योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २५३
विदूरथ की लीला बोली, हे देवी । जब मेरा भर्त्ता संग्राम में घायल हुआ तब उसको देखके में मूर्च्छित हो गिर पड़ी परन्तु मृतक न भई । इसके अनन्तर फिर मुझको चेतना फुरी तो मैंने अपना वही शरीर देखा और उस शरीर से में आकाशमार्ग को उड़ी । जैसे वायु गन्ध लेकर उड़ता है वैसे ही एक कुमार्ग मुझे उड़ाकर परलोक में भर्त्ता के पास बैठा आप अन्तर्धान हो गई । मेरा भर्त्ता जो संग्राम में थका था वह आके सो रहा है ओर में सँभलती देखती मार्ग में आई हूँ, परन्तु मुझको तुम दृष्टि कहीं न आईं । यहाँ कृपाकर तुमने दर्शन दिया है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार सुनके देवी ने प्रबुध लीला से कहा कि अब में राजा की जीवकला को छोड़ती हूँ । ऐसे कहके देवी ने नासिका के मार्ग से जीवकला को छोड़ दिया और जैसे कमल के भीतर वायु प्रवेश कर जावे अथवा शरीर में वायु प्रवेश कर जावे वैसे ही शरीर में जीवकला प्रवेश कर गई । जैसे समुद्र जल से पूर्ण होता है वैसे ही पुर्यष्टक वासना से पूर्ण थी । शरीर की कान्ति उज्ज्वल हो गई और जैसे वसन्त ऋतु में फूल ओर वृक्षों में रस फैलता है, अङ्गों में प्राणवायु फैल गई तब सब इन्द्रियाँ खिल आईं जैसे वसन्तऋतु में फूल खिल आते हैं । तब राजा फूलों की शय्या से इस भाँति उठ खड़ा हुआ जैसे रोका हुआ विन्ध्याचल पर्वत उठ आवे । तब दोनों लीला राजा के सम्मुख आ खड़ी हुईं और राजा ने कहा मेरे आगे तुम कौन खड़ी हो ? प्रबुध लीला ने कहा, हे स्वामी ! में तुम्हारी पूर्व पटरानी लीला हूँ; जैसे शब्द के सङ्ग अर्थ रहता है तैसे सदा तुम्हारे सङ्ग रहती हूँ । जब तुम यहाँ शरीर त्याग के परलोक में गये थे तब मुझसे तुम्हारा अतिस्नेह था, इससे मेरा प्रतिबिम्ब यह लीला तुझको भासी थी । अब जो और कथा का वृत्तान्त है सो में तुमसे कहती हूँ । हेराजन् ! हमारे ऊपर इस देवी ने कृपा की है जो हमारे शीश पर स्वर्ण के सिंहासन पर बैठी है । यह सरस्वती सर्व की जननी है; इसने हमारे ऊपर बड़ी कृपा की है ओर परलोक से तुम्हें ले आई है । हे रामजी ! ऐसे सुनके राजा प्रसन्न हो उठ खड़ा हुआ और सरस्वती के चरणों पर मस्तक नवाकर बोला, हे सरस्वती ! तुमको मेरा नमस्कार है । तुम सबकी हितकारिणी हो और तुमने मेरे ऊपर बड़ा