योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २६१
उत्तर न दोगे और प्रश्नों के विपर्यय जानोगे जो तुम दोनों को भोजन कर जाऊँगी और फिर तुम्हारी सब प्रजा को ग्रास कर लूँगी, क्योंकि मूर्ख पापियों का मारना श्रेष्ठ है कि आगे को पाप करने से छूटेंगे। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार राक्षसी कहकर और शुद्ध आशय को लेकर तूष्णीम हुई और जैसे शरत्काल में मेघ-मण्डल निर्मल होता है तैसे निर्मल हुई ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीप्रश्नवर्णनन्नाम-पञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अर्धरात्रि के समय महाशून्य वन में जब उस राक्षसी ने महाप्रश्न किये तब महामन्त्री ने उससे कहा, हे राक्षसी ! ये जो तुमने संशयप्रश्न किये हैं उनका मैं क्रम से उत्तर देता हूँ। जैसे उन्मत्त हाथी को केसरी सिंह नष्ट करता है तैसे मैं तेरे संशयों को निवृत्त करता हूँ। तूने सब प्रश्न परमात्मा ही के विषय किये हैं इससे तेरे सब प्रश्नों का एक ही प्रश्न है, परन्तु तूने अनेक प्रकार से किये हैं सो ब्रह्मवेत्ता के योग्य हैं। हे राक्षसी ! जो अनामारूप है अर्थात् सर्व इन्द्रियों का विषय नहीं और अगम है और मन की चिन्तना से रहित है ऐसी सत्ता चिन्मात्र है और उसका आकार भी सूक्ष्म है इस कारण सूक्ष्म कहाता है। सूक्ष्मता से ही उसकी अणु संज्ञा है। उस अणु में सब असत् की नाईं जगत् स्थित है और उसही चिद्अणु में जब कुछ संवेदन फुरता है वही संवेदन सत्य असत्य जगत् की नाईं भासता है इससे उसे चित्त कहते हैं। सृष्टि से पूर्व उसमें कुछ न था इससे निष्किञ्चन कहाता है। और इन्द्रियों का विषय नहीं इससे न किञ्चित् है। उसी चिद्अणु में सब का आत्मा है इससे वह अनन्त भोक्ता पुरुष किञ्चन है और उससे कुछ भिन्न नहीं, इससे किञ्चन नहीं। वही चिद्अणु सबका आत्मा है और एक ही आभास से अनेकरूप भासता है—जैसे सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण भासते हैं। वही चिद्अणु परमाकाशरूप है जो आकाश से भी सूक्ष्म और मन वाणी से अतीत है। सर्वात्मा है; शून्य कैसे हो ? सत् को जो शून्य कहते हैं वह उन्मत्त हैं, क्योंकि असत् भी सत् बिना सिद्ध नहीं