भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 273

२७६ | योगवाशिष्ट ।

परिणाम हो तब उसका नाम तुर्यातीत पद है । उसमें स्थित हुआ फिर शोकवान् कदाचित् नहीं होता । उसी ब्रह्मसत्ता से सब उदय होते हैं और उस ही में सब लीन होते हैं और वास्तव में न कोई उपजा है और न कोई लीन होता है; चित्त के फुरने से ही सब भ्रम भासता है । जैसे नेत्र-दूषण से आकाश में मुक्तमाला भासती है तैसे ही चित्त के फुरने से यह जगत् भासता है । हे रामजी ! जैसे वृक्ष के बढ़ने को आकाश ठौर देता है कि जितनी बीज की सत्ता हो उतना ही आकाश में बढ़ता जावे तैसे ही सबको आत्मा ठौर देता है । अकर्त्तारूप भी संवेदन से भासता है । हे रामजी ! जैसे निर्मल किया हुआ लोहा आरसी की नाईं प्रतिबिम्ब ग्रहण करता है तैसे ही आत्मा में संवेदन से जगत् का प्रतिबिम्ब होता है; पर वास्तव में जगत् भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं है । जैसे एक ही बीज, पत्र, फूल, फल और टास हो भासता है तैसे ही आत्मा संवेदन से नानारूप जगत् हो भासता है । जैसे पत्र और फूल वृक्ष से भिन्न नहीं होते तैसे ही अबोधरूप जगत् भी बोधरूप आत्मा से भिन्न नहीं । जो ज्ञानवान् है उसको अखण्डसत्ता ही भासती है । जैसे समुद्र ही तरङ्ग और बुद्बुदे होकर और बीज ही पत्र, फूल, फल और टास होकर भासते हैं; तैसे ही अज्ञानी को भिन्न-भिन्न नामरूपसत्ता भासती है । 'मूर्ख' जो देखता है तो उनके नामरूप सत् मानता है ज्ञानवान् देखके एक रूप ही जानता है । ज्ञानवान् को एक ब्रह्मसत्ता ही अनन्त भासती है और जगद्भ्रम उनको कोई नहीं भासता है । इतना सुन रामजी ने कहा; बड़ा आश्चर्य है कि असतरूपी जगत् सत् होकर बड़े विस्तार से स्पष्ट भासता है । यह जगत् ब्रह्म का आभास है; अनेक तन्मात्रा उसके जल और बँदों की नाईं हे और अविद्या करके फुरती है । ऐसा भी मैंने सुना है । हे मुनीश्वर ! यह स्फूर्त्ति बहिर्मुख कैसे होती है और अन्तर्मुख कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार का दृश्य का अत्यन्त अभाव है । अनहोते दृश्य के फुरने से अनुभव होता है । शुद्ध चिन्मात्र ब्रह्मसत्ता में फुरने से जो जीवत्व हुआ है वह जीवत्व असत् है और सत् की नाईं होता है । जीव ब्रह्म से अभिन्न है पर फुरने से भिन्न की नाईं स्थित होता है । उस जीव में