योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २६३
जलाने से रहित है । ज्ञान अग्नि से प्रकाशमान है; अग्नि भी उससे उपजी है और सर्वगता वही है । द्रव्यों को पचाता भी वही है; प्रलय में सब भूत उसमें ही लीन होते हैं और पुष्कल मेघ इकट्ठा हों तो भी उसको आवरण नहीं कर सकते । वह सदा प्रकाश और ज्ञानरूप है; आकाश से भी निर्मल है और अग्नि भी उससे उत्पन्न होती है । सबको सत्ता देनेवाला वही है और सूर्यादिक भी उसके प्रकाश से प्रकाशते हैं वह अनुभवरूप है और नेत्रों बिना भासता है । ऐसा हृदयरूपी मन्दिर का दीपक आत्मा अनन्त और परम प्रकाशरूप है और मन और इन्द्रियों का विषय नहीं । वह लता फूल, फल आदिक सबको आत्मतत्त्व से प्रकाशता है सबका अनुभवकर्त्ता वही है और काल, आकाश, क्रिया आदिक पदार्थों को सत्ता देनेवाला भी वही चिदणु है । सबका स्वामी कर्त्ता वही है; सबका पिता भोक्ता भी वही है; और सदा अकर्त्ता अभोक्तारूप है । जैसे स्वप्न में कर्त्ता भोक्ता भासता है पर अकर्त्ता अभोक्ता है; उससे भिन्न नहीं, इस कारण किञ्चनरूप है और जगत् को धारण करनेवाला है । स्वरूप से मातृ, मान, मेय जिससे प्रकाशते हैं और कुछ उपजा नहीं । चिदात्मा का किञ्चन है; किञ्चन से जगत् की नाईं भासता है । तूने जो पूछा था कि 'दूर और निकट कौन है' सो अलब्धभाव से दूर भी वही है और चिद्रूपभाव से निकट भी वही है अथवा ज्ञान से निकट है और अज्ञान से दूर से दूर है । अज्ञान से तपरूप है और ज्ञान से प्रकाशरूप भी वही है और उसही चिदणु में संवेदन से सुमेरु आदिक स्थित हैं । हे राक्षसी ! जो कुछ जगत् भासता है वह सब संवेदनरूप है । सुमेरु आदिक पदार्थ कुछ उपजे नहीं, चिद्सत्ता ज्यों की त्यों स्थित है; उसमें जैसा संवेदन फुरता है तैसा आकार हो भासता है । जहाँ निमेष का संवेदन फुरता है वहाँ निमेष कहाता है और जहाँ कल्प का संवेदन फुरता है वहाँ उसे कल्प कहते हैं । कल्प, क्रिया आदिक जगत्विलास सब निमेष में फुर आये हैं । जैसे मन के फुरने से बहुत योजनों पर्यन्त पुरुष देख आता है और जैसे छोटे शीशे में बड़े विस्तार नगर का प्रति-बिम्ब समा जाता है तैसे ही एक निमेष के फुरने में सब जगत् फुर आता