भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

उत्पत्ति प्रकरण । २४३

होती केवल क्रीड़ा में मग्न होता है उसमें आगे यौवन अवस्था आती है तो कामादिक विकारों से अन्धा हो जाता है और कुछ विचार नहीं रहता । फिर वृद्धावस्था आती है तो शरीर महाकृश हो जाता है, बहुत रोग उपजते हैं और शरीर कुरूप हो जाता है । जैसे कमलों पर बरफ पड़ती है वे कुम्हिला जाते हैं वैसे ही वृद्ध अवस्था में शरीर कुम्हिला जाता है और सब शक्ति घटकर तृष्णा बढ़ती जाती है । फिर कष्टवान् होकर मृतक होता है तब वासना के अनुसार स्वर्ग नरक के भोगों को प्राप्त होता है। इस प्रकार संसारचक्र में वासना के अनुसार घटीयन्त्र की नाईं भ्रमता है-स्थिर कदाचित् नहीं होता । हे लीले ! इस प्रकार जीव आत्मपद के प्रमाद से जन्ममरण पाता है और फिर माता के गर्भ में आके बाल, यौवन, वृद्ध और मृतक अवस्था को प्राप्त होता है । फिर वासना के अनुसार परलोक देखता है और जाग्रत् को स्वप्ने की नाईं भ्रम से फिर देखता है जैसे स्वप्ने से स्वप्नान्तर देखता है वैसे ही अपनी कल्पना से जगत्भ्रम फुरता है । स्वरूप में किसी को कुछ भ्रम नहीं आकाशरूप आकाश में स्थित है, भ्रम से विकार भासते हैं । लीला ने पूछा, हे देवी ! परब्रह्म में यह जगत् भ्रम से कैसे हुआ है ? मेरे बोध को दृढ़ता के निमित्त कहो । देवी बोली, हे लीले ! सब आत्म-रूप हैं, पहाड़, वृक्ष, पृथ्वी, आकाशादिक स्थावर-जङ्गम जो कुछ जगत् है वह सब परमार्थघन है और परमार्थसत्ता ही सर्व आत्मा है । हे लीले ! उस सत्ता संवित् आकाश में जब संवेदन आभास फुरता है तब जगत्भ्रम भासता है । आदि संवेदन जो संवित्मात्र में हुआ है सो ब्रह्मरूप होकर स्थिर हुआ है और जैसे वह चेतता गया है उसी प्रकार स्थावर-जङ्गम जगत् होकर स्थित हुआ है । हे लीले ! शरीर के भीतर नाड़ी है नाड़ी में छिद्र हैं और उन छिद्रों में स्पन्दरूप होकर प्राण विचर-रता है उसको जीव कहते हैं । जब यह जीव निकल जाता है तब शरीर मृतक होता है । हे लीले ! जैसे-जैसे आदि संवित्मात्र में संवेदन फुरा है वैसे ही वैसे अब तक स्थित है । जब उसने चेता कि मैं जड़ होऊँ तब वह जडरूप पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, आकाश, पर्वत, वृक्षादिक

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स्थित हुए और जब चेतन की भावना की तब चेतनरूप होकर स्थित हुआ । हे लीले ! जिसमें प्राणक्रिया होती है वह जङ्गमरूप बोलते चलते हैं और जिसमें प्राण स्पन्द क्रिया नहीं पाई जाती सो स्थावर, पर हैं रूप आत्मसत्ता में दोनों तुल्य हैं, जैसे जङ्गम है वैसे ही स्थावर हैं और दोनों चैतन्य हैं । जैसे जङ्गम में चैतन्यता है वैसे ही स्थावर में चैतन्यता है । यदि तू कहे कि स्थावर में चेतनता क्यों नहीं भासती तो उसका उत्तर यह है कि जैसे उत्तर दिशा के समुद्रवाले मनुष्य की बोली को दक्षिण दिशा के समुद्रवाले नहीं जानते और दक्षिण दिशा के समुद्रवाले की बोली उत्तर दिशा के समुद्रवाले नहीं समझ सकते वैसे ही स्थावरों की बोली जङ्गम नहीं समझ सकते और जङ्गमों की बोली स्थावर नहीं समझ सकते परन्तु परस्पर अपनी-अपनी जाति में सब चेतन हैं--उसका ज्ञान उसको नहीं होता और उसका ज्ञान उसको नहीं होता । जैसे एक कूप का दर्दुर और कूप के दर्दुर को नहीं जानता और दूसरे कूप का दर्दुर उस कूप के दर्दुर को नहीं जानता वैसे ही जङ्गमों की बोली स्थावर नहीं जान सकते और स्थावरों की बोली जङ्गम नहीं जान सकते । हे लीले ! जो आदि संवित् में संवेदन फुरा है वैसा ही रूप होकर महाप्रलय पर्यन्त स्थित है—अन्यथा नहीं होता । जब उस संवित् में आकाश का संवेदन फुरता है तब आकाशरूप होकर स्थित होता है; जब स्पन्दता को चेतता है तब वायुरूप होकर स्थित होता है; जब उष्णता को चेतता है तब अग्निरूप होकर स्थिर होता है; जब द्रवता को चेतता है तब जलरूप होकर स्थित होता है और जब गन्ध की चिन्तवना करता है तब पृथ्वीरूप होकर स्थित होता है । इसी प्रकार जिन जिनको चेतता है वे पदार्थ प्रकट होते हैं । आत्मसत्ता में सब प्रतिबिम्बित हैं । वास्तव में न कोई स्थावर है न जङ्गम है, केवल ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है और उसमें भ्रम से जगत् भासते हैं और दूसरी कुछ वस्तु नहीं । हे लीले ! अब राजा विदूरथ को देख कि मृतक होता है । लीला ने पूछा, हे देवि ! यह राजा पद्म के शरीरवाले मण्डप में किस मार्ग से जावेगा और इसके पीछे हम किस मार्ग से जावेंगे ? देवी बोली हे लीले ! यह

