योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण ।
२८३
विचार किया कि उद्यम से सब कुछ प्राप्त होता है इससे पूर्व शरीर के निमित्त फिर एकान्त स्थान में जाकर तप करूँ । इतने में एक गीध पक्षी वहाँ आकर कुछ भोजन करने लगा कि उसके चोंच के मार्ग से विषूचिका भीतर चली गई । जब यह पक्षी कष्ट पाके उड़ा तो वह विषूचिका उसकी पुर्यष्टक से मिलके और उसको प्रेरके हिमालय पर्वत की ओर इस भाँति ले चली जैसे वायु मेघ को ले जाता है । उस गीध ने वहाँ पहुँचकर वमन करके विषूचिका को त्याग दिया है और आप सुखी होकर उड़ गया । तब उसी शरीर से विषूचिका वहाँ तप करने लगी । हे रामजी ! इस प्रकार इन्द्र ने सुनकर उसके देखने के निमित्त पवन चलाया । तब पवन आकाश छोड़के भूतल में उतरा और लोकालोक पर्वत स्वर्ण की पृथ्वी, समुद्रों और द्वीपों को लाँघके क्रम से हिमालय के वन में सूक्ष्म शरीर से आया और क्या देखा कि पवन चल रहा है और सूर्य तप रहे हैं परन्तु वह चलायमान नहीं होती और प्राणवायु का भी भोजन नहीं करती तब पवन ने भी आश्चर्यमान होके कहा, हे तपस्विनी ! तू किसलिए तप करती है ? पर विषूचिका तब भी न बोली । पवन ने फिर कहा, भगवती विषूचिका ने बड़ा तप किया है—अब इसको कोई कामना नहीं रही ऐसे पवन उड़ा और क्रम से इन्द्र के पास गया । इन्द्र विषूचिका के दर्शन के माहात्म्य से पवन को कण्ठ लगाय मिले और बड़ा आदर किया कि तू बड़े पुण्यवान् का दर्शन करके आया है । पवन ने भी सब वृत्तान्त कह सुनाया और कहा, हे राजन् ! उसके तप के तेज से हिमालय की शीतलता दब गई है । आप ब्रह्माजी के पास चलिये, नहीं तो उसके तप से सब जगत् जलेगा । तब इन्द्र पवन और देवतागणों सहित ब्रह्माजी के पास आये और प्रणाम करके बैठे । ब्रह्माजी ने कहा, तुम्हारी जो अभिलाषा है वह मैंने जानी । इस प्रकार इन्द्र से कहकर ब्रह्माजी विषूचिका के पास जिसका नाम सूची था आये और उसको देखके आश्चर्यमान हुए कि तृण की नाईं विषूचिका ने सुमेरु से भी अधिक धैर्य धारण किया है जैसे मध्याह्न का सूर्य तेजवान् होता है तैसे ही इसका तप से तेज हुआ है