योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ | योगवाशिष्ठ ।
तेसे ही असत्यरूप सृष्टि सत्य भासने लगी । हे रामजी ! ब्रह्मसत्ता में जैसे ब्रह्मा आदिक उपजे हैं वैसे ही और जीव, कीट आदि भी उत्पन्न हुए । जगत् का कारण संवेदन है । संवेदन भ्रम से जीवों को जगत् भासता है । उनको भौतिक शरीर में जो अहं प्रतीति हुई है उससे अपने निश्चय के अनुसार शक्ति हुई । ब्रह्मा में ब्रह्मा की शक्ति का निश्चय हुआ और चींटी में चींटी की शक्ति का निश्चय हुआ । हे रामजी ! जैसी जैसी वासना संवित् में होती है उसके अनुसार ही अनुभव होता है । शुद्ध चिन्मात्र में जो चैत्योन्मुखत्व हुआ उसी का नाम जीव हुआ । उसमें जो ज्ञानरूप सत्ता है सोई पुरुष है और जो फुरना है सोई कर्म है । जैसे जैसे फुरता है तैसे ही तैसे भासता है । हे रामजी ! आत्मसत्ता में जो अहं हुआ है उसी का नाम चित्त है उससे जो जगत् रचा है वह भी अविचारसिद्ध है; विचार करने से नष्ट हो जाता है । जैसे अविचार से अपनी परछाहीं में भूत पिशाच कल्पता है और उससे भय उत्पन्न होता है पर विचार करने से पिशाच और भय दोनों नष्ट हो जाते हैं; तैसे ही हे रामजी ! आत्मविचार से चित्त और जगत् दोनों नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! ब्रह्म सत्ता सदा अपने आपमें स्थित है; उसमें चित्त कल्पना कोई नहीं और प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय भी ब्रह्म से भिन्न नहीं तो द्वैत की कल्पना कैसे हो ? जैसे शशे के शृङ्ग असत् हैं; तैसे आत्मा में द्वैतकल्पना असत्य है । हे रामजी ! यह ब्रह्माण्ड भावनामात्र है । जिसको सत्य भासता है उसको बन्धन का कारण है । जैसे घुरान अर्थात् कुशावारी अपना गृह अपने बन्धन का कारण बनाती है और उसमें फँस मरती है; तैसे ही जो जगत् को सत्य मानते हैं उनको अपना मानना ही बन्धन करता है और उससे जन्म मरण देखते हैं । जिसको जगत् का असत्य निश्चय हुआ है उसको बन्धन नहीं होता—उसको उल्लास है । हे रामजी ! अनुभवसत्ता सबका अपना आप है । उसमें जो जैसा निश्चय किया उसको अपने अनुभव के अनुसार पदार्थ भासते हैं । वास्तव में तो जगत् उपजा ही नहीं । जगत् का उपजना भी मिथ्या है; बढ़ना भी मिथ्या है; रस भी मिथ्या है और रस लेनेवाला भी मिथ्या है । शुद्धब्रह्म सर्वगत, नित्य और अद्वैत सदा