योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २७५
से ही अज और अविनाशी पुरुष को नाना प्रकार के देह प्राप्त होते हैं और जानता है कि मैं अब उपजा, अब जीता हूँ फिर मर जाऊँगा । जैसे नौका में बैठे भ्रम से तट के वृक्ष भ्रमते दीखते हैं तैसे ही भ्रम से अपने में जन्मादि अवस्था भासती हैं । आत्मा के अज्ञान से जीव को 'अहं' आदि कल्पना फुरती हैं । जैसे मथुरा के राजा लवण को स्वप्न में चाण्डाल का भ्रम हुआ था तैसे ही चित्त के फुरने से जीव जगद्भ्रम देखते हैं । हे रामजी ! यह सब जगत् मन के भ्रम से भासता है । शिव जो परम तत्त्व है सो चिन्मात्र है; उसमें जब चैत्योन्मुखत्व होता है कि 'मैं हूँ' उसका ही नाम जीव है । जैसे सोमजल में द्रवता होती है, इससे उसमें चक्र फुरते हैं और तरङ्ग होते हैं; तैसे ही ब्रह्मरूपी सोमजल में जीवरूपी चक्र फुरते हैं और चित्तरूपी तरङ्ग उदय होते हैं और सृष्टिरूपी बुद्बुदे उपजकर लीन हो जाते हैं । हे रामजी ! चेतन स्फूर्ति द्वारा जीव की नाईं भासता है । जैसे समुद्र ही द्रवता से तरङ्गरूप हो भासता है; तैसे ही चित्त चैत्य के संयोग से जीव कहाता है । उस जीव में जब संकल्प का फुरना होता है तब मन कहाता है; जब संकल्प निश्चय रूप होता है तब बुद्धि होकर स्थित होता है और जब अहंभाव होता है तब अहं-प्रतिकार कहाता है । उस अहंभाव को पाकर तन्मात्रा की कल्पना होती है और पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश ये सूक्ष्म भूत होते हैं—उनके पीछे जगत् होता है । हे रामजी ! असतरूपी चित्त के संसरने से ही जगत्रूप हो भासता है । जैसे नेत्रदूषण से आकाश में मुक्तमाला; भ्रममात्र गन्धर्वनगर और स्वप्नभ्रम से स्वप्नजगत् भासते हैं तैसे ही चित्त के संसरने से जगद्भ्रम भासता है । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा नित्य, तृप्त, शान्तरूप, सम और अपने आप ही में स्थित है । उसमें चित्तसंवेदन ने जगत् रचा है और उसको भ्रम से सत्य की नाईं देखता है । जैसे स्वप्न सृष्टि को मनुष्य भ्रम से देखता है; तैसे ही यह जगत् फुरने से सत्य भासता है । हे रामजी ! मन के संसरने का नाम जाग्रत् है; अहंकार का नाम स्वप्न है; चित्त जो सजातीयरूप चेतनेवाला है उसका नाम सुषुप्ति है और चिन्मात्र का नाम तुरीयपद है । जब शुद्ध चिन्मात्र में अत्यन्त