उत्पत्ति प्रकरण । २४५

अपनी वासना के अनुसार मनुष्यमार्ग के राह जावेगा । है तो यह चिदाकाशरूप परन्तु अज्ञान के वश इसको दूर स्थान भासेगा और हम भी इसी मार्ग मे इसके संकल्प के साथ अपना संकल्प मिलाके जावेंगे । जब तक संकल्प से संकल्प नहीं मिलता तब तक एकत्वभाव नहीं होता । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवीजी ने लीला को परम बोध का कारण उपदेश किया कि इतने में राजा जर्जरीभूत होने लगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने संसारभ्रमवर्णनन्नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवी और लीला देखती थी कि राजा के नेत्र फट गये और शरीर निरस हो गिर पड़ा और श्वास नासिका के मार्ग से निकल गया । तब जैसे रस सहित पत्र और कटा हुआ कमल विरस हो जाता है वैसे ही राजा का शरीर निरस हो गया; जो कुछ चित्त की चैतन्यता थी वह जर्जरीभूत हो गये, मृत्यु मूर्च्छारूपी अन्धकूप में जा पड़ा और चेतना और वासनासंयुक्त प्राण आकाश में जा स्थित हुए । प्राणों में जो चेतना थी और चेतना में वासना थी उस चेतना और वासना सहित प्राण जैसे वायु गन्ध को लेकर स्थित होता है आकाश में जा स्थित हुआ । हे रामजी ! राजा की पुर्यष्टक तो जर्जरीभूत हो गई परन्तु दोनों देवियाँ उसको दिव्य दृष्टि से ऐसे देखती थीं जैसे भ्रमरी गन्ध को देखती है । राजा एक मुहूर्त पर्यन्त तो मूर्च्छा में रहा फिर उसको चेतनता फुर आई और अपने साथ शरीर देखने लगा उसने जाना कि मेरे बान्धवों ने मेरी पिण्डक्रिया की है उसको मेरा शरीर भया है और धर्मराज के स्थान को मुझे दूत ले चले हैं । हे रामजी ! इस प्रकार अनुभव करता वह धर्मराज के स्थान को चला और उसके पीछे देवी, जैसे वायु के पीछे गन्ध चली जाती है, चली, जैसे गन्ध के पीछे भ्रमरी जाती है वैसे ही राजा विदूरथ धर्मराज के पास पहुँच गया । धर्मराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसके कर्म विचार के कहो । चित्रगुप्त ने कहा, हे भगवन् ! इसने कोई अपकर्म नहीं किया बल्कि बड़े-बड़े पुण्य किये हैं और भगवती सरस्वती का इसको वर है । इसका शव फूलों मे ढका हुआ है; उस शरीर में यह भगवती के

२४६ योगवासिष्ठ ।

वर से जाकर प्रवेश करेगा । इसमें अब कुछ कहना पूछना नहीं; यह तो देवीजी के वर से बँधा है। हे रामजी ! ऐसे कहकर यमराज ने राजा को अपने स्थान में चला दिया । तब राजा आगे चले और उनके पीछे दोनों देवियाँ चलीं । राजा को यह देवियाँ देखती थीं पर राजा इनको न देख सकता था । तब तीनों उस ब्रह्माण्ड को लाँघ, जिसका राज्य विदूरथ ने किया था, दूसरे ब्रह्माण्ड में आये और उसको भी लाँघ के पद्म राजा के देश में आकर उसके मन्दिर में, जहाँ फूलों से ढका शव था आये । जैसे मेघ से वायु आन मिलता है वैसे ही एक क्षण में देवियाँ आन मिलीं । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वह राजा तो मृतक हुआ था; मृतक होकर उसने उस मार्ग को कैसे पहिचाना ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वह विदूरथ जो मृतक हुआ था उसकी वासना नष्ट न हुई थी । अपनी उस वासना से वह अपने स्थान को प्राप्त हुआ । हे रामजी ! चिद्अणु जीव के उदर में भ्रान्तिमात्र जगत् है—जैसे वट के बीज में अनन्त वट वृक्ष होते हैं वैसे ही चिद्अणु में अनन्त जगत् हैं—जो अपने भीतर स्थिर है उसको क्यों न देखे ? जैसे जीव अपने जीवत्व का अंकुर देखता है वैसे ही स्वाभाविक चिद्अणु त्रिलोकी को देखता है । जैसे कोई पुरुष किसी स्थान में धन दबा रखे और आप दूर देश में जावे तो धन को वासना से देखता है वैसे ही वासना की दृढ़ता से विदूरथ ने देखा और जैसे कोई जीव स्वप्नभ्रम से किसी बड़े धनवान् के गृह में जा उपजता है और भ्रम के शान्त होने पर उसका अभाव देखता है वैसे ही उसको अनुभव हुआ । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जिसकी वासना पिण्डदान किया की नहीं होती वह मृतक होने पर अपने साथ कैसे देह को देखता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पुरुष जो माता-पिता के पिण्ड करता है उनकी वासना हृदय में होती है और वही फल रूप होकर भासती है कि मेरा शरीर है; मेरे पीछे मेरे बाँधवों ने पिण्ड-दान किया है उससे मेरा शरीर हुआ है । हे रामजी ! सदेह हो अथवा विदेह अपनी वासना ही के अनुसार अनुभव होता है—भावना से भिन्न अनुभव नहीं होता । चित्तमय पुरुष है; चित्त में जो पिण्ड की

उत्पत्ति प्रकरण । २४७

वासना दृढ़ होती है तो आपको पिण्डवान् ही जानता है और भावना के वश से असत् भी सत् हो जाता है । इससे पदार्थों का कारण भावना ही है; कारण बिना कार्य का उदय नहीं होता । महाप्रलय पर्यन्त कारण बिना कार्य होता नहीं देखा और सुना भी नहीं । इससे कहा है कि जैसी वासना होती है वैसा ही अनुभव होता है । रामजी ने पूछा हे भगवन् ! जिस पुरुष को अपने पिण्डदान आदि कर्मों की वासना नहीं वह जब मृतक होता है तब क्या प्रेतवासना संयुक्त होता है कि मैं पापी और प्रेत हूँ ? अथवा पीछे उसके बान्धव जो उसके निमित्त क्रिया-कर्म करते हैं और जो बान्धवों ने पिण्डक्रिया की है उससे उसे यह भावना होती है कि मेरा शरीर हुआ है वह क्रिया उसको प्राप्त होती है वा नहीं होती ? अथवा उसके बान्धवों के मन में यह दृढ़ भावना हुई कि इसको शवक्रिया प्राप्त होगी और वह अपने मन में धन अथवा पुत्रादिकों के अभाव से निराश है, और किसी प्रभाव से किसी ने पिण्डादिक क्रिया की वह उसको प्राप्त होती है अथवा नहीं होती ? आप तो कहते हैं कि भावना के वश से असत् भी सत् हो जाता है यह क्या है ?

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! भावना, देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा इन पाँचों से होती है । जैसी भावना होती है वैसी ही सिद्ध होती है; जिसकी कर्त्तव्यता बली होती है उसकी जय होती है । पुत्र दारादिक बान्धव सब वासनारूप हैं । जो धर्म की वासना होती है तो बुद्धि में प्रसन्नता उपज आती है और पुण्यकर्मों से पूर्व भावना नष्ट हो शुभगति प्राप्त होती है । जो अति बली वासना होती है उसकी जय होती है । इससे अपने कल्याण के निमित्त शुभ का अभ्यास करना चाहिये ।

रामजी बोले, हे भगवन् ! जो देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा इन पाँचों से वासना होती है तो महाप्रलय और सर्ग का आदि में देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा कोई नहीं होती तो जहाँ पाँचों कारण नहीं होते और उसकी वासना भी नहीं होती उस अद्वैत से जगद्भ्रम फिर कैसे होता है ?

