भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 281

२८४ योगवाशिष्ठ ।

और परब्रह्म में स्थित हुई है। अब इसका जगत्भ्रम शान्त हो गया है इस से वन्दना करने योग्य है। हे रामजी ! फिर आकाश में स्थित होकर ब्रह्माजी ने कहा, हे पुत्री ! तू अब वर ले, तब विसूचिका विचारकर कहने लगी कि जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना और शान्तरूप हुई हूँ, सम्पूर्ण संशय मेरे नष्ट हुए अब वर से मुझे क्या प्रयोजन है ? यह जगत् अपने संकल्प से उपजा है। जैसे बालक को अपनी परछाहीं में बैताल बुद्धि होती है और उससे भय पाता है तैसे ही मैं स्वरूप के प्रमाद से भटकती फिरी। अब इष्ट अनिष्ट जगत् की मुझको कुछ इच्छा नहीं। अब मैं निर्विकार शान्ति में स्थित हूँ। हे रामजी ! ऐसे कहकर जब सूची तूष्णीम् हो रही तब वीतराग और प्रसन्नबुद्धि ब्रह्माजी उसके भाव को देखके कहने लगे, हे कर्कटी ! तू कुछ वर ले, क्योंकि कुछ काल तुझे भूतल में विचरना है। भोगों को भोगके तू विदेहमुक्त होगी। अब तू जीवन्मुक्त होकर विचरेगी। नीति के निश्चय को कोई नहीं लाँघ सकता। जब तू तप करने लगी थी तब पूर्व देह के पाने का संकल्प किया था। तेरा वह संकल्प अब सफल हुआ है। जैसे बीज में वृक्ष का सद्भाव होता है सो काल पाकर होता है तैसे ही तेरे में पूर्व शरीर का जो संकल्प था सो अब प्राप्त होवेगा अर्थात् वैसा ही शरीर पाके तू हिमालय के वन में विचरेगी। हे पुत्री ! तुझे तो अनिच्छित योग हुआ है। जैसे कोई छाया के निमित्त आम के वृक्ष के निकट आन बैठे और उसे छाया और फल दोनों प्राप्त हों तैसे ही तूने शरीर की वृद्धि के लिये यत्न किया था वह तुझे तृप्ति करनेवाला हुआ है और ब्रह्मतत्त्व भी प्राप्त हुआ। हे पुत्री ! राक्षसी शरीर में जीवन्मुक्त होके तू विचरेगी और दूसरा जन्म तुझको न होगा। इस जन्म में तू परम शान्त रहेगी और शरत्काल के आकाश की नाईं निर्मल होगी। जब तेरी वृत्ति बहिर्मुख फुरेगी तब सब जगत् तुझको आत्मरूप भासेगा; व्यवहार में समाधि रहेगी और समाधि में भी समाधि रहेगी। पापी जीवों को तू भोजन करेगी; न्यायबान्धव तेरा नाम होगा और विवेकपालक तेरी देह होगी। इससे पूर्व के शरीर को अंगीकार कर। इतना कह फिर वशिष्ठजी बोले, हे