आदि चित्संवित् में आकाश का फुरना हुआ तो आकाशरूप होकर ही स्थित हुआ। जब काल का स्पन्द फुरता है तब वही चेतन संवित् कालरूप होकर स्थित होता है; जब वायु का फुरना होता है तब वही संवित् वायुरूप होकर स्थित होता है। इसी प्रकार अग्नि, जल, पृथ्वी नानारूप होकर स्थित हुए हैं। स्थूल, सूक्ष्म रूप होकर चेतन संवित् ही स्थित हो रहा है। जैसे स्वप्न में चेतन संवित् ही पर्वत वृक्षरूप होकर स्थित होता है वैसे ही चेतन संवित् जगतरूप होकर स्थित हुआ है। हे लीले ! जैसे आदि नीति ने पदार्थों के सङ्कल्परूप धारे हैं वैसे ही स्थित हैं उसके निवारण करने की किसी की सामर्थ्य नहीं, क्योंकि चेतन का तीव्र अभ्यास हुआ है। जब वही संवित् उलटकर और प्रकार स्पन्द हो तब और ही प्रकार हो; अन्यथा नहीं होता। हे लीले ! यह जगत् सत् नहीं। जैसे सङ्कल्पनगर भ्रमसिद्ध है और जैसे स्वप्नपुरुष और ध्याननगर असत्रूप होता है वैसे ही यह जगत् भी असत्-रूप है और अज्ञान से सत् की नांई भासता है। जैसे स्वप्न सृष्टि के आदि में तन्मात्रसत्ता होती है और उस तन्मात्रसत्ता का आभास किञ्चित् स्वप्नसृष्टि का कारण होता है वैसे ही यह जाग्रत् जगत् के आदि तन्मात्रसत्ता होती है और उससे किञ्चन अकारण रूप यह जगत् होता है। हे लीले ! यह जगत् वास्तव में कुछ उपजा नहीं; असत् ही सत् की नांई होकर भासता है। जैसे स्वप्न की अग्नि स्वप्न में असत् ही सत्-रूप हो भासती है वैसे ही अज्ञान से यह असत् जगत् सत् भासता है और जन्म, मृत्यु और कर्मों का फल होता है सो तू श्रवण कर। हे लीले !
उत्पत्ति प्रकरण । २३७
बड़ा और छोटा जो होता है सो देश काल और द्रव्य से होता है। एक बाल्यावस्था में मृतक होते हैं और एक यौवन अवस्था में मृतक होते हैं। जिसकी देश काल और द्रव्य की चेष्टा यथाशास्त्र होती है उसकी गति भी शास्त्र के अनुसार होती है और जो चेष्टा शास्त्र के विरुद्ध होती है तो आयु भी वैसी ही होती है। एक क्रिया ऐसी है जिससे आयु वृद्धि होती है और एक क्रिया से घट जाती है। इसी प्रकार देश, काल, क्रिया, द्रव्य, आयु के घटाने बढ़ानेवाली हैं। उनमें जीवों के शरीर बड़ी सूक्ष्म अवस्था में स्थित है। यह आदि नीति रचा हैं। युगों की मर्यादा जैसे हैं वैसे ही है। एक सौ दिव्य वर्ष कलि-युग के; दो सौ दिव्य वर्ष द्वापर के; तीन सौ त्रेता के और चार सौ सत्युग के—यह दिव्य वर्ष हैं। लौकिक वर्षों के अनुसार चार लाख बत्तीस हजार वर्ष कलियुग है; आठलाख चौंसठ हजार वर्ष द्वापरयुग है; बारह लाख छानब्बे हजार वर्ष त्रेता है और सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष सतयुग हैं। इस प्रकार युगों की मर्यादा है जिनमें जीव अपने कर्मों के फल से आयु भोगते हैं। हे लीले ! जो पाप करनेवाले हैं वह मृतक होते हैं और उनको मृत्युकाल में भी बड़ा कष्ट होता है। फिर लीला ने पूछा, हे देवि ! मृतक होने पर सुख और दुःख कैसे होते हैं और कैसे उन्हें भोगते हैं ? देवी बोली, हे लीले ! जीव की तीन प्रकार की मृत्यु होती है—एक मूर्ख की, दूसरी धारणाभ्यासी की और तीसरी ज्ञानवान् की। उनका भिन्न भिन्न वृत्तान्त सुनो। हे लीले ! जो धारणाभ्यासी हैं वह मूर्ख भी नहीं और ज्ञानवान् भी नहीं; वह जिस इष्टदेवता की धारणा करते हैं शरीर को त्याग के उसी देवता के लोक को प्राप्त होते हैं और जो ब्रह्माभ्यासी हैं पर उनको पूर्ण दशा नहीं प्राप्त हुई उनका सुख से शरीर छूटता है। जैसे सुषुप्ति हो जाती है वैसे ही धारणाभ्यासी शरीर त्यागता है और फिर सुख भोगकर आत्मतत्त्व को प्राप्त होता है। ज्ञानवान् का शरीर भी सुख से छूटता है; उसको भी यत्न कुछ नहीं होता और उस ज्ञानी के प्राण भी वहीं लीन होते हैं और वह विदेहमुक्त होता है। जब मूर्ख की मृत्यु होने लगती है तो उसे बड़ा कष्ट होता है। मूर्ख वही है जिसकी अज्ञानियों की
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संगति है; जो शास्त्रों के अनुसार नहीं विचरता और सदा विषयों की ओर धावता और पापाचार करता है। ऐसे पुरुष को शरीर त्यागने में बड़ा कष्ट होता है। हे लीले ! जब मनुष्य मृतक होने लगता है तब पदार्थों से आसक्तिबुद्धि जो बँधी थी उससे वियोग होने लगता है और कण्ठ रुक जाता है; नेत्र फट जाते हैं और शरीर की कान्ति ऐसी विरूप हो जाती है जैसे कमल का फूल कटा हुआ कुम्हिला जाता है। अङ्ग टूटने लगते हैं और प्राण नाड़ियों से निकलते हैं। जिन अङ्गों से तदात्म सम्बन्ध हुआ था और पदार्थों में बहुत स्नेह था उनसे वियोग होने लगता है इससे बड़ा कष्ट होता है। जैसे किसी को अग्नि के कुण्ड में डालने से कष्ट होता है वैसे ही उसको भी कष्ट होता है। सब पदार्थ भ्रम से भासते हैं पृथ्वी आकाशरूप और आकाश पृथ्वीरूप भासते हैं। निदान महाविपर्यय दशा में प्राप्त होता है और चित्त की चेतनता घटती जाती है। ज्यों-ज्यों चित्त की चेतनता घटती जाती है त्यों-त्यों पदार्थ के ज्ञान से अन्धा हो जाता है। जैसे सायंकाल में सूर्य अस्त होता है तो भ्रान्तिमान नेत्र को दिशा का ज्ञान नहीं रहता वैसे ही इसको पदार्थों का ज्ञान नहीं रहता और कष्ट का अनुभव करता है। जैसे आकाश से गिरता है और पाषाण में पीसा जाता है, जैसे अन्ध कूप में गिरता है और कोल्हू में पेरा जाता है, जैसे रथ से गिरता है और गले में फाँसी डाल के खींचा जाता है; और जैसे वायु से तरङ्गों में उछलता और बड़वाग्नि में जलता कष्ट पाता है वैसे ही मूर्ख मृत्युकाल में कष्ट पाता है। जब पुर्यष्टक का वियोग होता है तब मूर्च्छा से जड़ता हो जाता है और शरीर अखण्डित पड़ा रहता है। लीला ने पूछा, हे देवि ! जब जीव मृतक होने लगता है तब इसको मूर्च्छा कैसे होती है ? शरीर तो अखण्डित पड़ा रहता है, कष्ट कैसे पाता है ? देवी बोली, हे लीले ! जो कुछ जीव ने अहंकारभाव को लेकर कर्म किये हैं वे सब इकट्ठे हो जाते हैं और समय पाके प्रकट होते हैं जैसे बोया बीज समय पाके फल देता है वैसे ही उसको कर्मवासनासहित फल आन प्रकट होता है। जब इस प्रकार शरीर छूटने लगता है तब शरीर