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! महाप्रलय और सर्ग की आदि में देश, काल, क्रिया, द्रव्य और सम्पदा कोई नहीं

२४८ योगवाशिष्ठ ।

रहती और निमित्तकारण और समवायकारण का अभाव होता है। चिदात्मा में जगत् कुछ उपजा नहीं और है भी नहीं; वास्तव में दृश्य का अत्यन्त अभाव है और जो कुछ भासता है वह ब्रह्म का किञ्चन है। वह ब्रह्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थिर है। ऐसे ही अनेक युक्तियों से मैं तुमसे कहूँगा अब तुम पूर्व कथा सुनो। हे रामजी! जब वे दोनों देवियाँ उस मन्दिर में पहुँचीं तो क्या देखा कि फूलों से सुन्दर शीतल स्थान बने हुए हैं—जैसे वसन्तऋतु में वन भूमिका होती है—और प्रातःकाल का समय है; सुवर्ण के मङ्गलरूपी कुम्भ जल से भरे रक्खे हैं; दीपकों की प्रभा मिट गई है; किवाड़ चढ़े हुए हैं, मन्दिरों में सोये हुए मनुष्यों के श्वास आते जाते हैं और महासुन्दर झरोखे हैं। ऐसे बने हुए स्थान शोभा देते हैं जैसे सम्पूर्ण कला से चन्द्रमा शोभता है और जैसे इन्द्र के स्थान सुन्दर हैं। जिस सुन्दर कमल से ब्रह्माजी उपजे हैं वैसे ही वे कमल सुन्दर हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मरणानन्तरगावस्थावर्णनन्नामै- कोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तब दोनों देवियों में उस शव के पास विदूरथ की लीला को देखा वह उसकी मृत्यु से पहले वहाँ पहुँची है और पूर्व के से वस्त्राभूषण पहिरे हुए पूर्व का सा आचार किये, पूर्व की सी सुन्दर है और पूर्व का सा ही उसका शरीर है। एवम् उसका सुन्दर मुख चन्द्रमा की नाईं प्रकाशता है और महासुन्दर फूलों की भूमि पर बैठी है। निदान लक्ष्मी के समान लीला और विष्णु के समान राजा को देख, पर जैसे दिन के समय चन्द्रमा की प्रभा मध्यम होती है वैसे ही उन्होंने लीला को कुछ चिन्तासहित राजा की बाईं ओर एक हाथ चिबुक पर रक्खे और दूसरे हाथ से राजा को चमर करती देखा। पूर्व लीला ने इनको न देखा, क्योंकि ये दोनों प्रबुद्ध आत्मा और सत्यसंकल्प थीं और वह लीला इनके समान प्रबुद्ध न थी। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! उस मण्डप में पूर्व लीला जो देह को स्थापन कर और ध्यान में विदूरथ की सृष्टि देखने को सरस्वती के साथ गई थी उस देह का आपने कुछ वर्णन न किया कि उसकी क्या दशा हुई और कहाँ गई। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! लीला

उत्पत्ति प्रकरण । २४६

कहाँ थी, लीला का शरीर कहाँ था और उसकी सत्ता कहाँ थी ? वह तो अरुन्धती के मन में लीला के शरीर की भ्रान्ति प्रतिभा हुई थी । जैसे मरुस्थल में जल की प्रतिभा होती है वैसे ही लीला के शरीर की प्रतिभा उसे हुई थी । हे रामजी ! यह आधिभौतिक अज्ञान से भासता है और बोध से निवृत्त हो जाता है । जब उस लीला को बोध में परिणाम हुआ तब उसका आधिभौतिक शरीर निवृत्त हो गया-जैसे सूर्य के तेज से बरफ का पुतला गल जाता है-और आन्तवाहिकता उदय हुई। हे रामजी ! जो कुछ जगत् है वह सब आकाशरूप है । जैसे रस्सी में सर्प भ्रम से भासता है तैसे ही आन्तवाहिकता में आधिभौतिकता भ्रम से भासती है । आदि शरीर आन्तवाहक है अर्थात् सङ्कल्पमात्र है उसमें दृढ भावना हो गई उससे पृथ्वी आदि तत्त्वों का शरीर भासने लगा । वास्तव में न कोई भूत आदिक तत्त्व है और न कोई तत्त्वों का शरीर है । उसका शव शश-के शृंगों की नाईं असत् है । हे रामजी ! आत्मा में अज्ञान से आधिभौतिक भासे हैं । जब आत्मा का बोध होता है तब आधिभौतिक नष्ट हो जाते हैं । जैसे किसी पुरुष ने स्वप्न में आपको हरिण देखा और जब जाग उठा तब हरिण का शरीर दृष्टि नहीं आया तैसे ही अज्ञान से आधिभौतिकता दृष्टि आई है और आत्मबोध हुए आधिभौतिकता दृष्टि नहीं आती । जब सत्य का ज्ञान उदय होता तब असत् का ज्ञान लीन हो जाता है । जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प भासता है और रस्सी के ज्ञान से सर्प का ज्ञान लीन होता है तैसे ही सम्पूर्ण जगत् मन से उदय हुआ है और अज्ञान से आधिभौतिकता को प्राप्त हुआ है । जैसे स्वप्न में जगत् आधिभौतिक हो भासता है और जागे में स्वप्न शरीर नहीं भासता तैसे ही आत्मज्ञान से आधिभौतिकता निवृत्त हो जाती है और आन्तवाहक शरीर भासता है । रामजी बोले, हे भगवन् ! योगीश्वर जो आन्तवाहक शरीर से ब्रह्मलोक पर्यन्त आते जाते हैं उनके शरीर कैसे भासते हैं ! वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आन्तवाहक शरीर ऐसे हैं जैसे कोई पुरुष स्वप्न में हो उसको पूर्व के जाग्रत् शरीर का स्मरण हो तब स्वप्न शरीर दृष्टि भी आता है पर उसको आकाशरूप जानता है; तैसे ही

२५० योगवाशिष्ठ ।

आधिभौतिकता बोध से नष्ट हो जाती है । जैसे शरतकाल का मेघ देखनेमात्र होता है तैसे ही ज्ञानवान् योगीश्वरों का शरीर देखनेमात्र होता है और अदृश्यरूप है; और जो शरीर भासता है पर उसको आकाशरूप ही भासता है । हे रामजी ! यह देहादिक आत्मा में भ्रान्ति से दृष्टि आते हैं और आत्मज्ञान से निवृत्त हो जाते हैं । जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प भासता है; जब रस्सी का सम्यक्ज्ञान होता है तब सर्प-भाव उसका नहीं रहता तैसे ही तत्त्वबोध होने से देह कहाँ ही और देह की सत्ता कहाँ रहे, दोनों का अभाव ही हो, केवल अद्वैत ब्रह्मसत्ता भासती है । रामजी बोले; हे भगवन् ! अन्तवाहक मे आधिभौतिक रूप होता है वा आधिभौतिक मे अन्तवाहकरूप होता है यह मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैंने तुमको बहुत बेर कहा है तुम मेरे कहे को धारण क्यों नहीं करते ? मैंने आगे भी कहा है कि जो कुछ जीव है वह सब अन्तवाहक है आधिभौतिक कोई नहीं । आदि में जो शुद्ध संविन्मात्र मे संवेदन आभास उठा है उससे इस जीव का संकल्परूप अन्तवाहक आदि शरीर हुआ । जब उसमें दृढ़ अभ्यास होता है तब वह संकल्परूपी शरीर आधिभौतिक होकर भासने लगता है । जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ़रूप हो जाता है तैसे ही प्रमाद मे संकल्प के अभ्यास से आधिभौतिकरूप हो जाता है । उस आधिभौतिक के तीन लक्षण होते हैं भारी शरीर होता है; कठोर भाव होता है और शिथिल होता है उससे अहंप्रतीति होती है इस कारण आधिभौतिक कहाता है । जब तत्त्व का बोध होता है तब आधिभौतिकता आकाशरूप हो जाती है । जैसे स्वप्न में देह से आदि लेकर जगत् बड़ा स्पष्टरूप भासता है और जब स्वप्न में स्वप्न का ज्ञान होता है कि यह स्वप्न है तब वह स्वप्न का शरीर लघु हो जाता है अर्थात् संकल्परूप हो जाता है; तैसे ही परमात्मा के बोध से आधिभौतिक शरीर निवृत्त हो जाता है और संकल्प-रूप भासता है । हे रामजी ! आधिभौतिकता अबोध के अभ्यास से प्राप्त होती है । जब उलट के उसी अभ्यास का बोध हो तब आधिभौतिकता नष्ट हो जावे और अन्तवाहकता उदय हो । हे रामजी ! जीव एक शरीर को

