योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१२ योगवाशिष्ठ ।
नगरवत् सृष्टि देखी। एक एक ब्रह्माण्ड में स्थावर जङ्गम ऐसी प्रजा देखी जैसे गूलर के फल में अनेक मच्छर होते हैं। आत्मा में काल का भी अभाव है। क्षण, लव, दिन, मास और वर्षों का प्रवाह चला जाता है। हे मुनीश्वर ! अन्तर्वाहक दृष्टि से मैंने उन सृष्टियों को देखा जब में चर्मदृष्टि से देखूँ तब कुछ न भासे और दिव्यदृष्टि से देखूँ तो सब कुछ भासे। चिरकाल पर्यन्त में यह चरित्र देखता रहा कि कदाचित् चित्तभ्रम हो तो स्पष्ट भासे। तब एक सृष्टि के सूर्य को देखके मैंने आवाहन किया और जब वह मेरे निकट आया तो मैंने उससे कहा; हे देवदेवेश, भास्कर ! तुम कुशल से तो हो ? ऐसे कहकर मैंने फिर कहा कि हे सूर्य ! तुम कौन हो और यह सृष्टि कहाँ से उपजी है ? यह एक जगत् है व ऐसे अनेक जगत् हैं; जैसे तुम जानते हो कहो ? तब वह सूर्य भी जो त्रिकाल-ज्ञान रखता था मुझको जान के प्रणामकर आनन्दित वाणी से बोला, हे ईश्वर ! इस दृश्यरूपी पिशाच के आप ही नित्य कारण होते हैं। आप तो सब जानते ही हैं तो मुझसे क्यों पूछते है। यदि लीला के अर्थ पूछते हो तो जैसे हुआ है तैसे में आपके सम्मुख निवेदन करता हूँ। हे भगवन् ! यह जो सत् असत् रूपी नाना प्रकार के व्यवहारों संयुक्त जगत् भासता है वह सब मन के फुरने में स्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे आदित्यासमागमन्नामैक षष्टितमस्सर्गः ॥ ६१ ॥
भानु बोले, हे भगवन् ! आपका जो कल्प का दिन व्यतीत भया है उसमें जो जम्बूद्वीप था उसके एक कोने में कैलाश पर्वत था और उसकी कन्दरा में सुवर्णज्येष्ठ नाम आपका एक पुत्र रहता था। उसने वहाँ एक कुटी रची जिसमें साधुजन निवास करते थे। इन्दुनाम ब्राह्मण वेदवेत्ता शान्तरूप ने कश्यप ऋषि के कुल में उत्पन्न हो स्त्री सहित उस कुटी में जाके निवास किया और उस स्त्री से प्राणों की नाईं स्नेह करता था। जैसे मरुस्थल में घास नहीं उपजती तैसे ही उससे सन्तान न उपजे। ओर जैसे शरदकाल की बेलि बहुत सुन्दर होती है परन्तु फल से शून्य होती है तैसे ही वह स्त्री थी। तब दोनों पुरुष पुत्र के निमित्त कैलाश