भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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२६४योगवाशिष्ठ ।

है। एक निमेष में कल्प, समुद्र, पुर इत्यादिक अनन्त योजनों-का विस्तार चिदणु में स्थित है और एक दो के क्रम से रहित है। हे राक्षसी ! इस जगत् का स्वरूप कुछ नहीं, संवेदन से भासता है; जैसा-जैसा संवेदन में दृढ़ प्रतीत होता है तैसा ही तैसा अनुभव होता है। देख, क्षण के स्वप्न में सत् असत् जगत् स्फुर आता है और बहुत काल का अनुभव होता है। जो दुःखी होते हैं उनको थोड़े काल में बहुत काल भासता और सुखी जनों को बहुत काल में थोड़ा काल भासता है। जैसे हरि-श्चन्द्र को एक रात्रि में द्वादश वर्ष का अनुभव हुआ था। इससे जितना जितना संवेदन दृढ़ होता है उतने देश काल हो भासते हैं और सत् भी असत् की नाईं भासता है जैसे सुवर्ण में भूषणबुद्धि होती है तो भूषण भासते हैं और समुद्र में तरङ्गों की दृढ़ता से तरङ्ग भिन्न भासते हैं; तैसे ही निमेष में कल्प भासते हैं पर वास्तव में न निमेष है; न कल्प है; न दूर है न निकट है, चिदणु आत्मा का सब आभास है। हे राक्षसी ! प्रकाश और तम; दूर और निकट सब चेतन सम्पुट में रत्नों की नाईं है और वास्तव में अनन्यरूप है, भेदाभेद कुछ नहीं। हे राक्षसी ! जब तक दृश्य का सद्भाव दृढ़ होता है तब तक द्रष्टा नहीं भासता—जैसे जब तक भूषणबुद्धि होती है तब तक सुवर्ण नहीं भासता और जब सुवर्ण जाना गया तब भूषणबुद्धि नहीं रहती सुवर्ण ही भासता है; तैसे ही जब तक दृश्य का स्पन्दभाव होता है तब तक द्रष्टा नहीं भासता और जब आत्मज्ञान होता है तब केवल ब्रह्मसत्ता ही निर्मल हो सरूप से सर्वत्र भासती है। दुर्लक्ष्यता अर्थात् मन और इन्द्रियों के अविषय से असतरूप कहते हैं; चैत्यता से उसको चेतन कहते हैं और चेत्य के अभाव से अचेतनरूप कहते हैं अर्थात् चेत्य के अभाव से अचेत्य चिन्मात्र कहते हैं। चेतन चमत्कार से जगत् की नांई हो भासता है। हे राक्षसी ! और जगत् उससे कोई नहीं—जैसे वायु का गोला वृत्ताकार हो भासता है और सघनरूप से मृगतृष्णा की नदी भासती है तैसे ही एक अद्वैत चेतन घन चैतन्यता से जगत् की नांई हो भासता है। जैसे सघन शून्यता से आकाश में नीलता भासती है तैसे ही दृढ़ सघन चेतनता से जगत्