उत्पत्ति प्रकरण । २३६
की तादात्म्यता और पदार्थों के स्नेह के वियोग से इसको कष्ट होता है। प्राण अपान की जो कला है और जिसके आश्रय शरीर होता है सो टूटने लगता है। जिन स्थानों में प्राण फुरते थे उन स्थानों और नाड़ियों से निकल जाते हैं और जिन स्थानों से निकलते हैं वहाँ फिर प्रवेश नहीं करते। जब नाड़ियाँ जर्जरीभूत हो जाती हैं और सब स्थानों को प्राण त्याग जाते हैं तब यह पुर्यष्टक शरीर को त्याग निर्वाण होता है। जैसे दीपक निर्वाण हो जाता है और पत्थर की शिला जड़ीभूत होती है वैसे ही पुर्यष्टक शरीर को त्यागकर जड़ीभूत हो जाती है और प्राण अपान की कला टूट पड़ती है। हे लीले! मरना और जन्म भी भ्रान्ति से भासता है—आत्मा में कोई नहीं। संवित्मात्र में जो संवेदन फुरता है सो अन्य स्वभाव से सत्य की नाईं होकर स्थित होता है और मरण और जन्म उसमें भासते हैं और जैसी-जैसी वासना होती है उसके अनुसार सुखदुःख का अनुभव करता है। जैसे कोई पुरुष नदी में प्रवेश करता है तो उसमें कहीं बहुत जल और कहीं थोड़ा होता है, कहीं बड़े तरङ्ग होते हैं और कहीं सोमजल होता है पर वे सब सोमजल में होते हैं, वैसे ही जैसी वासना होती है उसी के अनुसार सुख दुःख का अनुभव होता है और अधः, ऊर्ध्व, मध्य, वासनारूपी गढ़े में गिरते हैं। शुद्ध चैतन्यमात्र में कोई कल्पना नहीं अनेक शरीर नष्ट हो जाते हैं और चैतन्यसत्ता ज्यों की त्यों रहती है। जो चैतन्यसत्ता भी मृतक हो तो एक के नष्ट हुए सब नष्ट हो जाये पर ऐसा तो नहीं होता चैतन्यसत्ता से सब कुछ सिद्ध होता है; जो वह न हो तो कोई किसी को न जाने। हे लीले! चैतन्यसत्ता न जन्मती है और न मरती है, वह तो सर्वकल्पना से रहित केवल चिन्मात्र है उसका किसी काल में कैसे नाश हो? जन्ममरण की कल्पना संवेदन में होती है अचेत चिन्मात्र में कुछ नहीं हुआ। हे लीले! मरता वही है जिसके निश्चय में मृत्यु का सद्भाव होता है। जिसके निश्चय में मृत्यु का सद्भाव नहीं वह कैसे मरे? जीव जब को दृश्य का अत्यन्त अभाव हो तब बन्धों से मुक्त हो। वासना ही इनके बन्धन का कारण है; जब वासना से मुक्त होता है तब बन्धन कोई नहीं रहता! हे लीले! आत्मविचार से
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ज्ञान होता है और ज्ञान से दृश्य का अत्यन्ताभाव होता है। जब दृश्य का अत्यन्ताभाव हुआ तब सब वासना नष्ट हो जाती हैं । यह जगत् उदय हुआ नहीं, परन्तु उदय हुए की नाईं वासना से भासता है। इससे वासना का त्याग करो । जब वासना निवृत्त होगी तब वन्धन कोई न रहेगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मृत्युविचारवर्णनंनाम सप्तत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३७ ॥
लीला ने पूछा, हे देवि ! यह जीव मृतक कैसे होता है और जन्म कैसे लेता है, मेरे बोध की दृढ़ता के निमित्त फिर कहो ? देवि बोली, हे लीले ! प्राण अपान की कला के आश्रय यह शरीर रहता है और जब मृतक होने लगता है तब प्राणवायु अपने स्थान को त्यागता है और जिस जिस स्थान की नाड़ी से वह निकलता है वह स्थान शिथिल हो जाता है। जब पुर्यष्टक शरीर से निकलता है तब प्राणकला टूट पड़ती है और चैतन्यता जड़ी भूत हो जाती है। तब परिवारवाले लोग उसको प्रेत कहते हैं। हे लीले ! तब चित्त की चैतन्यता जड़ी भूत हो जाती है और केवल चैतन्य जो ब्रह्मसत्ता है सो ज्यों की त्यों रहती है। जो स्थावर जङ्गम सर्व जगत् और आकाश, पहाड़, वृक्ष, अग्नि, वायु आदिक सर्व पदार्थों में व्याप रहा है और उदय अस्त से रहित है। हे लीले ! जब मृत्यु मूर्च्छा होती है तब प्राणपवन आकाश में लीन होते हैं। उन प्राणों में चैतन्यता होती है और चैतन्यता में वासना होती है। ऐसी जो प्राण और चैतन्य-सत्ता है सो वासना को लेकर आकाश में आकाशरूप स्थित होती है। जैसे गन्ध को लेकर आकाश में वायु स्थित होता है वैसे ही वासना को लेकर चैतन्यता स्थित होती है। हे लीले ! उस अपनी वासना के अनुसार उसे जगत् फुर आता है वह देश, काल, क्रिया और द्रव्य सहित देखता है। मृत्यु भी दो प्रकार की है एक पापात्मा की और दूसरी पुण्यात्मा की। पापी तीन प्रकार के हैं-एक महापापी, दूसरे मध्यम पापी और तीसरे अल्प पापी। ऐसे ही पुण्यवान् भी तीन प्रकार के हैं-एक महापुण्यवान्, दूसरा मध्यम पुण्यवान् और तीसरा अल्प पुण्यवान् । प्रथम पापियों की मृत्यु सुनिये। जब बड़ा पापी मृतक होता
उत्पत्ति प्रकरण । २४१