उत्पत्ति प्रकरण । २५१

त्याग के दूसरे को अङ्गीकार करता है-जैसे स्वप्ने से स्वप्नान्तर प्राप्त होता है और जब बोध होता है तब शरीर और कुछ वस्तु नहीं, वही आधिभौतिक शरीर शान्त हो जाता है जैसे स्वप्न से जागके स्वप्नशरीर शान्त हो जाता है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुमको भासता है वह सब भ्रममात्र है, अज्ञान से सत् की नाईं भासता है। जब आत्मबोध होगा तब सब आकाशरूप होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने स्वप्ननिरूपणं नाम चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब वह दोनों देवियाँ अन्तःपुर में गई तब प्रबुद्ध लीला कहने लगी, हे देवीजी ! समाधि में लगे मुझको कितना काल व्यतीत हुआ ? में ध्यान से भूपाल की सृष्टि में गई थी ओर मेरा शरीर यहाँ पड़ा था वह कहाँ गया ? देवी बोली-हे लीले ! तुझको समाधि में लगे इकतीस दिन व्यतीत हुए हैं जब तू ध्यान में लगी तब तेरा पुर्यष्टक विदूरथ की सृष्टि में विचरता फिरा जब इस शरीर की वासना तेरी निवृत्त हो गई तब जैसे रस से रहित पत्र सूख जाता है तैसे ही तेरा शरीर निर्जीव होकर गिर पड़ा और जैसे काष्ठ पाषाण होता है तैसे ही हो वरफ की नाईं शीतल हो गया। तब देखके सबने विचार किया कि यह मर गई इसको जलाइये और चन्दन और घृत से लपेट के जला दिया । बान्धवजन रुदन करने लगे और पुत्रों ने पिण्डक्रिया की । हे लीले ! जो तू ध्यान से उतरती तो तुझको देखके लोग आश्चर्यमान होते और अब भी देखके सब आश्चर्यमान होवेंगे कि रानी परलोक से फिर आई है। हे लीले ! अब तुझको बोध उदय हुआ है इसमें शरीर की वासना नष्ट हो गई और अन्तवाहक में दृढ़ निश्चय हुआ इस कारण वह शरीर जीवित हुआ । अब जो उसके समान तेरा शरीर हुआ है वह इस कारण है कि तुझको लीला की वासना में बोध हुआ है कि मैं लीला हूँ, इस कारण तेरा शरीर वैसा ही रहा। यह लीला शरीर की तेरी वासना नष्ट न हुई थी, इस कारण तू निर्वाण न हुई, नहीं तो विदेहमुक्त हो जाती । अब तू सत्यसंकल्प हुई जैसी तेरी इच्छा होगी तैसे ही अनु-भव होगा । हे लीले ! जैसी वासना जिसको होती है उसके अनुसार

२५२ योगवाशिष्ठ ।

उसको प्राप्त होता है। जैसे बालक को अन्धकार में जैसी भावना होती है तैसा ही भान होता है—जो वेताल की भावना होती है तो वेताल हो भासता है परन्तु वास्तव में वेताल कोई नहीं। तैसे जितनी आधिभौतिकता भासती है वह भ्रममात्र है। सब जीवों का आदि शरीर अन्तर्वाहक है सो प्रमाद से आधिभौतिकता भासता है। हे लीले ! एक लिंगशरीर है; एक अन्तर्वाहक शरीर है—यह दोनों संकल्पमात्र हैं और इनमें इतना भेद है कि लिंगशरीर संकल्परूपी मन है उसमें जिसको आधिभौतिकता का अभिमान होता है उसको गौरव और कठोररूप और वर्णाश्रम का अभिमान होता है। जिस पुरुष को ऐसे अनात्मा में आत्माभिमान हुआ है जिसकी आधिभौतिक लिङ्गदेह है उसकी चिन्तना सत्य नहीं होती। जिसको आधिभौतिक का अभिमान नहीं होता वह अन्तर्वाहक शरीर है। वह जैसा चिन्तवन करता है वैसी ही सिद्धि होती है। हे लीले ! तू अब अन्तर्वाहक में दृढ़ स्थित हुई है, इस कारण तेरा फिर वैसा ही शरीर हुआ है तेरी आधिभौतिकता बुद्धि नष्ट हो गई और वह स्थूल शरीर शव होकर गिर पड़ा है जैसे जल से रहित मेघ हो और जैसे सुगन्ध से रहित फूल हो तैसे ही तेरा शरीर हो गया है और अब तू सत्य संकल्प हुई है। जैसा चिन्तवन कर तैसा ही होगा। हे लीले ! यह कमलनयनी लीला तेरे भर्त्ता के पास बैठी है और उसको इस अन्तःपुर के लोग और सहेलियाँ जान नहीं सकतीं, क्योंकि मैंने इनको निद्रा में मोहित किया था। जब तक मेरा दर्शन इसको न होवेगा तब तक इसको और कोई न जान सकेगा अब यह हमको देखेगी। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे विचारके देवी उसको अपने संकल्प में ध्यान करने लगी तब उस लीला ने देखा कि अन्तःपुर में बहुत से सूर्यों का प्रकाश इकट्ठा हुआ है और चन्द्रमा की नाईं शीतल प्रकाश है। ऐसे दोनों देवियों को देखके उसने नमस्कार कर मस्तक नवाया और दोनों को सुवर्ण के सिंहासन पर बैठाके कहने लगी, हे जीव की दाता ! तुम्हारी जय हो ! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की। तुम्हारे ही प्रसाद से मैं यहाँ आई। देवी बोली, हे पुत्री ! तू यहाँ कैसे आई और क्या वृत्तान्त तूने देखा सो कह ?

