भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 306

३१० योगवाशिष्ठ ।

अनेक प्रकार के जगत् धारण करता है वह मन जड़ और अजड़रूप है उसमें जो चेतनभाग है वह सब अर्थों का बीजरूप है अर्थात् सबका उपादान है और जड़ भाग जगतरूप है । हेरामजी ! सर्ग के आदि में पृथ्वी आदिक तत्त्व न थे । जैसे स्वप्न में जगत् विद्यमान की नाईं भासता है तैसे ही ब्रह्मा ने विद्यमान की नाईं उसको देखा । जड़संवेदन से पहाड़ आदिक जगत् देखा और चेतनसंवेदन से जङ्गमरूप देखा । वह सब जगत् दीर्घ वेदना है । वास्तव में देहादिक सब शून्यरूप हैं और आत्मा में व्यापे हुए हैं । आत्मा का कोई शरीर नहीं । अपने से जो दृश्यरूप मन चेता है वही आत्मा का शरीर है । वह आत्मा विस्तरण रूप है और निर्मल स्थित है और मन उसका आभासरूप है । जैसे सूर्य की किरणों से जलाभास होता है तैसे ही आत्मा का आभास मन है । यह मनरूपी बालक अज्ञान से जगतरूपी पिशाच को देखता है और ज्ञान से परमात्मपद शान्तरूप निरामय को देखता है। हे रामजी ! जब आत्मा चैत्यता को प्राप्त होती है तब वही चित्तरूप दृश्य एक ब्रह्म का द्वैत देखता है । उसकी निवृत्ति के लिए मैं तुमसे एक कथा कहता हूँ । गुरु के वचन जो दृष्टान्त सहित होते हैं और वाणी भी मधुर और स्पष्ट होती है तो श्रोता के हृदय में वह अक्षर जैसे जल में तेल की बूँद फैल जाती है तैसे ही फैल जाते हैं और जो दृष्टान्त से रहित होते और अर्थ स्पष्ट नहीं होता तो वह क्षोभसंयुक्त वचन कहाता है और अक्षर पूर्ण नहीं होते; इसलिये वे वचन श्रोता के हृदय में नहीं ठहरते और उपदेष्टा के वचन निष्फल हो जाते हैं । मैं तुमसे एक आख्यान नाना प्रकार के दृष्टान्तों सहित; मधुर वाणी में स्पष्ट करके कहता हूँ। जैसे चन्द्रमा की किरणें अपने गृह पर उदय हों और मन्दिर शीतल हो जावे तैसे ही मेरे स्पष्ट वचन और प्रकाशरूप अर्थ सुनने से तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जावेगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मनअंकुरोत्पत्तियकननाम- षष्टितमस्सर्गः ॥ ६० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पूर्व जो मुझसे ब्रह्माजी ने सर्ग का वृत्तान्त कहा है वह मैं तुमसे कहता हूँ। एक समय मैंने ब्रह्माजी के पास जाकर

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