है तब वह जर्जरीभूत हो जाता है और घन पाषाण की नाई सहस्रों वर्षों तक मूर्च्छा में पड़ा रहता है। कितने ऐसे जीव हैं जिनको उस मूर्च्छा में भी दुःख होता है। बाहर इन्द्रियों को दुःख होता है तब उसके रागद्वेष को लेकर चित्त की वृत्ति हृदय में स्थित होती है वैसे ही पाप-वासना का दुःख हृदय में होता है और भीतर से जलता है। इस प्रकार जड़ीभूत मूर्च्छा में रहता है। इसके अनन्तर उसको फिर चैतन्यता फुर आती है तब अपने साथ शरीर देखता है। फिर नरक भोगता है और चिरकाल पर्यन्त नरक भोग के बहुतेरे जन्म पशु आदिकों के लेता है और महानीच और दरिद्री निर्धनों के गृह में जन्म लेकर वहाँ भी दुःखों से तप्त रहता है। हे लीले ! यह महापापियों की मृत्यु तुझसे कही। अब मध्यम पापी की मृत्यु सुन। जब मध्यम पापी की मृत्यु होती है तब वह भी वृक्ष की नाईं मूर्च्छा से जड़ीभूत हो जाता है और भीतर दुःख से जलता है। जड़ीभूत से थोड़े काल में फिर चेतनता पाता है। फिर नरक भुगत्तता है और नरक भोग के तिर्यगादिक योनि भुगत्तता है। उसके पीछे वासना के अनुसार मनुष्य-शरीर पाता है। अब अल्प पापी की मृत्यु सुनो। हे लीले ! जब अल्पपापी मृतक होता है तब मूर्च्छित हो जाता है और कुछ काल में उसको चेतनता फुरती है। फिर नरक में जाकर भुगत्तता है; फिर कर्मों के अनुसार और जन्मों को भुगत्तता है। और फिर मनुष्य शरीर धारता है। हे लीले ! यह पापात्मा की मृत्यु कही अब धर्मात्मा की मृत्यु सुन। जो महा धर्मात्मा है वह जब मृतक होता है तब उसके निमित्त विमान आते हैं उन पर आरूढ़ कराके उसे स्वर्ग में ले जाते हैं। जिस इष्टदेवता की वासना उसके हृदय में होती है उसके लोक में उसे ले जाते हैं और उसके कर्मानुसार स्वर्ग सुख भुगत्तता है स्वर्ग सुख जो गन्धर्व, विद्याधर, अप्सरा आदिक भोग हैं उनको भोग के फिर गिरता है और किसी फल में स्थित होता है। तब उस फल को मनुष्य भोजन करता है तब वीर्य में जा स्थित होता है और उस वीर्य से माता के गर्भ में स्थित होता है। वहाँ से वासना के अनुसार फिर जन्म लेता है; जो भोग की कामना होती है तो श्रीमान् धर्मात्मा के
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गृह में जन्म होता है और जो भोग से निष्काम होता है तब सन्तजनों के गृह में जन्म लेता है । अब मध्यम धर्मात्मा की मृत्यु सुनो । हे लीले ! जो मध्यम धर्मात्मा मृतक होता है उसको शीघ्र ही चैतन्यता फुर आती है और वह स्वर्ग में जाकर अपने पुण्य के अनुसार स्वर्ग भोग के फिर गिरकर किसी फल में स्थित होता है । जब फिर उस फल को कोई पुरुष भोजन करता है तब पिता के वीर्य द्वारा माता के गर्भ में आता है और वासना के अनुसार जन्म लेता है । अल्प धर्मात्मा जब मृतक होता है तब उसको यह फुर आता है कि मैं मृतक हुआ हूँ; मेरे बान्धवों और पुत्रों ने मेरी पिण्डक्रिया की है और पितरलोक में चला जाता हूँ । वहाँ वह पितरलोक का अनुभव करता है और वहाँ के सुख भोग के गिरता है तब धान्य में स्थित होता है । जब उस धान्य को पुरुष भोजन करता है तब वीर्यरूप होके स्थित होता है । फिर उस वीर्य द्वारा माता के गर्भ में आ जाता है और वासना के अनुसार जन्म लेता है । हे लीले ! जब पापी मृतक होता है तब उसको महाक्रूर मार्ग भासता है और उस मार्ग पर चलता है जिसमें चरणों में कण्टक चुभते हैं; शीश पर सूर्य तपता है और धूप से शरीर कष्टवान् होता है । जो पुण्यवान् होता है उसको सुन्दर छाया का अनुभव होता है और वावली और सुन्दर स्थानों के मार्ग से यमदूत उसको धर्मराज के पास ले जाते हैं । धर्मराज चित्रगुप्त से पूछते हैं तो चित्रगुप्त पुण्यवानों के पुण्य और पापियों के पाप प्रकट करते हैं और वह कर्मों के अनुसार स्वर्ग और नरक को भुगत्तता है फिर वहाँ से गिरके धान्य अथवा और किसी फल में आन स्थित होता है । जब उस अन्न को पुरुष भोजन करता है तब वह स्वप्नवासना को लेकर वीर्य में आन स्थित होता है । जब पुरुष का स्त्री के साथ संयोग होता है तब वीर्य द्वारा माता के गर्भ में आता है । वहाँ भी अपने कर्मों के अनुसार माता के गर्भ को प्राप्त होता है और उस माता के गर्भ में इसको अनेक जन्मों का स्मरण होता है । फिर बाहर निकल के महामूढ़ बाल अवस्था धारण करता है; तब उसे पिछली स्मृति विस्मरण हो जाती है और परमार्थ की कुछ सुध नहीं
उत्पत्ति प्रकरण । २४३
होती केवल क्रीड़ा में मग्न होता है उसमें आगे यौवन अवस्था आती है तो कामादिक विकारों से अन्धा हो जाता है और कुछ विचार नहीं रहता । फिर वृद्धावस्था आती है तो शरीर महाकृश हो जाता है, बहुत रोग उपजते हैं और शरीर कुरूप हो जाता है । जैसे कमलों पर बरफ पड़ती है वे कुम्हिला जाते हैं वैसे ही वृद्ध अवस्था में शरीर कुम्हिला जाता है और सब शक्ति घटकर तृष्णा बढ़ती जाती है । फिर कष्टवान् होकर मृतक होता है तब वासना के अनुसार स्वर्ग नरक के भोगों को प्राप्त होता है। इस प्रकार संसारचक्र में वासना के अनुसार घटीयन्त्र की नाईं भ्रमता है-स्थिर कदाचित् नहीं होता । हे लीले ! इस प्रकार जीव आत्मपद के प्रमाद से जन्ममरण पाता है और फिर माता के गर्भ में आके बाल, यौवन, वृद्ध और मृतक अवस्था को प्राप्त होता है । फिर वासना के अनुसार परलोक देखता है और जाग्रत् को स्वप्ने की नाईं भ्रम से फिर देखता है जैसे स्वप्ने से स्वप्नान्तर देखता है वैसे ही अपनी कल्पना से जगत्भ्रम फुरता है । स्वरूप में किसी को कुछ भ्रम नहीं