योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २८७
है सो तेरा शब्द हमको अमरी के शब्दवत् भासता है; हमको कुछ भय नहीं । हे राक्षसी ! यह तेरा शरीर मायामात्र है इसलिये इस तुच्छ स्वभाव को त्यागके जो कुछ तेरा अर्थ है वह कह हम पूर्ण कर देंगे । तब राक्षसी ने उनके डराने को ग्रीवा और भुजा को ऊँचे करके प्रलयकाल के मेघों की नाईं फिर शब्द किया कि जिसके नाद से पहाड़ भी चूर्ण हो जावें । निदान सब दिशाएँ शब्द से भर गई और वह बिजली की नाईं नेत्रों को चमकाने लगी । उसकी मूर्ति देख राक्षस और पिशाच भी शङ्कायमान हों पर ऐसे भयानक स्वरूप को देख के भी उन दोनों ने धीरज रखा । मन्त्री ने कहा, अरी राक्षसी ! ऐसे शब्द तू व्यर्थ करती है । इससे तो तेरा कुछ प्रयोजन न सिद्ध होगा इसलिये इस आरम्भ को त्यागके अपना अर्थ कह । बुद्धिमान् पुरुष उस अर्थ को ग्रहण करते हैं जो अपना विषयभूत होता है और जो अपना विषयभूत नहीं होता उसके निमित्त वे यत्न नहीं करते । हम तेरे विषयभूत नहीं तुझ ऐसे तो हजारों हमने मार डाले हैं । हे राक्षसी ! हमारे धैर्यरूपी पवन से तुझ ऐसी अनन्त मक्खियाँ तृणवत् उड़ती फिरती हैं । इससे अपने नीच स्वभाव को त्याग स्वस्थचित्त होके जो कुछ तेरा प्रयोजन हो सो कह । बुद्धिमान् स्वस्थचित्त होके व्यवहार करते हैं; स्वस्थ हुए बिना व्यवहार भी सिद्ध नहीं होता; यह आदि नीति है । हमारे पास से स्वप्न में भी कोई अर्थी व्यर्थ नहीं गया । हम सबका अर्थ पूर्ण करते हैं इसलिये तू भी हमसे अपना प्रयोजन कह दे । तब राक्षसी समझी कि यह कोई बड़े उदार आत्मा और उज्जवल आचारवान् हैं और जीवों के समान नहीं । यह बड़े प्रकाशमान और धैर्यवान् जान पड़ते हैं; उदारात्मा के से इनके वचन ज्ञानवानों से मिलते हैं अब मैंने इनको जाना है और इन्होंने मुझको जाना है इससे मुझसे इसका नाश भी न होगा । अविनाशी पुरुष ब्रह्मसत्ता में स्थित हैं इससे ज्ञानवान् हैं । ऐसा निश्चय ज्ञान बिना किसी को नहीं होता परन्तु कदाचित् अज्ञानी हो तो फिर सन्देह को अङ्गीकार करके पूछती हूँ। जो सन्देहवान् होकर बोधवान् से नहीं पूछते वे भी नीच बुद्धि हैं। हे रामजी ! ऐसे मन में विचार फिर उसने पूछा,