योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २४५
अपनी वासना के अनुसार मनुष्यमार्ग के राह जावेगा । है तो यह चिदाकाशरूप परन्तु अज्ञान के वश इसको दूर स्थान भासेगा और हम भी इसी मार्ग मे इसके संकल्प के साथ अपना संकल्प मिलाके जावेंगे । जब तक संकल्प से संकल्प नहीं मिलता तब तक एकत्वभाव नहीं होता । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवीजी ने लीला को परम बोध का कारण उपदेश किया कि इतने में राजा जर्जरीभूत होने लगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने संसारभ्रमवर्णनन्नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवी और लीला देखती थी कि राजा के नेत्र फट गये और शरीर निरस हो गिर पड़ा और श्वास नासिका के मार्ग से निकल गया । तब जैसे रस सहित पत्र और कटा हुआ कमल विरस हो जाता है वैसे ही राजा का शरीर निरस हो गया; जो कुछ चित्त की चैतन्यता थी वह जर्जरीभूत हो गये, मृत्यु मूर्च्छारूपी अन्धकूप में जा पड़ा और चेतना और वासनासंयुक्त प्राण आकाश में जा स्थित हुए । प्राणों में जो चेतना थी और चेतना में वासना थी उस चेतना और वासना सहित प्राण जैसे वायु गन्ध को लेकर स्थित होता है आकाश में जा स्थित हुआ । हे रामजी ! राजा की पुर्यष्टक तो जर्जरीभूत हो गई परन्तु दोनों देवियाँ उसको दिव्य दृष्टि से ऐसे देखती थीं जैसे भ्रमरी गन्ध को देखती है । राजा एक मुहूर्त पर्यन्त तो मूर्च्छा में रहा फिर उसको चेतनता फुर आई और अपने साथ शरीर देखने लगा उसने जाना कि मेरे बान्धवों ने मेरी पिण्डक्रिया की है उसको मेरा शरीर भया है और धर्मराज के स्थान को मुझे दूत ले चले हैं । हे रामजी ! इस प्रकार अनुभव करता वह धर्मराज के स्थान को चला और उसके पीछे देवी, जैसे वायु के पीछे गन्ध चली जाती है, चली, जैसे गन्ध के पीछे भ्रमरी जाती है वैसे ही राजा विदूरथ धर्मराज के पास पहुँच गया । धर्मराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसके कर्म विचार के कहो । चित्रगुप्त ने कहा, हे भगवन् ! इसने कोई अपकर्म नहीं किया बल्कि बड़े-बड़े पुण्य किये हैं और भगवती सरस्वती का इसको वर है । इसका शव फूलों मे ढका हुआ है; उस शरीर में यह भगवती के