योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २६५
भासता है । जैसे सूर्य की सूक्ष्म किरणों का किञ्चन मृगतृष्णा का जल होता है; उस नदी का प्रमाण कुछ नहीं तैसे ही इस जगत् की आस्था भासती है पर सब आकाशरूप है । जैसे अभ्र से धूलि के कण में स्वयं की नाईं चमत्कार होता है तैसे ही जगत्कल्पना चित्त के फुरने से भासती है । जैसे स्वप्नपुर और गन्धर्वनगर आकार सहित भासते हैं सो न सत् हैं न असत् हैं तैसे ही यह जगत् दीर्घ स्वप्न है; तो न सत् है और न असत् है । हे राक्षसी ! जब आत्मा में अभ्यास हो तब यह कुण्डादिक ऐसे ही रहें और आकाशरूप हो भासैं । कुण्डादिक भी आकाशरूप हैं; आकाश और कुण्डादिकों में भेद कुछ नहीं मूढ़ता से भेद भासता है । ज्ञानी को सब चिदाकाशरूप भासता है । हे राक्षसी ! ब्रह्मा से तृणपर्यन्त के संवेदन में जैसी कल्पना दृढ़ हो रही है तैसे ही भासती है और वास्तव में वही चिदाकाश प्रकाशता है । घन चेतनता से वही चिदाकाश आकारों की नाईं प्रकाशता है और उसी का यह प्रकाश है । जैसे बीज और वृक्ष अनन्यरूप हैं तैसे ही असंख्यरूप जगत् जो ब्रह्मसत्ता में स्थित है वह अनन्यरूप है । जैसे बीज में वृक्ष का भाव स्थित है सो आकाशरूप है तैसे ही ब्रह्म में जगत् स्थित है सो अछोभरूप है—अन्यभाव को नहीं प्राप्त हुए । ब्रह्मसत्ता सब ओर से शान्तरूप, अज, एक, और आदि-मध्य-अन्त से रहित है । उसमें एक और द्वैत की कल्पना नहीं । वह अनउदय ही उदय हुआ है और निर्मल स्वप्रकाश आत्मा है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीप्रश्नभेदो नाम षट्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५६ ॥
वशिष्ठजी बोले, बड़ा आश्चर्य है कि मन्त्री ने तो यह परमपावन परमार्थ वचन कहे और कमलनयन राजा ने भी कहा, हे राक्षसी ! यह जो जाग्रत् जगत् की प्रतीति होती है इसका जब अभाव हो तब आत्मा प्रतीति होती है । जब सब संकल्प की चैत्यता का नाश हो तब आत्मा का साक्षात्कार हो । उस आत्मसत्ता में संवेदन फुरने से जगत् भासता है और संवेदन के संकोच से सृष्टि का प्रलय होता है । सबका अधिष्ठान-रूप वही आत्मसत्ता है तिसको वेदान्तवाक्य जतावने के अर्थ कुछ कहते