उत्पत्ति प्रकरण । २५३

विदूरथ की लीला बोली, हे देवी । जब मेरा भर्त्ता संग्राम में घायल हुआ तब उसको देखके में मूर्च्छित हो गिर पड़ी परन्तु मृतक न भई । इसके अनन्तर फिर मुझको चेतना फुरी तो मैंने अपना वही शरीर देखा और उस शरीर से में आकाशमार्ग को उड़ी । जैसे वायु गन्ध लेकर उड़ता है वैसे ही एक कुमार्ग मुझे उड़ाकर परलोक में भर्त्ता के पास बैठा आप अन्तर्धान हो गई । मेरा भर्त्ता जो संग्राम में थका था वह आके सो रहा है ओर में सँभलती देखती मार्ग में आई हूँ, परन्तु मुझको तुम दृष्टि कहीं न आईं । यहाँ कृपाकर तुमने दर्शन दिया है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार सुनके देवी ने प्रबुध लीला से कहा कि अब में राजा की जीवकला को छोड़ती हूँ । ऐसे कहके देवी ने नासिका के मार्ग से जीवकला को छोड़ दिया और जैसे कमल के भीतर वायु प्रवेश कर जावे अथवा शरीर में वायु प्रवेश कर जावे वैसे ही शरीर में जीवकला प्रवेश कर गई । जैसे समुद्र जल से पूर्ण होता है वैसे ही पुर्यष्टक वासना से पूर्ण थी । शरीर की कान्ति उज्ज्वल हो गई और जैसे वसन्त ऋतु में फूल ओर वृक्षों में रस फैलता है, अङ्गों में प्राणवायु फैल गई तब सब इन्द्रियाँ खिल आईं जैसे वसन्तऋतु में फूल खिल आते हैं । तब राजा फूलों की शय्या से इस भाँति उठ खड़ा हुआ जैसे रोका हुआ विन्ध्याचल पर्वत उठ आवे । तब दोनों लीला राजा के सम्मुख आ खड़ी हुईं और राजा ने कहा मेरे आगे तुम कौन खड़ी हो ? प्रबुध लीला ने कहा, हे स्वामी ! में तुम्हारी पूर्व पटरानी लीला हूँ; जैसे शब्द के सङ्ग अर्थ रहता है तैसे सदा तुम्हारे सङ्ग रहती हूँ । जब तुम यहाँ शरीर त्याग के परलोक में गये थे तब मुझसे तुम्हारा अतिस्नेह था, इससे मेरा प्रतिबिम्ब यह लीला तुझको भासी थी । अब जो और कथा का वृत्तान्त है सो में तुमसे कहती हूँ । हेराजन् ! हमारे ऊपर इस देवी ने कृपा की है जो हमारे शीश पर स्वर्ण के सिंहासन पर बैठी है । यह सरस्वती सर्व की जननी है; इसने हमारे ऊपर बड़ी कृपा की है ओर परलोक से तुम्हें ले आई है । हे रामजी ! ऐसे सुनके राजा प्रसन्न हो उठ खड़ा हुआ और सरस्वती के चरणों पर मस्तक नवाकर बोला, हे सरस्वती ! तुमको मेरा नमस्कार है । तुम सबकी हितकारिणी हो और तुमने मेरे ऊपर बड़ा

२५४ योगवाशिष्ठ ।

अनुग्रह किया है । अब कृपा करके मुझको यह वर दो कि मेरी आयु बड़ी हो; निष्कण्टक राज्य करूँ; लक्ष्मी बहुत हो; रोग कष्ट न हो और आत्मज्ञान से सम्पन्न होऊँ अर्थात् भोग और मोक्ष दोनों दो । इतना कह-कर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार राजा ने कहा तब देवी ने उसके शीश पर आशीर्वाद दिया कि हे राजन् ! ऐसा ही होगा । तेरी आयु बड़ी होगी; तेरा शत्रु भी कोई न होगा; निष्कण्टक राज्य करेगा; आपदा तुझको न होगी; लक्ष्मी संपदा से सम्पन्न होगा; तेरी प्रजा भी बहुत सुखी रहकर तुझको देखके प्रसन्न होगी; तेरी प्रजा में आपदा किसी को न होगी और तू आत्मानन्द से पूर्ण होगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जीवजीवन्वर्णनन्नामै- कचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहके देवी अन्तर्धान हो गई और प्रातःकाल का समय हुआ; सब लोग जाग उठे; सूर्य भी उदय हुआ और सूर्यमुखी कमल खिल आये । राजा दोनों लीला को कण्ठ लगा प्रसन्न और आश्चर्यमान हुआ, मन्दिर में नगारे बजने लगे और नाना शब्द होने लगे, मन्दिर में बड़ा हुलास और आनन्द हुआ अनेक अङ्गना नृत्य करने लगीं और उत्साह हुआ । विद्याधर, सिद्ध, देवता, फूलों की वर्षा करने लगे और लोग बड़े आश्चर्यमान हुए कि लीला परलोक से फिर आई है और अपने भर्त्ता और एक आप-सी दूसरी लीला ले आई है। हे रामजी ! यह कथा देश से देशान्तर चली गई और सब लोग सुनके आश्चर्यमान हुए । जब इस प्रकार यह कथा प्रसिद्ध हुई तब राजा ने भी सुना कि मैं मर के फिर जिया हूँ और विचारा कि फिर मेरा अभिषेक हो । निदान मन्त्री और मण्डलेश्वरों ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों ओर से सब समुद्र और सर्व तीर्थों का जल मँगा राजा को राज का अभिषेक किया और चारों समुद्रों पर्यन्त राजा निष्कण्टक राज्य करने लगा । राजा और लीला यह पूर्व की कथा को विचारते और आश्चर्यमान होते थे । सरस्वती के उपदेश और प्रसाद से अपना पुरुषार्थ पाके राजा और दोनों लीला ने इस भाँति

उत्पत्ति प्रकरण । २५५

सहस्र वर्ष पर्यन्त जीवन्मुक्त होके राज किया और मन सहित षट्इन्द्रियों को वश करके यथालाभ संतुष्ट रहे और दृश्यभ्रम उनका नष्ट हो गया । ऐसा सुन्दर राजा था कि उसकी सुन्दरता की कणिका मानों चन्द्रमा थी और उसके तेज की कणिका मानों सूर्य थी निदान उसने प्रजा को भली प्रकार संतुष्ट किया और सब प्रजा राजा को देख के प्रसन्न हुई और विदेहमुक्त हो दोनों लीला और तीसरा राजा निर्वाण पद को प्राप्त हुए ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने निर्वाण-वर्णनन्नाम द्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह दोनों कथा एक आकाशज ब्राह्मण की और दूसरी लीला की मैंने तुमको दृश्यदोष के निवृत्ति अर्थ विस्तारपूर्वक सुनाई है । हे रामजी ! दृश्य की दृढ़ता जो हो रही है उसको त्याग करो । अब तुम इन दोनों इतिहासों को संक्षेपमात्र से सुनो । यह जगत् जो तुमको भासता है आभासरूप है—आदि से कुछ उपजा नहीं जो वस्तु सत् होती है उसके निवारण में प्रयत्न होता है और जो वस्तु असत् ही हो उसकी निवृत्ति होने में कुछ यत्न नहीं । इस कारण ज्ञानवान् को सब आकाशरूप भासता है और आकाश की नाईं स्थित होता है । हे रामजी ! आदि जो ब्रह्मसत्ता में आभास संवेदन फुरा है सो ब्रह्मरूप होकर स्थित हुआ है । वह ब्रह्म पृथ्वी आदिक भूतों से रहित है । जो आप ही आभासरूप हो उसके उपजाये जगत् कैसे सत् हो ? हे रामजी ! ज्ञानवान् पुरुष आकाशरूप है । जिसको आत्मपद का साक्षात्कार हुआ उसको दृश्यभ्रम का अभाव हो जाता है और जो अज्ञानी है उसको जगत् भ्रम स्पष्ट भासता है । शुद्ध चिदाकाश का एक अणु जीव है और उस जीव अणु में यह जगत् भासता है, उस जगत् की सृष्टि में तुमको क्या कहूँ; नीति क्या कहूँ; वासना क्या कहूँ और पदार्थों को क्या कहूँ ? हे रामजी ! जगत् कुछ उपजा नहीं; केवल संवेदन के फुरने से जगत् भासता है । शुद्ध संवित् में संवेदनरूपी नदी चली है और उसमें यह जगत् फुरता है । जब संवेदन को यत्न करके रोकोगे तब दृश्यभ्रम नष्ट हो जावेगा । प्रयत्न करना यही है कि संवेदन को अन्तर्मुख करे और