आकाशरूप आकाश में स्थित है, भ्रम से विकार भासते हैं । लीला ने पूछा, हे देवी ! परब्रह्म में यह जगत् भ्रम से कैसे हुआ है ? मेरे बोध को दृढ़ता के निमित्त कहो । देवी बोली, हे लीले ! सब आत्म-रूप हैं, पहाड़, वृक्ष, पृथ्वी, आकाशादिक स्थावर-जङ्गम जो कुछ जगत् है वह सब परमार्थघन है और परमार्थसत्ता ही सर्व आत्मा है । हे लीले ! उस सत्ता संवित् आकाश में जब संवेदन आभास फुरता है तब जगत्भ्रम भासता है । आदि संवेदन जो संवित्मात्र में हुआ है सो ब्रह्मरूप होकर स्थिर हुआ है और जैसे वह चेतता गया है उसी प्रकार स्थावर-जङ्गम जगत् होकर स्थित हुआ है । हे लीले ! शरीर के भीतर नाड़ी है नाड़ी में छिद्र हैं और उन छिद्रों में स्पन्दरूप होकर प्राण विचर-रता है उसको जीव कहते हैं । जब यह जीव निकल जाता है तब शरीर मृतक होता है । हे लीले ! जैसे-जैसे आदि संवित्मात्र में संवेदन फुरा है वैसे ही वैसे अब तक स्थित है । जब उसने चेता कि मैं जड़ होऊँ तब वह जडरूप पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, आकाश, पर्वत, वृक्षादिक
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स्थित हुए और जब चेतन की भावना की तब चेतनरूप होकर स्थित हुआ । हे लीले ! जिसमें प्राणक्रिया होती है वह जङ्गमरूप बोलते चलते हैं और जिसमें प्राण स्पन्द क्रिया नहीं पाई जाती सो स्थावर, पर हैं रूप आत्मसत्ता में दोनों तुल्य हैं, जैसे जङ्गम है वैसे ही स्थावर हैं और दोनों चैतन्य हैं । जैसे जङ्गम में चैतन्यता है वैसे ही स्थावर में चैतन्यता है । यदि तू कहे कि स्थावर में चेतनता क्यों नहीं भासती तो उसका उत्तर यह है कि जैसे उत्तर दिशा के समुद्रवाले मनुष्य की बोली को दक्षिण दिशा के समुद्रवाले नहीं जानते और दक्षिण दिशा के समुद्रवाले की बोली उत्तर दिशा के समुद्रवाले नहीं समझ सकते वैसे ही स्थावरों की बोली जङ्गम नहीं समझ सकते और जङ्गमों की बोली स्थावर नहीं समझ सकते परन्तु परस्पर अपनी-अपनी जाति में सब चेतन हैं--उसका ज्ञान उसको नहीं होता और उसका ज्ञान उसको नहीं होता । जैसे एक कूप का दर्दुर और कूप के दर्दुर को नहीं जानता और दूसरे कूप का दर्दुर उस कूप के दर्दुर को नहीं जानता वैसे ही जङ्गमों की बोली स्थावर नहीं जान सकते और स्थावरों की बोली जङ्गम नहीं जान सकते । हे लीले ! जो आदि संवित् में संवेदन फुरा है वैसा ही रूप होकर महाप्रलय पर्यन्त स्थित है—अन्यथा नहीं होता । जब उस संवित् में आकाश का संवेदन फुरता है तब आकाशरूप होकर स्थित होता है; जब स्पन्दता को चेतता है तब वायुरूप होकर स्थित होता है; जब उष्णता को चेतता है तब अग्निरूप होकर स्थिर होता है; जब द्रवता को चेतता है तब जलरूप होकर स्थित होता है और जब गन्ध की चिन्तवना करता है तब पृथ्वीरूप होकर स्थित होता है । इसी प्रकार जिन जिनको चेतता है वे पदार्थ प्रकट होते हैं । आत्मसत्ता में सब प्रतिबिम्बित हैं । वास्तव में न कोई स्थावर है न जङ्गम है, केवल ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है और उसमें भ्रम से जगत् भासते हैं और दूसरी कुछ वस्तु नहीं । हे लीले ! अब राजा विदूरथ को देख कि मृतक होता है । लीला ने पूछा, हे देवि ! यह राजा पद्म के शरीरवाले मण्डप में किस मार्ग से जावेगा और इसके पीछे हम किस मार्ग से जावेंगे ? देवी बोली हे लीले ! यह
उत्पत्ति प्रकरण । २४५
अपनी वासना के अनुसार मनुष्यमार्ग के राह जावेगा । है तो यह चिदाकाशरूप परन्तु अज्ञान के वश इसको दूर स्थान भासेगा और हम भी इसी मार्ग मे इसके संकल्प के साथ अपना संकल्प मिलाके जावेंगे । जब तक संकल्प से संकल्प नहीं मिलता तब तक एकत्वभाव नहीं होता । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवीजी ने लीला को परम बोध का कारण उपदेश किया कि इतने में राजा जर्जरीभूत होने लगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने संसारभ्रमवर्णनन्नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवी और लीला देखती थी कि राजा के नेत्र फट गये और शरीर निरस हो गिर पड़ा और श्वास नासिका के मार्ग से निकल गया । तब जैसे रस सहित पत्र और कटा हुआ कमल विरस हो जाता है वैसे ही राजा का शरीर निरस हो गया; जो कुछ चित्त की चैतन्यता थी वह जर्जरीभूत हो गये, मृत्यु मूर्च्छारूपी अन्धकूप में जा पड़ा और चेतना और वासनासंयुक्त प्राण आकाश में जा स्थित हुए । प्राणों में जो चेतना थी और चेतना में वासना थी उस चेतना और वासना सहित प्राण जैसे वायु गन्ध को लेकर स्थित होता है आकाश में जा स्थित हुआ । हे रामजी ! राजा की पुर्यष्टक तो जर्जरीभूत हो गई परन्तु दोनों देवियाँ उसको दिव्य दृष्टि से ऐसे देखती थीं जैसे भ्रमरी गन्ध को देखती है । राजा एक मुहूर्त पर्यन्त तो मूर्च्छा में रहा फिर उसको चेतनता फुर आई और अपने साथ शरीर देखने लगा उसने जाना कि मेरे बान्धवों ने मेरी पिण्डक्रिया की है उसको मेरा शरीर भया है और धर्मराज के स्थान को मुझे दूत ले चले हैं । हे रामजी ! इस प्रकार अनुभव करता वह धर्मराज के स्थान को चला और उसके पीछे देवी, जैसे वायु के पीछे गन्ध चली जाती है, चली, जैसे गन्ध के पीछे भ्रमरी जाती है वैसे ही राजा विदूरथ धर्मराज के पास पहुँच गया । धर्मराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसके कर्म विचार के कहो । चित्रगुप्त ने कहा, हे भगवन् ! इसने कोई अपकर्म नहीं किया बल्कि बड़े-बड़े पुण्य किये हैं और भगवती सरस्वती का इसको वर है । इसका शव फूलों मे ढका हुआ है; उस शरीर में यह भगवती के
