भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 283

२८६ योगवाशिष्ठ।

रात्रि में श्याम राक्षसी और श्याम ही तमाल वृक्ष भी महाअन्धकार भासते थे—मानों कज्जल का मेघ स्थित है। ऐसी श्यामता में किराती देश के राजा मन्त्री और वीरों सहित यात्रा को निकले तो उनको आते देख राक्षसी ने विचारा कि मुझे भोजन मिला। यह मूढ़ अज्ञानी है और इनको देहाभिमान है; इन मूर्खों के जीने से न यह लोक न परलोक कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता। ऐसे जीवों का जीना दुःख के निमित्त है इसलिये इनको यत्न करके भी मारना योग्य है और इनका पालन अनर्थ के निमित्त है, क्योंकि यह पाप को उदय करते हैं। ब्रह्मा की आनि नीति है कि पापी मारने योग्य हैं और गुणवान् मारने योग्य नहीं। कदाचित् ये गुणवान् हों तो मैं इन्हें न मारूँगी। गुणवान् भी दो प्रकार के होते हैं। जो अमानी, अदम्भी, अहिंसक, शान्तिमान और पुण्यकर्म करनेवाले हैं वे भी गुणवान् हैं पर महागुणवान् तो ब्रह्मवेत्ता हैं जिनके जीने से बहुतों के कार्य सिद्ध होते हैं, इसलिये जो मेरा शरीर भोजन बिना नष्ट भी हो जावे तो भी मैं गुणवान् को न मारूँगी। जो उदार पुरुष है वह पृथ्वी का चन्द्रमा है; उसकी संवित् से स्वर्ग और मोक्ष होता है। जैसे संजीवनी बूटी से मृतक भी जीता है तैसे ही सन्तों के संग से अमृत होता है। इससे मैं प्रश्न करके इनकी परीक्षा लूँ; कदाचित् यह भी गुणवान् हों। यह कमलनयन ज्ञानवान् भासते हैं; यदि यथार्थ ज्ञानवान् पुरुष हैं तो पूजने योग्य हैं और जो मूर्ख हैं तो दण्ड देने योग्य हैं और मैं उनको अवश्य भोजन करूँगी।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणेराक्षसीविचारो नाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! तब वह राक्षसी उनको देखके मेघ की नाईं गरजने लगी और कहा; अरे आकाश के चन्द्रमा और सूर्य! तुम कौन हो? बुद्धिमान् हो अथवा दुर्बुद्धि हो? कहाँ से आये हो और तुम्हारा क्या आचार है? तुम तो मुझको ग्रास की नाईं आन प्राप्त हुए हो इससे अब मैं तुमको भोजन करूँगी। राजा बोले; अरी! इस भौतिक तुच्छ शरीर को पाकर तू कहाँ रहती है? हमको देखके जो तू गरजती