२५६ योगवाशिष्ठ ।

जब तक आत्मा का साक्षात्कार न हो तब तक श्रवण, मनन और निदिध्यासन में दृढ़ अभ्यास करना चाहिए । जब साक्षात्कार होता है तब दृश्य नष्ट हो जाता है । हे रामजी ! यह सर्व जगत् जो तुमको भासता है सो हमको अखण्ड ब्रह्मसत्ता ही भासता है । जगत् मायामय है, परन्तु माया भी कुछ और वस्तु नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है । रामजी बोले, बड़ा आश्चर्य है ! बड़ा आश्चर्य है !! हे मुनीश्वर ! आपने मुझसे परम दशा कही है । आपका उपदेश दृश्यरूपी तृणों का नाशकर्त्ता दावाग्नि है और आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक तापों का शान्तकर्त्ता चन्द्रमा है । हे मुनीश्वर ! आपके उपदेश से अब मैं ज्ञातज्ञेय हुआ हूँ और पाँच विकल्प मैंने विचारे हैं । प्रथम यह कि यह जगत् मिथ्या है और इसका स्वरूप अनिर्वचनीय है; दूसरे यह कि आत्मा में आभास है; तीसरे यह कि इसका स्वभाव परिणामी है; चौथे यह कि अज्ञान से उपजा है और पाँचवें यह कि यह अनादि अज्ञान पर्यन्त है । ऐसे जान के ज्ञानवानों और निर्वाण मुक्तों की नाईं शान्तात्मा हुआ । हे मुनीश्वर ! और शास्त्रों से यह आपका उपदेश आश्चर्य है । श्रवणरूपी पात्र आपके वचनरूपी अमृत से तृप्त नहीं होते । इससे मेरा यह संशय दूर करो कि लीला के भर्त्ता को प्रथम वशिष्ठ, फिर पद्म और फिर विदूरथ की सृष्टि का अनुभव कैसे हुआ और उनमें उसको कहीं दिन हुआ, कहीं मास, कहीं वर्षों का अनुभव हुआ, सो काल का व्यतिक्रम कैसे हुआ ? हे मुनीश्वर ! इससे स्पष्ट करके कहिए कि आपके वचन मेरे हृदय में स्थित हों । एक बेर कहने से हृदय में स्थित नहीं होते, इससे फिर कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! शुद्धसंविद् सबका अपना आप है । उससे जैसा संवेदन फुरता है तैसा रूप हो भासता है । कहीं क्षण में कल्पों के समूह बीते भासते हैं और कहीं कल्प में क्षण का अनुभव होता है । हे रामजी ! जिसको विष में अमृतभावना होती है उसको अमृत ही हो भासता है और जिसको अमृत में विष की भावना होती है तब वही विषरूप हो भासता है । किसी पुरुष का कोई शत्रु होता है, पर उससे वह मित्र की भावना करता है तो वह मित्ररूप ही भासता है और जिसको मित्र में

उत्पत्ति प्रकरण। २५७

शत्रुभावना होती है तब वही शत्रु हो भासता है । हे रामजी ! जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही स्वरूप हो भासता है । जिसका संवेदन तीव्र-भाव के अभ्यास से निर्मलभाव को प्राप्त होता है उसका संकल्पसत् होता है और जैसे चेतता है तैसे ही सिद्ध होता है । इससे संवेदन की तीव्रता हुई है । हे रामजी ! रोगी को एक रात्रि कल्प के समान व्यतीत होती है और जो आरोग्य होता है उसको रात्रि एक क्षण की नाईं व्यतीत होती है । एक मुहूर्त्त के स्वप्न में अनेक वर्षों का अनुभव करता है और जानता है कि मैं उपजा हूँ; ये मेरे माता-पिता हैं; अब मैं बड़ा हुआ और ये मेरे बान्धव हैं । हे रामजी ! एक मुहूर्त्त में इतने भ्रम देखता है और जागे पर एक मुहूर्त्त भी नहीं बीतता । हरिश्चन्द्र को एक रात्रि में बारह वर्षों का अनुभव हुआ था और राजा लवण को एक क्षण में सौ वर्षों का अनुभव हुआ था । इससे जैसा जैसा रूप होकर संवेदन फुरता है तैसा ही तैसा होकर भासता है । हे रामजी ! ब्रह्मा के एक मुहूर्त्त में मनुष्य की आयु व्यतीत हो जाती है । ब्रह्मा जितने काल में एक मुहूर्त्त का अनुभव करता है मनुष्य उतने ही में पूर्ण आयु का अनुभव करता है और ब्रह्मा जितने काल में अपनी संपूर्ण आयु का अनुभव करता है सो विष्णु का एक दिन होता है । ब्रह्मा की आयु व्यतीत हो जाती है और विष्णु को एक दिन का अनुभव होता है । इससे जैसे जैसे संवेदन में दृढ़ता होती है तैसा तैसा भाव होता है । हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुम देखते हो सो संवेदन फुरने में स्थित है । जब संवेदन स्थित होता है तब न दिन भासता है; न रात्रि भासता है; न कोई पदार्थ भासते हैं और न अपना शरीर भासता है केवल आत्मतत्त्वमात्र सत्ता रहती है । इससे तुम देखो कि सब जगत् मन के फुरने में होता है । जैसा जैसा मन फुरता है तैसा तैसा रूप हो भासता है । कड़वे में जिसको मीठे की भावना होती है तो कडु वा उसको मीठा हो जाता है और मीठे में जिसको कटुक भावना होती है तब मधुर भी उसको कटुकरूप हो जाता है । स्वप्न और शून्य स्थान में नाना प्रकार के व्यवहार होते भासते हैं और स्थित पड़ा स्वप्न में दौड़ता फिरता है । इससे जैसी फुरना मन में होती है