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वर से जाकर प्रवेश करेगा । इसमें अब कुछ कहना पूछना नहीं; यह तो देवीजी के वर से बँधा है। हे रामजी ! ऐसे कहकर यमराज ने राजा को अपने स्थान में चला दिया । तब राजा आगे चले और उनके पीछे दोनों देवियाँ चलीं । राजा को यह देवियाँ देखती थीं पर राजा इनको न देख सकता था । तब तीनों उस ब्रह्माण्ड को लाँघ, जिसका राज्य विदूरथ ने किया था, दूसरे ब्रह्माण्ड में आये और उसको भी लाँघ के पद्म राजा के देश में आकर उसके मन्दिर में, जहाँ फूलों से ढका शव था आये । जैसे मेघ से वायु आन मिलता है वैसे ही एक क्षण में देवियाँ आन मिलीं । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वह राजा तो मृतक हुआ था; मृतक होकर उसने उस मार्ग को कैसे पहिचाना ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वह विदूरथ जो मृतक हुआ था उसकी वासना नष्ट न हुई थी । अपनी उस वासना से वह अपने स्थान को प्राप्त हुआ । हे रामजी ! चिद्अणु जीव के उदर में भ्रान्तिमात्र जगत् है—जैसे वट के बीज में अनन्त वट वृक्ष होते हैं वैसे ही चिद्अणु में अनन्त जगत् हैं—जो अपने भीतर स्थिर है उसको क्यों न देखे ? जैसे जीव अपने जीवत्व का अंकुर देखता है वैसे ही स्वाभाविक चिद्अणु त्रिलोकी को देखता है । जैसे कोई पुरुष किसी स्थान में धन दबा रखे और आप दूर देश में जावे तो धन को वासना से देखता है वैसे ही वासना की दृढ़ता से विदूरथ ने देखा और जैसे कोई जीव स्वप्नभ्रम से किसी बड़े धनवान् के गृह में जा उपजता है और भ्रम के शान्त होने पर उसका अभाव देखता है वैसे ही उसको अनुभव हुआ । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जिसकी वासना पिण्डदान किया की नहीं होती वह मृतक होने पर अपने साथ कैसे देह को देखता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पुरुष जो माता-पिता के पिण्ड करता है उनकी वासना हृदय में होती है और वही फल रूप होकर भासती है कि मेरा शरीर है; मेरे पीछे मेरे बाँधवों ने पिण्ड-दान किया है उससे मेरा शरीर हुआ है । हे रामजी ! सदेह हो अथवा विदेह अपनी वासना ही के अनुसार अनुभव होता है—भावना से भिन्न अनुभव नहीं होता । चित्तमय पुरुष है; चित्त में जो पिण्ड की
उत्पत्ति प्रकरण । २४७
वासना दृढ़ होती है तो आपको पिण्डवान् ही जानता है और भावना के वश से असत् भी सत् हो जाता है । इससे पदार्थों का कारण भावना ही है; कारण बिना कार्य का उदय नहीं होता । महाप्रलय पर्यन्त कारण बिना कार्य होता नहीं देखा और सुना भी नहीं । इससे कहा है कि जैसी वासना होती है वैसा ही अनुभव होता है । रामजी ने पूछा हे भगवन् ! जिस पुरुष को अपने पिण्डदान आदि कर्मों की वासना नहीं वह जब मृतक होता है तब क्या प्रेतवासना संयुक्त होता है कि मैं पापी और प्रेत हूँ ? अथवा पीछे उसके बान्धव जो उसके निमित्त क्रिया-कर्म करते हैं और जो बान्धवों ने पिण्डक्रिया की है उससे उसे यह भावना होती है कि मेरा शरीर हुआ है वह क्रिया उसको प्राप्त होती है वा नहीं होती ? अथवा उसके बान्धवों के मन में यह दृढ़ भावना हुई कि इसको शवक्रिया प्राप्त होगी और वह अपने मन में धन अथवा पुत्रादिकों के अभाव से निराश है, और किसी प्रभाव से किसी ने पिण्डादिक क्रिया की वह उसको प्राप्त होती है अथवा नहीं होती ? आप तो कहते हैं कि भावना के वश से असत् भी सत् हो जाता है यह क्या है ?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! भावना, देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा इन पाँचों से होती है । जैसी भावना होती है वैसी ही सिद्ध होती है; जिसकी कर्त्तव्यता बली होती है उसकी जय होती है । पुत्र दारादिक बान्धव सब वासनारूप हैं । जो धर्म की वासना होती है तो बुद्धि में प्रसन्नता उपज आती है और पुण्यकर्मों से पूर्व भावना नष्ट हो शुभगति प्राप्त होती है । जो अति बली वासना होती है उसकी जय होती है । इससे अपने कल्याण के निमित्त शुभ का अभ्यास करना चाहिये ।
रामजी बोले, हे भगवन् ! जो देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा इन पाँचों से वासना होती है तो महाप्रलय और सर्ग का आदि में देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा कोई नहीं होती तो जहाँ पाँचों कारण नहीं होते और उसकी वासना भी नहीं होती उस अद्वैत से जगद्भ्रम फिर कैसे होता है ?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! महाप्रलय और सर्ग की आदि में देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा कोई नहीं
२४८ योगवाशिष्ठ ।
