भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

२४६ योगवासिष्ठ ।

वर से जाकर प्रवेश करेगा । इसमें अब कुछ कहना पूछना नहीं; यह तो देवीजी के वर से बँधा है। हे रामजी ! ऐसे कहकर यमराज ने राजा को अपने स्थान में चला दिया । तब राजा आगे चले और उनके पीछे दोनों देवियाँ चलीं । राजा को यह देवियाँ देखती थीं पर राजा इनको न देख सकता था । तब तीनों उस ब्रह्माण्ड को लाँघ, जिसका राज्य विदूरथ ने किया था, दूसरे ब्रह्माण्ड में आये और उसको भी लाँघ के पद्म राजा के देश में आकर उसके मन्दिर में, जहाँ फूलों से ढका शव था आये । जैसे मेघ से वायु आन मिलता है वैसे ही एक क्षण में देवियाँ आन मिलीं । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वह राजा तो मृतक हुआ था; मृतक होकर उसने उस मार्ग को कैसे पहिचाना ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वह विदूरथ जो मृतक हुआ था उसकी वासना नष्ट न हुई थी । अपनी उस वासना से वह अपने स्थान को प्राप्त हुआ । हे रामजी ! चिद्अणु जीव के उदर में भ्रान्तिमात्र जगत् है—जैसे वट के बीज में अनन्त वट वृक्ष होते हैं वैसे ही चिद्अणु में अनन्त जगत् हैं—जो अपने भीतर स्थिर है उसको क्यों न देखे ? जैसे जीव अपने जीवत्व का अंकुर देखता है वैसे ही स्वाभाविक चिद्अणु त्रिलोकी को देखता है । जैसे कोई पुरुष किसी स्थान में धन दबा रखे और आप दूर देश में जावे तो धन को वासना से देखता है वैसे ही वासना की दृढ़ता से विदूरथ ने देखा और जैसे कोई जीव स्वप्नभ्रम से किसी बड़े धनवान् के गृह में जा उपजता है और भ्रम के शान्त होने पर उसका अभाव देखता है वैसे ही उसको अनुभव हुआ । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जिसकी वासना पिण्डदान किया की नहीं होती वह मृतक होने पर अपने साथ कैसे देह को देखता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पुरुष जो माता-पिता के पिण्ड करता है उनकी वासना हृदय में होती है और वही फल रूप होकर भासती है कि मेरा शरीर है; मेरे पीछे मेरे बाँधवों ने पिण्ड-दान किया है उससे मेरा शरीर हुआ है । हे रामजी ! सदेह हो अथवा विदेह अपनी वासना ही के अनुसार अनुभव होता है—भावना से भिन्न अनुभव नहीं होता । चित्तमय पुरुष है; चित्त में जो पिण्ड की