२५८ | योगवाशिष्ठ ।

तैसा ही हो भासता है। हे रामजी! नौका में बैठे हुए पुरुष को नदी के तट वृक्षों सहित दौड़ते भासते हैं। जो विचारवान् हैं वे चलते भासने में उन्हें स्थिर ही जानते हैं। और जो पुरुष भ्रमता है उसको स्थिर भूत मन्दिर भ्रमते भासते हैं और जो विचार में दृढ़ है उसको भ्रमते भासने में भी अचल बुद्धि होती है। इससे जैसा जैसा निश्चय होता है तैसा ही तैसा हो भासता है। हे रामजी! जिसके नेत्र में दूषण होता है उसको श्वेत पदार्थ भी पीतवर्ण भासता है और जिसके शरीर में वात, पित्त, कफ का क्षोभ होता है उसको सब पदार्थ विपर्यय भासते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी आकाश-रूप भासती है और आकाश पृथ्वीरूप हो भासता है; चल पदार्थ अचल रूप भासता है और अचल पदार्थ चलता भासता है। हे रामजी! जैसे स्वप्न में अङ्गना असतरूप होती है, परन्तु भ्रान्ति से उसको स्पर्श करके प्रसन्न होता है तो उस काल में प्रत्यक्ष ही भासती है और जैसे बालक को परछाहीं में बेताल भासता है सो असत् ही सतरूप हो भासता है। हे रामजी! शत्रु में जो मित्र भावना होती है तो वह शत्रु भी मित्र सुहृद् हो भासता है और जो मित्र में शत्रुभाव होता है तो वह सुहृद् शत्रुरूप हो भासता है। जैसे रस्सी में सर्प है नहीं, परन्तु भ्रम से सर्प भासता है और भय देता है तैसे ही बान्धव में जो बान्धव की भावना न करे तो बान्धव भी अबान्धव हो भासता है और अबान्धव भी भावना के अभाव से बान्धव हो जाते हैं। हे रामजी! शून्य स्थान में और स्वप्न में बड़े क्षोभ भासते हैं और निकटवर्ती को जाग से कुछ नहीं भासता। स्वप्न-वाले को सुनने का अनुभव होता है और जाग्रत्वाले को जाग्रत् का अनुभव होता है, इत्यादिक पदार्थ विपर्यय भ्रम से भासते हैं। जब मन फुरता है तबही भासता है तैसे ही लीला के भर्त्ता को भी ऐसी सृष्टि का अनुभव हुआ। जैसे जाग्रत् के एक मुहूर्त का स्वप्न में बहुत काल का अनुभव होता है तैसे ही लीला के भर्त्ता को भी हुआ था। जैसी जैसी मन की स्फूर्ति होती है तैसा ही तैसा रूप चैतन्य संवित् में भासता है। हमको सदा ब्रह्मा का निश्चय है इससे हमको सब जगत् ब्रह्मस्वरूप ही भासता है और जिसको जगत् भ्रम दृढ़ है उसको जगत् ही भासता है।

उत्पत्ति प्रकरण । २५६

हे रामजी ! जो कुछ जगत् भासता है सो कुछ आदि से उपजा नहीं- सब आकाशरूप है । रोकनेवाली कोई भीति नहीं है, बड़े विस्तार से जगत् है परन्तु स्वप्नवत् है । जैसे थम्भे में बनाये बिना पुतली शिल्पी के मन में भासती है और थम्भे में कुछ बनी नहीं तैसे ही आत्मरूपी थम्भा है उसमें जगतरूपी पुतलियों को संवेदन रचता है परन्तु वह कुछ पदार्थ नहीं है आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों है । हे रामजी ! जैसे एक स्थान में दो पुरुष लेटे हों और उनमें एक जागता हो और दूसरा स्वप्न में हो तो जो स्वप्न में है उसको बड़े युद्ध होते भासते हैं और जागे हुए को आकाशरूप है तैसे ही जो प्रबोध आत्मज्ञानवान् है उसको जगत् का सुषुप्ति की नाईं अभाव है और जो अज्ञानी है उसको नाना प्रकार के व्यवहारों सहित स्पष्ट भासता है । जैसे वसन्तऋतु में पत्र, फल और गुच्छे रससहित भासते हैं तैसे ही आत्मसत्ता चैतन्यता से जगतरूप भासती है । जैसे स्वर्ण में द्रवता सदा रहती है परन्तु जब अग्नि का संयोग होता है तभी भासती है । हे रामजी ! आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । जैसे अवयवी और अवयवों में और पृथ्वी और गन्ध में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । ब्रह्मसत्ता ही संवेदन से जगतरूप होकर भासती है और दूसरी कोई वस्तु नहीं । जब महा- प्रलय होता है और सर्ग नहीं होता तब कार्यकारण की कल्पना कोई नहीं होती, केवल चिन्मात्र सत्ता होती है और उसमें फिर चिदाकाश जगत् भासता है तो वही रूप हुआ । जो तुम कहो कि इस जगत् का कारण स्मृति है तो सुनो जब महाप्रलय होता है तब ब्रह्माजी तो विदेह मुक्त होते हैं फिर वह जगत् के कारण कैसे हों और जो तुम स्मृति का कारण मानो तो स्मृति भी अनुभव में होती है जो स्मृति से जगत् हुआ तो भी अनुभवरूप हुआ । रामजी ने पूछा; हे भगवन् ! पद्म राजा के मन्त्री नौकर और सब लोग विदूरथ को कैसे जाकर मिले ? यह वार्ता फिर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! केवल चेतनसंवित् सबका अपना आप है उस संवित् के आश्रय में जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही रूप हो भासता है । हे रामजी ! जब राजा विदूरथ मृतक होने लगा तब उसकी

२६० योगवाशिष्ठ ।

वासना उनमें थी और मन्त्री, नौकर आदिक राजा के अङ्ग हैं इस कारण वैसे ही मन्त्री और नौकर राजा को मिले। हे रामजी ! जैसी भावना संवेदन में दृढ़ होती है तैसा ही रूप हो भासता है। एक चल पदार्थ होते हैं और एक अचल होते हैं, जो अचल पदार्थ हैं उनका प्रतिबिम्ब आदर्श में भासता है और चल पदार्थ रहता नहीं भासता, इससे उसका प्रतिबिम्ब नहीं भासता। तैसे ही जिस पदार्थ की तीव्र संवेग भावना होती है उसी का प्रतिबिम्ब चेतन दर्पण में भासता है, अन्यथा नहीं भासता। जैसे तीव्र वेगवान् बड़ा नद समुद्र में शीघ्र ही जा मिलता है और दूसरे नहीं प्राप्त हो सकते तैसे ही जिसकी दृढ़ वासना होती है वह इसके अनुसार शीघ्र जाकर पाता है। हे रामजी ! जिसके हृदय में अनेक वासना होती हैं और अच्छी तीव्रता होती है उसी की जय होती है। जैसे समुद्र में अनेक तरङ्ग होते हैं तो कोई उपजता है और कोई नष्ट हो जाता है, कोई सदृश होता है कोई विपर्यक होता है; उसके सदृश मन्त्री और नौकर भी हुए। हे रामजी ! एक एक चिद् अणु में अनेक सृष्टि स्थित होती हैं; पर वास्तव में कुछ नहीं केवल चिदाकाश ही चिदाकाश में स्थित है। यह जो जगत् भासता है सो आकाश ही रूप है जो जाग्रतरूप होकर असत् ही सतरूप की नाईं भासता है। जैसे पत्र, फल, फूल सब वृक्षरूप हैं और वृक्ष ही ऐसे रूप होकर स्थित हैं तैसे ही अनन्त शक्ति परमात्मा, अनेकरूप होकर भासता है। हे रामजी ! द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, त्रिपुटी ज्ञानी को अजन्मपद भासता है और अज्ञानी को द्वैतरूप जगत् होकर भासता है। कहीं शून्य भासता है, कहीं तम भासता है और कहीं प्रकाश भासता है। देश, काल क्रिया, द्रव्य आदिक सब जगत् आदि, अन्त और मध्य से रहित स्वच्छ आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है जैसे सोमजल में तरङ्ग होते हैं सो जल ही रूप हैं तैसे ही अहं, त्वं आदिक जगत् भी बोधरूप है और सदा अपने आपमें स्थित है—उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने प्रयोजन वर्णनन्नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४३ ॥

