भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 304

३०= योगवाशिष्ठ ।

में कुछ भेद नहीं; अविचार से भेद भासता है और विचार किये से जगत् भेद नष्ट हो जाता है। हे रामजी! अब यह विचार न करना कि कैसे उपजा है, कहाँ से आया है और कब का हुआ है। जैसे हुआ तैसे हुआ, अब इसकी निवृत्ति का उपाय करना चाहिये। जब तुम यह जानोगे तब हृदय की चिदजड़ ग्रन्थि टूट जावेगी। शब्द और अर्थ की जो कुछ कल्पना उठती है सो मेरे वचनों और स्वरूप में स्थित भये से नष्ट हो जावेगी। हे रामजी! यह सब जगत् अनर्थ चित्त से उपजा है और मेरे वचनों के सुनने से शान्त हो जावेगा। इसमें संशय नहीं कि सब जगत् ब्रह्म से उपजा है और सब ब्रह्मस्वरूप ही है पर जब तुम ज्ञान में जागीगे तब ज्यों का त्यों ही जानोगे। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो जिससे होता है वह उससे व्यतिरेक होता है; जैसे कुलाल से घट भिन्नरूप होता है; तो आप कैसे कहते कि सब जगत् ब्रह्म से उपजा है और ब्रह्मस्वरूप ही है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह जगत् ब्रह्म से ही उपजा है। जितने कुछ प्रतियोगी शब्द शास्त्रों ने कहे हैं सो दृश्य में हैं। शास्त्र ने उपदेश जताने के निमित्त कहे हैं, वास्तव में यह शब्द कोई नहीं। जैसे किसी बालक को परछाहीं में वैताल भासता है तो पूछते हैं कि किस' भाग में स्थित होकर वैताल ने भय दिया है और वह कहता है कि अमुक ठौर में वैताल ने भय दिया है सो वह व्यवहार के निमित्त कहता है, पर वैताल तो वहाँ कोई भी न था, तैसे ही आत्मा में उपदेश के निमित्त भेदकल्पना करी है वास्तव में द्वैतकल्पना कोई नहीं। हे रामजी! ब्रह्म जगत् हुआ है यह अर्थ केवल व्यतिरेक में नहीं होता। कुलाल जो दण्ड से घट उपजाता है सो व्यतिरेक के अर्थ हैं। स्वामी का टहलुआ यह भिन्न के अर्थ है और ये अभिन्नरूप भी होते हैं। जैसे अवयवी के अवयव हैं; सुवर्ण से भूषण हुए हैं और मृत्तिका से घट हुए हैं तैसे ही अभिन्न और अवयवी का स्वरूप है। जैसे भूषण स्वर्णरूप है, घट मृत्तिकारूप है तैसे ही ब्रह्म से उपजा जगत् ब्रह्म-रूप ही है। वास्तव में भिन्न-अभिन्न, कारण-परिणाम, भाव-विकार अविद्या और विद्या, सुख-दुख आदिक मिथ्याकल्पना अज्ञान से उठती