योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २५१
त्याग के दूसरे को अङ्गीकार करता है-जैसे स्वप्ने से स्वप्नान्तर प्राप्त होता है और जब बोध होता है तब शरीर और कुछ वस्तु नहीं, वही आधिभौतिक शरीर शान्त हो जाता है जैसे स्वप्न से जागके स्वप्नशरीर शान्त हो जाता है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुमको भासता है वह सब भ्रममात्र है, अज्ञान से सत् की नाईं भासता है। जब आत्मबोध होगा तब सब आकाशरूप होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने स्वप्ननिरूपणं नाम चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब वह दोनों देवियाँ अन्तःपुर में गई तब प्रबुद्ध लीला कहने लगी, हे देवीजी ! समाधि में लगे मुझको कितना काल व्यतीत हुआ ? में ध्यान से भूपाल की सृष्टि में गई थी ओर मेरा शरीर यहाँ पड़ा था वह कहाँ गया ? देवी बोली-हे लीले ! तुझको समाधि में लगे इकतीस दिन व्यतीत हुए हैं जब तू ध्यान में लगी तब तेरा पुर्यष्टक विदूरथ की सृष्टि में विचरता फिरा जब इस शरीर की वासना तेरी निवृत्त हो गई तब जैसे रस से रहित पत्र सूख जाता है तैसे ही तेरा शरीर निर्जीव होकर गिर पड़ा और जैसे काष्ठ पाषाण होता है तैसे ही हो वरफ की नाईं शीतल हो गया। तब देखके सबने विचार किया कि यह मर गई इसको जलाइये और चन्दन और घृत से लपेट के जला दिया । बान्धवजन रुदन करने लगे और पुत्रों ने पिण्डक्रिया की । हे लीले ! जो तू ध्यान से उतरती तो तुझको देखके लोग आश्चर्यमान होते और अब भी देखके सब आश्चर्यमान होवेंगे कि रानी परलोक से फिर आई है। हे लीले ! अब तुझको बोध उदय हुआ है इसमें शरीर की वासना नष्ट हो गई और अन्तवाहक में दृढ़ निश्चय हुआ इस कारण वह शरीर जीवित हुआ । अब जो उसके समान तेरा शरीर हुआ है वह इस कारण है कि तुझको लीला की वासना में बोध हुआ है कि मैं लीला हूँ, इस कारण तेरा शरीर वैसा ही रहा। यह लीला शरीर की तेरी वासना नष्ट न हुई थी, इस कारण तू निर्वाण न हुई, नहीं तो विदेहमुक्त हो जाती । अब तू सत्यसंकल्प हुई जैसी तेरी इच्छा होगी तैसे ही अनु-भव होगा । हे लीले ! जैसी वासना जिसको होती है उसके अनुसार