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उत्पत्ति प्रकरण । २६१

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अहं, त्वं आदिक दृश्यभ्रान्ति कारण बिना परमात्मा से कैसे उदय हुई है ? जिस प्रकार में समझूँ उसी प्रकार मुझको समझाइये । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो कुछ कारण-कार्य जगत् भासता है वह परमात्मा से उदय हुआ है अर्थात् संवेदन के फुरने से इकट्ठे ही पदार्थ भास आये हैं और सर्वदा, सर्वप्रकार, सर्वात्मा, अजरूप अपने आप में स्थित हैं। हे रामजी ! यह सर्व शब्द और अर्थ-रूप कल्पना जो भासी है, सो ब्रह्मरूप है; ब्रह्म से कुछ भिन्न नहीं और ब्रह्मसत्ता सर्व शब्द अर्थ की कल्पना से रहित अपने आप में स्थित है। जैसे भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं और तरङ्ग जल से भिन्न नहीं तैसे ही ब्रह्म से भिन्न जगत् नहीं-ब्रह्मस्वरूप ही है। हे रामजी ! ईश्वर जो आत्मा है सो जगतरूप है, जगत् ईश्वररूप है। जैसे सुवर्ण भूषणरूप है और भूषण सुवर्णरूप है अर्थात् सुवर्ण में भूषण शब्द और अर्थ कल्पित हैं-वास्तव में नहीं-तैसे ही जगत् आत्मा का आभासरूप है-वास्तव में कुछ नहीं। हे रामजी ! जो कुछ जगत् है सो ब्रह्मरूप है ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। जैसे अवयव अवयवी से भिन्न नहीं तैसे ही आत्मा से जो कुछ अवयवी जगत् है सो भिन्न नहीं। आत्मा में संवेदन के फुरने से तन्मात्रा फुरी है और आत्मा में ही इनका उपजना सब हुआ है; पीछे विभाग-कल्पना हुई है इसलिये उनसे जो भूत हुए हैं वे आत्मा से अन्य नहीं। जैसे शिला में चितेरा भिन्न-भिन्न पुतली कल्पता है सो शिलारूप ही हैं; भिन्न कुछ नहीं; तैसे ही अहं त्वं आदिक जगत् चिद्घन आत्मा में मन-रूपी चितेरे ने कल्पा है सो चिद्घनरूप ही है; कुछ भिन्न नहीं जैसे जल में तरङ्ग स्थित होते हैं सो जलरूप ही हैं; तरङ्गों का शब्द और अर्थ जल में कोई नहीं, तैसे ही आत्मा जगत् स्थित है, पर जगत् के शब्द और अर्थ से रहित है। हे रामजी ! जगत् परमपद से भिन्न नहीं और परमपद जगत् बिना नहीं; केवल चिद्रूप अपने आपमें स्थित है। जैसे वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं है स्पन्द और निस्पन्द दोनों रूप वायु के ही हैं। जब स्पन्दरूप होता है तब स्पर्शरूप होकर भासता है और निस्पन्द हुए स्पर्श नहीं भासता; तैसे ही जगत् और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं; जब

२६२ योगवाशिष्ठ ।

संवेदन किञ्चित्‌रूप होता है तब जगत्‌रूप ही भासता है और संवेदन के निस्पन्द हुए से जगत् नहीं भासता, पर आत्मसत्ता सदा एकरूप है। हे रामजी ! जब संवेदन फुरने से रहित होकर आत्मपद में स्थित हो तब यदि संकल्परूप जगत् फिर भी भासे तो आत्मरूप ही भासे। जैसे वायु के स्पन्द और निस्पन्द दोनों रूप अपने आप ही भासते हैं तैसे ही इसको भी भासता है। जैसे वायु में स्पन्दता वायुरूप स्थित है तैसे ही आत्मा में जगत् आत्मरूप से स्थित है। जैसे तेज अणु का प्रकाश जब मन्दिर में होता है तब बाहर भी प्रकट होता है तैसे ही जब केवल संवित्मात्र में संवेदन स्थित होता है तब फुरने में संवित्मात्र ही भासता है। हे रामजी ! जैसे रसतन्मात्रा में जल स्थित होता है तैसे ही आत्मा में जगत् स्थित है। जैसे गन्धतन्मात्रा के भीतर सम्पूर्ण पृथ्वी स्थित है तैसे ही किञ्चनरूप जगत् आत्मा में स्थित है। वह निराकार और चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता उदय और अस्त से रहित अपने आपमें स्थित है, प्रपञ्चभ्रम उसमें कोई नहीं। हे रामजी ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको दृढ़भूत जगत् भी आकाशरूप भासता है और जो अज्ञानी हैं उनको असतरूप जगत् भी सतरूप हो भासता है। हे रामजी ! जैसा-जैसा संवेदन चित्तसंवित् में फुरता है तैसा ही तैसा रूप जगत् हो भासता है। ये जितने तत्त्व और तन्मात्रा हैं वे सब चित्तसंवेदन के फुरने से स्थित हुए हैं; जैसी-जैसी उससे स्फूर्ति होती है तैसी तैसी होकर भासती है, क्योंकि आत्मा सर्वशक्तिमान् है इसलिये जिस जिस पदार्थ का फुरना फुरता है वही अनुभव में सतरूप होकर भासता है। पञ्चज्ञानेन्द्रिय और छठे मन का जो कुछ विषय होता है वह सब असतरूप है और आत्मसत्ता इनसे अतीत है। विश्व भी क्या रूप है; जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् स्थित है। जैसे तेज और प्रकाश अनन्यरूप हैं तैसे ही आत्मा और जगत् अनन्यरूप हैं। जैसे थम्भे में शिल्पी पुतलियाँ देखता है; जैसे मृत्तिका के पिण्ड में कुम्हार वर्तन देखता है और जैसे भीत पर चितेरा रङ्ग की सूरतें लिखता है सो अनन्यरूप है तैसे ही परमात्मा में सृष्टि अनन्यरूप है। हे रामजी ! जैसे मरुस्थल में मृगतृष्णा का जल