योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३०७
उसकी कोई सेवा करता है तैसा फल उसको वह देती है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सूच्याख्यानसमाप्तिवर्णनन्नामैकोनषष्टितमस्सर्गः ॥५६॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह आनन्दित कर्कटी का आख्यान जैसे पूर्व हुआ है वैसे ही मैंने तुमसे कहा है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! राक्षसी का कृष्णवपु किस निमित्त था और कर्कटी इसका नाम क्यों था ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह राक्षसों के कुल की कन्या थी राक्षसों का वपु शुक्ल भी होता है; कृष्ण भी होता है और रक्त पीत आदि भी होता है। हे रामजी ! कर्कटी नाम एक जलजन्तु भी होता है और उसका श्याम आकार होता है; उसी के समान कर्कट नाम एक राक्षस था उसके समान उसकी यह पुत्री हुई; इस कारण इसका नाम कर्कटी हुआ । हे रामजी ! यहाँ कर्कटी का और कुछ प्रयोजन न था; अध्यात्मप्रसंग और शुद्ध चेतन के निरूपण के निमित्त मैंने तुमसे यह आख्यान कहा है । यह आश्चर्य है कि असतरूप जगत् के पदार्थ सतरूप होकर भासते हैं और जो आत्मसत्ता सदा सम्पन्नरूप है वह अविद्यमान की नाईं भासती है । हे रामजी ! वास्तव में तो एक अनादि, अनन्त और परम कारण आत्मसत्ता स्थित है; भावना के वश से उसमें जगत्रूप भासता है और अनन्यरूप है । जैसे जल और तरङ्ग में कुछ भिन्नता नहीं होती तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भिन्नता नहीं । आत्मा में जगत् कुछ द्वैतरूप नहीं हुआ; आत्मसत्ता सदा अपने आपही में स्थित है और उसमें जैसा-जैसा चित्तस्पन्द दृढ़ होता है तैसा ही तैसा रूप होकर भासता है जैसे वानर रेत को इकट्ठा करके उसमें अग्नि की भावना करते हैं और तापते हैं तो उनका शीत उसी से निवृत्त होता है तैसे ही सम, स्थित और शान्तरूप आत्मा में जब जगत् की भावना फुरती है तब नाना प्रकार का भासता है । जैसे थम्भे में पुतलियाँ अनउदय ही शिल्पी के मन में उदय की नाईं भासती हैं तैसे ही भावना के वश से आत्मा ही जगत् हो भासता है । जैसे बीज में पत्र, फूल, टहनी और वृक्ष अनन्यरूप होते हैं वैसे ही ब्रह्म में जगत् अनन्यरूप है । जैसे और वृक्ष में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और जगत्