भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 305

उत्पत्ति प्रकरण । ३०६

है । हे रामजी ! अबोध से भेदकल्पना होती है और ज्ञान से सब कल्पना शान्त हो जाती हैं । केवल अशब्दपद शेष रहता है । जब तुम ज्ञान-योग होगे तब ऐसे जानोगे कि आदि-मध्य-अन्त से रहित; अविभाग और अखण्डरूप एक आत्मसत्ता ज्यों की त्यों स्थित है । अज्ञान से अथवा जिज्ञासु को उपदेश के निमित्त द्वैतवाद कल्पना है; बोध होने से द्वैत भेद कुछ नहीं रहता । हे रामजी ! वाच्यवाचकभाव द्वैत बिना सिद्ध नहीं होता । जब बोध होता है तब वाच्य का मौन होता है । इसमें महावाक्य के अर्थ में निष्ठा करो और जो कुछ भेद कल्पना मन ने रची है उसकी निवृत्त के अर्थ मेरे वचन सुनो । हे रामजी ! यह मन ऐसे उपजा है जैसे गन्धर्वनगर होता है और उसी ने जगत् की रचना की है । मैंने जैसे देखा है तैसे तुमसे दृष्टान्त में कहता हूँ; जिसके जाने से सब जगत् तुमको भ्रान्तिमात्र भासेगा । वह निश्चय धारण करके तुम जगत् की वासना दूर से त्याग दोगे और बोध से सब जगत् तुमको मन का मनरूप भासेगा । तब तुम आत्मरूप होकर अपने आप में निवास करोगे अर्थात् जगत् की कल्पना त्याग करके अपने स्वभावसत्ता में स्थित होंगे । इसलिये इसको सावधान होकर सुनो । हे रामजी ! यह मनरूपी बड़ा रोग है इसलिये विवेकरूपी ओषधि से उसको शान्त करना चाहिए। सब जगत् चित्त की कल्पना है । वास्तव में वह शरीर आदिक कुछ नहीं जैसे रेत से तेल नहीं निकलता; तैसे ही जगत् से वास्तव में कुछ नहीं निकलता-चित्त द्वारा भासता है । वह चित्तरूपी संसार स्वप्न की नाईं है और रागद्वेष आदिक सङ्कल्पों से युक्त है । जो उससे रहित होता है वही संसार समुद्र के पार जाता है । इसलिये शुभ गुणों से चित्त की शुद्धि करो । जो विवेकी हैं वे शुभकार्य करते हैं अशुभ नहीं करते हैं और आहार व्यवहार भी विचार के करते हैं । उन्हीं आर्यों की नाईं तुम भी शास्त्रों के अनुसार चेष्टा करो । जब तुमको ऐसा अभ्यास होगा तब तुम शीघ्र ही ज्ञानवान् होगे और ज्ञान के प्राप्त होने से सब कल्पना मिट जावेगी और आत्म-स्थित होगी । चित्त ने सब जगत्रूपी चित्र मन ही मन रचे हैं । जैसे मोर का अण्डा काल पाकर अनेक रङ्ग धारण करता है तैसे ही मन