योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६० | योगवाशिष्ठ । |
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भव स्थित है और वह कौन अणु है जो अत्यन्त निस्स्वाद है और आप ही सब स्वाद होता है ? वह कौन अणु है जिसको अपने ढाँपने की सामर्थ्य नहीं और सबको ढाँप रहा है और वह कौन अणु है जिससे सब जीते हैं ? वह कौन अणु है जिसका अवयव कोई नहीं और सब अवयव को धारण कर रहा है ? वह कौन निमेष है जिसमें बहुतेरे कल्प स्थित हैं ? वह कौन अणु है जिसमें अनन्त जगत् स्थित है जैसे बीज में वृक्ष होता है ? वह कौन अणु है जिसमें बीज से आदि फल पर्यन्त अनउदय हुए भी भासते हैं ? वह कौन है जो प्रयोजन और कर्तृत्व से रहित है और प्रयोजनवान् और कर्तृत्ववान् की नाई स्थित है ? वह कौन द्रष्टा है जो दृश्य से मिलाकर दृश्य होता है और वह कौन है जो दृश्य के नष्ट हुए भी आपको अखण्ड देखता है ? वह कौन है जिसके जाने से द्रष्टा दर्शन-दृश्य तीनों लय हो जाते हैं, जैसे सोने के जाने से भूषणभाव लीन हो जाते हैं और वह कौन है जिससे भिन्न कुछ नहीं जैसे जल भिन्न तरंगों का अभाव है ? वह एक ही कौन है जो देश काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित सत् असत् की नाईं स्थित है और वह कौन अद्वैत है जिससे द्वैत भी भिन्न नहीं—जैसे समुद्र से तरंग भिन्न नहीं ? वह कौन है जिसके देखे सत्ता असत्ता सब लीन होती है और वह कौन है जिसमें अभ्ररूपी अनन्त जगत् स्थित है—जैसे बीज में वृक्ष होता है ? वह कौन है जो सबके भीतर है—जैसे वृक्ष में बीज होते हैं और वह कौन है जो सच्चा असत्तारूपी आप ही हुआ है—जैसे बीज वृक्षरूप है और वृक्ष बीजरूप है ? वह अणु कौन है जिसमें ताँत भी सुमेरु की नाईं स्थूल है और जिसके भीतर कोटि ब्रह्माण्ड हैं ? हे राजन् ! उस अणु को देखा हो तो कहो । यही मुझको संशय है इसको तुम अपने मुख से दूर करो । जिससे संशय निवृत्त न हो उसको पण्डित न कहना चाहिए । जो ज्ञानवान् हैं उनको इन प्रश्नों का उत्तर कहना सुगम है । इन संशयों को वह शीघ्र ही निवृत्त कर देते हैं । जो अज्ञानी हैं उनको उत्तर देना कठिन है । हे राजन् ! जो तुमने मेरे प्रश्नों का उत्तर दिया तो तुम मेरे पूजने योग्य हो और जो मूर्खता से प्रश्नों का