रहती और निमित्तकारण और समवायकारण का अभाव होता है। चिदात्मा में जगत् कुछ उपजा नहीं और है भी नहीं; वास्तव में दृश्य का अत्यन्त अभाव है और जो कुछ भासता है वह ब्रह्म का किञ्चन है। वह ब्रह्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थिर है। ऐसे ही अनेक युक्तियों से मैं तुमसे कहूँगा अब तुम पूर्व कथा सुनो। हे रामजी! जब वे दोनों देवियाँ उस मन्दिर में पहुँचीं तो क्या देखा कि फूलों से सुन्दर शीतल स्थान बने हुए हैं—जैसे वसन्तऋतु में वन भूमिका होती है—और प्रातःकाल का समय है; सुवर्ण के मङ्गलरूपी कुम्भ जल से भरे रक्खे हैं; दीपकों की प्रभा मिट गई है; किवाड़ चढ़े हुए हैं, मन्दिरों में सोये हुए मनुष्यों के श्वास आते जाते हैं और महासुन्दर झरोखे हैं। ऐसे बने हुए स्थान शोभा देते हैं जैसे सम्पूर्ण कला से चन्द्रमा शोभता है और जैसे इन्द्र के स्थान सुन्दर हैं। जिस सुन्दर कमल से ब्रह्माजी उपजे हैं वैसे ही वे कमल सुन्दर हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मरणानन्तरगावस्थावर्णनन्नामै- कोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तब दोनों देवियों में उस शव के पास विदूरथ की लीला को देखा वह उसकी मृत्यु से पहले वहाँ पहुँची है और पूर्व के से वस्त्राभूषण पहिरे हुए पूर्व का सा आचार किये, पूर्व की सी सुन्दर है और पूर्व का सा ही उसका शरीर है। एवम् उसका सुन्दर मुख चन्द्रमा की नाईं प्रकाशता है और महासुन्दर फूलों की भूमि पर बैठी है। निदान लक्ष्मी के समान लीला और विष्णु के समान राजा को देख, पर जैसे दिन के समय चन्द्रमा की प्रभा मध्यम होती है वैसे ही उन्होंने लीला को कुछ चिन्तासहित राजा की बाईं ओर एक हाथ चिबुक पर रक्खे और दूसरे हाथ से राजा को चमर करती देखा। पूर्व लीला ने इनको न देखा, क्योंकि ये दोनों प्रबुद्ध आत्मा और सत्यसंकल्प थीं और वह लीला इनके समान प्रबुद्ध न थी। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! उस मण्डप में पूर्व लीला जो देह को स्थापन कर और ध्यान में विदूरथ की सृष्टि देखने को सरस्वती के साथ गई थी उस देह का आपने कुछ वर्णन न किया कि उसकी क्या दशा हुई और कहाँ गई। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! लीला
उत्पत्ति प्रकरण । २४६
कहाँ थी, लीला का शरीर कहाँ था और उसकी सत्ता कहाँ थी ? वह तो अरुन्धती के मन में लीला के शरीर की भ्रान्ति प्रतिभा हुई थी । जैसे मरुस्थल में जल की प्रतिभा होती है वैसे ही लीला के शरीर की प्रतिभा उसे हुई थी । हे रामजी ! यह आधिभौतिक अज्ञान से भासता है और बोध से निवृत्त हो जाता है । जब उस लीला को बोध में परिणाम हुआ तब उसका आधिभौतिक शरीर निवृत्त हो गया-जैसे सूर्य के तेज से बरफ का पुतला गल जाता है-और आन्तवाहिकता उदय हुई। हे रामजी ! जो कुछ जगत् है वह सब आकाशरूप है । जैसे रस्सी में सर्प भ्रम से भासता है तैसे ही आन्तवाहिकता में आधिभौतिकता भ्रम से भासती है । आदि शरीर आन्तवाहक है अर्थात् सङ्कल्पमात्र है उसमें दृढ भावना हो गई उससे पृथ्वी आदि तत्त्वों का शरीर भासने लगा । वास्तव में न कोई भूत आदिक तत्त्व है और न कोई तत्त्वों का शरीर है । उसका शव शश-के शृंगों की नाईं असत् है । हे रामजी ! आत्मा में अज्ञान से आधिभौतिक भासे हैं । जब आत्मा का बोध होता है तब आधिभौतिक नष्ट हो जाते हैं । जैसे किसी पुरुष ने स्वप्न में आपको हरिण देखा और जब जाग उठा तब हरिण का शरीर दृष्टि नहीं आया तैसे ही अज्ञान से आधिभौतिकता दृष्टि आई है और आत्मबोध हुए आधिभौतिकता दृष्टि नहीं आती । जब सत्य का ज्ञान उदय होता तब असत् का ज्ञान लीन हो जाता है । जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प भासता है और रस्सी के ज्ञान से सर्प का ज्ञान लीन होता है तैसे ही सम्पूर्ण जगत् मन से उदय हुआ है और अज्ञान से आधिभौतिकता को प्राप्त हुआ है । जैसे स्वप्न में जगत् आधिभौतिक हो भासता है और जागे में स्वप्न शरीर नहीं भासता तैसे ही आत्मज्ञान से आधिभौतिकता निवृत्त हो जाती है और आन्तवाहक शरीर भासता है । रामजी बोले, हे भगवन् ! योगीश्वर जो आन्तवाहक शरीर से ब्रह्मलोक पर्यन्त आते जाते हैं उनके शरीर कैसे भासते हैं ! वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आन्तवाहक शरीर ऐसे हैं जैसे कोई पुरुष स्वप्न में हो उसको पूर्व के जाग्रत् शरीर का स्मरण हो तब स्वप्न शरीर दृष्टि भी आता है पर उसको आकाशरूप जानता है; तैसे ही
२५० योगवाशिष्ठ ।
आधिभौतिकता बोध से नष्ट हो जाती है । जैसे शरतकाल का मेघ देखनेमात्र होता है तैसे ही ज्ञानवान् योगीश्वरों का शरीर देखनेमात्र होता है और अदृश्यरूप है; और जो शरीर भासता है पर उसको आकाशरूप ही भासता है । हे रामजी ! यह देहादिक आत्मा में भ्रान्ति से दृष्टि आते हैं और आत्मज्ञान से निवृत्त हो जाते हैं । जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प भासता है; जब रस्सी का सम्यक्ज्ञान होता है तब सर्प-भाव उसका नहीं रहता तैसे ही तत्त्वबोध होने से देह कहाँ ही और देह की सत्ता कहाँ रहे, दोनों का अभाव ही हो, केवल अद्वैत ब्रह्मसत्ता भासती है । रामजी बोले; हे भगवन् ! अन्तवाहक मे आधिभौतिक रूप होता है वा आधिभौतिक मे अन्तवाहकरूप होता है यह मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैंने तुमको बहुत बेर कहा है तुम मेरे कहे को धारण क्यों नहीं करते ? मैंने आगे भी कहा है कि जो कुछ जीव है वह सब अन्तवाहक है आधिभौतिक कोई नहीं । आदि में जो शुद्ध संविन्मात्र मे संवेदन आभास उठा है उससे इस जीव का संकल्परूप अन्तवाहक आदि शरीर हुआ । जब उसमें दृढ़ अभ्यास होता है तब वह संकल्परूपी शरीर आधिभौतिक होकर भासने लगता है । जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ़रूप हो जाता है तैसे ही प्रमाद मे संकल्प के अभ्यास से आधिभौतिकरूप हो जाता है । उस आधिभौतिक के तीन लक्षण होते हैं भारी शरीर होता है; कठोर भाव होता है और शिथिल होता है उससे अहंप्रतीति होती है इस कारण आधिभौतिक कहाता है । जब तत्त्व का बोध होता है तब आधिभौतिकता आकाशरूप हो जाती है । जैसे स्वप्न में देह से आदि लेकर जगत् बड़ा स्पष्टरूप भासता है और जब स्वप्न में स्वप्न का ज्ञान होता है कि यह स्वप्न है तब वह स्वप्न का शरीर लघु हो जाता है अर्थात् संकल्परूप हो जाता है; तैसे ही परमात्मा के बोध से आधिभौतिक शरीर निवृत्त हो जाता है और संकल्प-रूप भासता है । हे रामजी ! आधिभौतिकता अबोध के अभ्यास से प्राप्त होती है । जब उलट के उसी अभ्यास का बोध हो तब आधिभौतिकता नष्ट हो जावे और अन्तवाहकता उदय हो । हे रामजी ! जीव एक शरीर को
उत्पत्ति प्रकरण । २५१
त्याग के दूसरे को अङ्गीकार करता है-जैसे स्वप्ने से स्वप्नान्तर प्राप्त होता है और जब बोध होता है तब शरीर और कुछ वस्तु नहीं, वही आधिभौतिक शरीर शान्त हो जाता है जैसे स्वप्न से जागके स्वप्नशरीर शान्त हो जाता है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुमको भासता है वह सब भ्रममात्र है, अज्ञान से सत् की नाईं भासता है। जब आत्मबोध होगा तब सब आकाशरूप होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने स्वप्ननिरूपणं नाम चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब वह दोनों देवियाँ अन्तःपुर में गई तब प्रबुद्ध लीला कहने लगी, हे देवीजी ! समाधि में लगे मुझको कितना काल व्यतीत हुआ ? में ध्यान से भूपाल की सृष्टि में गई थी ओर मेरा शरीर यहाँ पड़ा था वह कहाँ गया ? देवी बोली-हे लीले ! तुझको समाधि में लगे इकतीस दिन व्यतीत हुए हैं जब तू ध्यान में लगी तब तेरा पुर्यष्टक विदूरथ की सृष्टि में विचरता फिरा जब इस शरीर की वासना तेरी निवृत्त हो गई तब जैसे रस से रहित पत्र सूख जाता है तैसे ही तेरा शरीर निर्जीव होकर गिर पड़ा और जैसे काष्ठ पाषाण होता है तैसे ही हो वरफ की नाईं शीतल हो गया। तब देखके सबने विचार किया कि यह मर गई इसको जलाइये और चन्दन और घृत से लपेट के जला दिया । बान्धवजन रुदन करने लगे और पुत्रों ने पिण्डक्रिया की । हे लीले ! जो तू ध्यान से उतरती तो तुझको देखके लोग आश्चर्यमान होते और अब भी देखके सब आश्चर्यमान होवेंगे कि रानी परलोक से फिर आई है। हे लीले ! अब तुझको बोध उदय हुआ है इसमें शरीर की वासना नष्ट हो गई और अन्तवाहक में दृढ़ निश्चय हुआ इस कारण वह शरीर जीवित हुआ । अब जो उसके समान तेरा शरीर हुआ है वह इस कारण है कि तुझको लीला की वासना में बोध हुआ है कि मैं लीला हूँ, इस कारण तेरा शरीर वैसा ही रहा। यह लीला शरीर की तेरी वासना नष्ट न हुई थी, इस कारण तू निर्वाण न हुई, नहीं तो विदेहमुक्त हो जाती । अब तू सत्यसंकल्प हुई जैसी तेरी इच्छा होगी तैसे ही अनु-भव होगा । हे लीले ! जैसी वासना जिसको होती है उसके अनुसार
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उसको प्राप्त होता है। जैसे बालक को अन्धकार में जैसी भावना होती है तैसा ही भान होता है—जो वेताल की भावना होती है तो वेताल हो भासता है परन्तु वास्तव में वेताल कोई नहीं। तैसे जितनी आधिभौतिकता भासती है वह भ्रममात्र है। सब जीवों का आदि शरीर अन्तर्वाहक है सो प्रमाद से आधिभौतिकता भासता है। हे लीले ! एक लिंगशरीर है; एक अन्तर्वाहक शरीर है—यह दोनों संकल्पमात्र हैं और इनमें इतना भेद है कि लिंगशरीर संकल्परूपी मन है उसमें जिसको आधिभौतिकता का अभिमान होता है उसको गौरव और कठोररूप और वर्णाश्रम का अभिमान होता है। जिस पुरुष को ऐसे अनात्मा में आत्माभिमान हुआ है जिसकी आधिभौतिक लिङ्गदेह है उसकी चिन्तना सत्य नहीं होती। जिसको आधिभौतिक का अभिमान नहीं होता वह अन्तर्वाहक शरीर है। वह जैसा चिन्तवन करता है वैसी ही सिद्धि होती है। हे लीले ! तू अब अन्तर्वाहक में दृढ़ स्थित हुई है, इस कारण तेरा फिर वैसा ही शरीर हुआ है तेरी आधिभौतिकता बुद्धि नष्ट हो गई और वह स्थूल शरीर शव होकर गिर पड़ा है जैसे जल से रहित मेघ हो और जैसे सुगन्ध से रहित फूल हो तैसे ही तेरा शरीर हो गया है और अब तू सत्य संकल्प हुई है। जैसा चिन्तवन कर तैसा ही होगा। हे लीले ! यह कमलनयनी लीला तेरे भर्त्ता के पास बैठी है और उसको इस अन्तःपुर के लोग और सहेलियाँ जान नहीं सकतीं, क्योंकि मैंने इनको निद्रा में मोहित किया था। जब तक मेरा दर्शन इसको न होवेगा तब तक इसको और कोई न जान सकेगा अब यह हमको देखेगी। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे विचारके देवी उसको अपने संकल्प में ध्यान करने लगी तब उस लीला ने देखा कि अन्तःपुर में बहुत से सूर्यों का प्रकाश इकट्ठा हुआ है और चन्द्रमा की नाईं शीतल प्रकाश है। ऐसे दोनों देवियों को देखके उसने नमस्कार कर मस्तक नवाया और दोनों को सुवर्ण के सिंहासन पर बैठाके कहने लगी, हे जीव की दाता ! तुम्हारी जय हो ! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की। तुम्हारे ही प्रसाद से मैं यहाँ आई। देवी बोली, हे पुत्री ! तू यहाँ कैसे आई और क्या वृत्तान्त तूने देखा सो कह ?
