योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २७७
जब संकल्प कलना होती है तब मन रूप होके स्थित होता है; स्मरण करके चित्त होता है, निश्चय करके बुद्धि होती है और अहंभाव करके अहंकार होता है । फिर काकताला की नाईं चिद्अणु में तन्मात्रा फुर आती है । जब शब्द सुनने की इच्छा हुई तब श्रवण इन्द्रिय प्रकट हुई; जब देखने की इच्छा हुई तब नेत्र इन्द्रिय प्रकट हुई; गन्ध लेने की इच्छा से नासिका इन्द्रिय प्रकट हुई; स्पर्श की इच्छा से त्वचा इन्द्रिय प्रकट हुई और रस लेने की इच्छा से रसना इन्द्रिय प्रकट हुई । इस प्रकार पाँचों इन्द्रियाँ प्रकट हुई हैं और भावना से सत् ही असत् की नाईं भासने लगा । हे रामजी ! इस प्रकार आदि जीव हुए हैं और उनकी भावना से अन्तर्वाहक शरीर हो आये हैं । चलते भासते हैं पर अचलरूप हैं, इससे जो कुछ जगत् भासता है वह सब ब्रह्मस्वरूप है भिन्न कुछ नहीं । प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ब्रह्म है और संवेदन ब्रह्म से ही अनेकरूप नाना प्रकार के भासते हैं । जैसा जैसा संवेदन फुरता है तैसा तैसा रूप होकर भासता है । जब दृश्य को चेतता है तब नाना प्रकार का दृश्य भासता है और जब अन्तर्मुख ब्रह्म चेतता है तब ब्रह्मरूप होकर भासता है । हे रामजी ! दृश्य कुछ उपजा नहीं, आत्मा सदा अपने आप में स्थित है । जब दृश्य असंभव हुआ तब बन्धन और मोक्ष किसको कहिये और विचार किसका कीजिये ? सर्वकल्पना का अभाव है । यह जो तुम्हारा प्रश्न है उसका उत्तर सिद्धान्तकाल में होगा यहाँ न बनेगा । जैसे कमल के फूलों की माला अपने काल में बनती है और बिना समय शोभा नहीं देती तैसे ही तुम्हारा प्रश्न सिद्धान्तकाल में शोभा पावेगा; समय बिना सार्थक शब्द भी निरर्थक होता है । हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ हैं उनका फल भी समय पाके होता है; समय बिना नहीं होता इससे अब पूर्व प्रसंग सुनो । हे रामजी ! ब्रह्म में चैत्योन्मुखत्व से आदि जीव ने आपको पिता, माता जाना । जैसे स्वप्न में आपको कोई देखे तैसे ही ब्रह्माजी ने आपको जाना । उन ब्रह्मा ने प्रथम "ॐ" शब्द उच्चारण किया; उस शब्द तन्मात्रा से चारों वेद देखे और उसके अनन्तर मनोराज से सृष्टि रची । तब असतरूप सृष्टि भावना से सत्य होकर भासने लगी । जैसे स्वप्न में सर्प और गन्धर्वनगर भासते हैं