भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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२५२ योगवाशिष्ठ ।

उसको प्राप्त होता है। जैसे बालक को अन्धकार में जैसी भावना होती है तैसा ही भान होता है—जो वेताल की भावना होती है तो वेताल हो भासता है परन्तु वास्तव में वेताल कोई नहीं। तैसे जितनी आधिभौतिकता भासती है वह भ्रममात्र है। सब जीवों का आदि शरीर अन्तर्वाहक है सो प्रमाद से आधिभौतिकता भासता है। हे लीले ! एक लिंगशरीर है; एक अन्तर्वाहक शरीर है—यह दोनों संकल्पमात्र हैं और इनमें इतना भेद है कि लिंगशरीर संकल्परूपी मन है उसमें जिसको आधिभौतिकता का अभिमान होता है उसको गौरव और कठोररूप और वर्णाश्रम का अभिमान होता है। जिस पुरुष को ऐसे अनात्मा में आत्माभिमान हुआ है जिसकी आधिभौतिक लिङ्गदेह है उसकी चिन्तना सत्य नहीं होती। जिसको आधिभौतिक का अभिमान नहीं होता वह अन्तर्वाहक शरीर है। वह जैसा चिन्तवन करता है वैसी ही सिद्धि होती है। हे लीले ! तू अब अन्तर्वाहक में दृढ़ स्थित हुई है, इस कारण तेरा फिर वैसा ही शरीर हुआ है तेरी आधिभौतिकता बुद्धि नष्ट हो गई और वह स्थूल शरीर शव होकर गिर पड़ा है जैसे जल से रहित मेघ हो और जैसे सुगन्ध से रहित फूल हो तैसे ही तेरा शरीर हो गया है और अब तू सत्य संकल्प हुई है। जैसा चिन्तवन कर तैसा ही होगा। हे लीले ! यह कमलनयनी लीला तेरे भर्त्ता के पास बैठी है और उसको इस अन्तःपुर के लोग और सहेलियाँ जान नहीं सकतीं, क्योंकि मैंने इनको निद्रा में मोहित किया था। जब तक मेरा दर्शन इसको न होवेगा तब तक इसको और कोई न जान सकेगा अब यह हमको देखेगी। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे विचारके देवी उसको अपने संकल्प में ध्यान करने लगी तब उस लीला ने देखा कि अन्तःपुर में बहुत से सूर्यों का प्रकाश इकट्ठा हुआ है और चन्द्रमा की नाईं शीतल प्रकाश है। ऐसे दोनों देवियों को देखके उसने नमस्कार कर मस्तक नवाया और दोनों को सुवर्ण के सिंहासन पर बैठाके कहने लगी, हे जीव की दाता ! तुम्हारी जय हो ! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की। तुम्हारे ही प्रसाद से मैं यहाँ आई। देवी बोली, हे पुत्री ! तू यहाँ कैसे आई और क्या वृत्तान्त तूने देखा सो कह ?

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