उत्पत्ति प्रकरण । २५३
विदूरथ की लीला बोली, हे देवी । जब मेरा भर्त्ता संग्राम में घायल हुआ तब उसको देखके में मूर्च्छित हो गिर पड़ी परन्तु मृतक न भई । इसके अनन्तर फिर मुझको चेतना फुरी तो मैंने अपना वही शरीर देखा और उस शरीर से में आकाशमार्ग को उड़ी । जैसे वायु गन्ध लेकर उड़ता है वैसे ही एक कुमार्ग मुझे उड़ाकर परलोक में भर्त्ता के पास बैठा आप अन्तर्धान हो गई । मेरा भर्त्ता जो संग्राम में थका था वह आके सो रहा है ओर में सँभलती देखती मार्ग में आई हूँ, परन्तु मुझको तुम दृष्टि कहीं न आईं । यहाँ कृपाकर तुमने दर्शन दिया है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार सुनके देवी ने प्रबुध लीला से कहा कि अब में राजा की जीवकला को छोड़ती हूँ । ऐसे कहके देवी ने नासिका के मार्ग से जीवकला को छोड़ दिया और जैसे कमल के भीतर वायु प्रवेश कर जावे अथवा शरीर में वायु प्रवेश कर जावे वैसे ही शरीर में जीवकला प्रवेश कर गई । जैसे समुद्र जल से पूर्ण होता है वैसे ही पुर्यष्टक वासना से पूर्ण थी । शरीर की कान्ति उज्ज्वल हो गई और जैसे वसन्त ऋतु में फूल ओर वृक्षों में रस फैलता है, अङ्गों में प्राणवायु फैल गई तब सब इन्द्रियाँ खिल आईं जैसे वसन्तऋतु में फूल खिल आते हैं । तब राजा फूलों की शय्या से इस भाँति उठ खड़ा हुआ जैसे रोका हुआ विन्ध्याचल पर्वत उठ आवे । तब दोनों लीला राजा के सम्मुख आ खड़ी हुईं और राजा ने कहा मेरे आगे तुम कौन खड़ी हो ? प्रबुध लीला ने कहा, हे स्वामी ! में तुम्हारी पूर्व पटरानी लीला हूँ; जैसे शब्द के सङ्ग अर्थ रहता है तैसे सदा तुम्हारे सङ्ग रहती हूँ । जब तुम यहाँ शरीर त्याग के परलोक में गये थे तब मुझसे तुम्हारा अतिस्नेह था, इससे मेरा प्रतिबिम्ब यह लीला तुझको भासी थी । अब जो और कथा का वृत्तान्त है सो में तुमसे कहती हूँ । हेराजन् ! हमारे ऊपर इस देवी ने कृपा की है जो हमारे शीश पर स्वर्ण के सिंहासन पर बैठी है । यह सरस्वती सर्व की जननी है; इसने हमारे ऊपर बड़ी कृपा की है ओर परलोक से तुम्हें ले आई है । हे रामजी ! ऐसे सुनके राजा प्रसन्न हो उठ खड़ा हुआ और सरस्वती के चरणों पर मस्तक नवाकर बोला, हे सरस्वती ! तुमको मेरा नमस्कार है । तुम सबकी हितकारिणी हो और तुमने मेरे ऊपर बड़ा
२५४ योगवाशिष्ठ ।
अनुग्रह किया है । अब कृपा करके मुझको यह वर दो कि मेरी आयु बड़ी हो; निष्कण्टक राज्य करूँ; लक्ष्मी बहुत हो; रोग कष्ट न हो और आत्मज्ञान से सम्पन्न होऊँ अर्थात् भोग और मोक्ष दोनों दो । इतना कह-कर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार राजा ने कहा तब देवी ने उसके शीश पर आशीर्वाद दिया कि हे राजन् ! ऐसा ही होगा । तेरी आयु बड़ी होगी; तेरा शत्रु भी कोई न होगा; निष्कण्टक राज्य करेगा; आपदा तुझको न होगी; लक्ष्मी संपदा से सम्पन्न होगा; तेरी प्रजा भी बहुत सुखी रहकर तुझको देखके प्रसन्न होगी; तेरी प्रजा में आपदा किसी को न होगी और तू आत्मानन्द से पूर्ण होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जीवजीवन्वर्णनन्नामै- कचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहके देवी अन्तर्धान हो गई और प्रातःकाल का समय हुआ; सब लोग जाग उठे; सूर्य भी उदय हुआ और सूर्यमुखी कमल खिल आये । राजा दोनों लीला को कण्ठ लगा प्रसन्न और आश्चर्यमान हुआ, मन्दिर में नगारे बजने लगे और नाना शब्द होने लगे, मन्दिर में बड़ा हुलास और आनन्द हुआ अनेक अङ्गना नृत्य करने लगीं और उत्साह हुआ । विद्याधर, सिद्ध, देवता, फूलों की वर्षा करने लगे और लोग बड़े आश्चर्यमान हुए कि लीला परलोक से फिर आई है और अपने भर्त्ता और एक आप-सी दूसरी लीला ले आई है। हे रामजी ! यह कथा देश से देशान्तर चली गई और सब लोग सुनके आश्चर्यमान हुए । जब इस प्रकार यह कथा प्रसिद्ध हुई तब राजा ने भी सुना कि मैं मर के फिर जिया हूँ और विचारा कि फिर मेरा अभिषेक हो । निदान मन्त्री और मण्डलेश्वरों ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों ओर से सब समुद्र और सर्व तीर्थों का जल मँगा राजा को राज का अभिषेक किया और चारों समुद्रों पर्यन्त राजा निष्कण्टक राज्य करने लगा । राजा और लीला यह पूर्व की कथा को विचारते और आश्चर्यमान होते थे । सरस्वती के उपदेश और प्रसाद से अपना पुरुषार्थ पाके राजा और दोनों लीला ने इस भाँति
उत्पत्ति प्रकरण । २५५
सहस्र वर्ष पर्यन्त जीवन्मुक्त होके राज किया और मन सहित षट्इन्द्रियों को वश करके यथालाभ संतुष्ट रहे और दृश्यभ्रम उनका नष्ट हो गया । ऐसा सुन्दर राजा था कि उसकी सुन्दरता की कणिका मानों चन्द्रमा थी और उसके तेज की कणिका मानों सूर्य थी निदान उसने प्रजा को भली प्रकार संतुष्ट किया और सब प्रजा राजा को देख के प्रसन्न हुई और विदेहमुक्त हो दोनों लीला और तीसरा राजा निर्वाण पद को प्राप्त हुए ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने निर्वाण-वर्णनन्नाम द्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह दोनों कथा एक आकाशज ब्राह्मण की और दूसरी लीला की मैंने तुमको दृश्यदोष के निवृत्ति अर्थ विस्तारपूर्वक सुनाई है । हे रामजी ! दृश्य की दृढ़ता जो हो रही है उसको त्याग करो । अब तुम इन दोनों इतिहासों को संक्षेपमात्र से सुनो । यह जगत् जो तुमको भासता है आभासरूप है—आदि से कुछ उपजा नहीं जो वस्तु सत् होती है उसके निवारण में प्रयत्न होता है और जो वस्तु असत् ही हो उसकी निवृत्ति होने में कुछ यत्न नहीं । इस कारण ज्ञानवान् को सब आकाशरूप भासता है और आकाश की नाईं स्थित होता है । हे रामजी ! आदि जो ब्रह्मसत्ता में आभास संवेदन फुरा है सो ब्रह्मरूप होकर स्थित हुआ है । वह ब्रह्म पृथ्वी आदिक भूतों से रहित है । जो आप ही आभासरूप हो उसके उपजाये जगत् कैसे सत् हो ? हे रामजी ! ज्ञानवान् पुरुष आकाशरूप है । जिसको आत्मपद का साक्षात्कार हुआ उसको दृश्यभ्रम का अभाव हो जाता है और जो अज्ञानी है उसको जगत् भ्रम स्पष्ट भासता है । शुद्ध चिदाकाश का एक अणु जीव है और उस जीव अणु में यह जगत् भासता है, उस जगत् की सृष्टि में तुमको क्या कहूँ; नीति क्या कहूँ; वासना क्या कहूँ और पदार्थों को क्या कहूँ ? हे रामजी ! जगत् कुछ उपजा नहीं; केवल संवेदन के फुरने से जगत् भासता है । शुद्ध संवित् में संवेदनरूपी नदी चली है और उसमें यह जगत् फुरता है । जब संवेदन को यत्न करके रोकोगे तब दृश्यभ्रम नष्ट हो जावेगा । प्रयत्न करना यही है कि संवेदन को अन्तर्मुख करे और