योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३११
पूछा कि हे भगवन् ! ये जगत् गण कहाँ से आये और कैसे उत्पन्न हुए तब पितामहजी ने मुझसे इन्दु ब्राह्मण का आख्यान इस भाँति कहा । वे बोले हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् मन से उपजा है और मन से ही भासता है । जैसे जल में द्रवता के कारण नाना प्रकार के तरंग और चक्र फुरते हैं तैसे ही मन के फुरने से सब जगत् फुरते हैं और मनरूप ही हैं। हे मुनीश्वर ! पूर्व कल्प में मैंने एक वृत्तान्त देखा है उसे सुनो । एक समय जब दिन का क्षय हुआ तब में सम्पूर्ण सृष्टि को संहार एकाग्रभाव हो रात्रि को स्वस्वभाव होकर रहा । जब मेरी रात्रि व्यतीत हुई और मैं जागा तब मैंने उठकर विधिसंयुक्त सन्ध्यादिक कर्म किये और बड़े आकाश की ओर देखा कि तम और प्रकाश से रहित; शून्यरूप और इतर से रहित व्यापित है । चिदाकाश में चित्त को मिला के जब मैंने सर्ग के उपजाने का संकल्प चित्त में धारण किया तब मुझको शुद्ध सूक्ष्म चिदाकाश में सृष्टि दृष्टि आई । वह सृष्टि मुझे बड़े विस्तार सहित और परस्पर अदृष्टरूप दृष्टि आई है और हर सृष्टि में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—तीनों देवता भी थे । देवता गन्धर्व किन्नर और मनुष्य, सुमेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय आदिक पर्वत पृथ्वी, नदियाँ, सातों समुद्रादिक सब सृष्टि के विस्तार हैं । वे दश सृष्टि हैं उनमें जो दश ब्रह्मा देखे वे मानों मेरे ही प्रतिबिम्ब कमल से उत्पन्न हुए हैं और राजहंस के ऊपर आरूढ़ हैं। उनकी भिन्न भिन्न सृष्टि है । उनमें नदी के बड़े प्रवाह चलते हैं; वायु आकाश में चलता है; सूर्य और चन्द्रमा उदय होते हैं देवता स्वर्ग में क्रीड़ा करते हैं, मनुष्य पृथ्वी में फिरते हैं । दैत्य और नाग पाताल में भोग भोगते हैं और कालचक्र फिरता है बारह मास उसकी बारह कीलें हैं और बसन्तादिक षट्ऋतु हैं । वासना के अनुसार शुभाशुभ आचार करके लोग नरक स्वर्ग भोगते हैं और मोक्ष फल पाते हैं । हर सृष्टि में सप्तद्वीप हैं; उत्पत्ति और प्रलय कल्प होते हैं और गङ्गाजी का प्रवाह जगत् के गले में यज्ञोपवीत है । कहीं ऐसे सृष्टि स्थित हैं, कहीं सदा प्रकाश रहता है और कहीं अहंकार से स्थावर जङ्गम प्रजा हैं । बिजली की नाईं सृष्टि उपजती और मिट जाती है । जैसे वृक्ष के पत्र उपजते हैं और नष्ट हो जाते हैं वैसे ही और गन्धर्व-