भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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३३४ | योगवासिष्ठ ।

उससे जब संकल्प जाल उठता है तब उसको जीव कहते हैं, मन भी इसी का नाम है, चित्त भी इसी का नाम है और बन्ध भी इसी का नाम है। हे रामजी ! परमार्थ शुद्ध चित्त ही चेत्य के संयोग से और स्वरूप से वरफ की नाईं स्थित हुआ है। रामजी बोले, हे भगवन् ! यह मन जड़ है किंवा चेतन है, एक स्पष्ट मुझसे कहिये कि मेरे हृदय में स्थित हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मन जड़ नहीं और चेतन भी नहीं, जड़ चेतन की गाँठ के अन्धाभाव का नाम मन है और संकल्प विकल्प में कल्पित रूप मन है। उस मन से यह जगत् उत्पन्न हुआ है और जड़ और चेतन दोनों भावों में डोलायमान है अर्थात् कभी जड़भाव की ओर आता है और कभी चेतनभाव की ओर आता है। शुद्ध चेतनमात्र में जो फुरना हुआ उसी का नाम मन है और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, जीवादिक अनेक संज्ञा उसी मन की हैं। जैसे एक नट अनेक स्वांगों में अनेक संज्ञा पाता है—जिसका स्वांग धरता है उसी नाम से कहाता है तैसे ही संकल्प से मन अनेक संज्ञा पाता है। जैसे पुरुष विचित्र कर्मों से अनेक संज्ञा पाता है—पाठ से पाठक; और रसोई से रसोइयाँ कहाता है तैसे ही मन अनेक संकल्पों से अनेक संज्ञा पाता है। हे रामजी ! ये जो मैंने तुमसे चित्त की अनेक संज्ञा कही हैं उनके अन्य अन्य बहुत प्रकार वादियों ने नाम रक्खे हैं, जैसा जैसा मन है वैसा ही वैसा स्वभाव लेकर मन, बुद्धि और इन्द्रियों को मानते हैं। कोई मन को जड़ मानते हैं; कोई मन से भिन्न मानते हैं और कोई अहंकार को भिन्न मानते हैं वे सब मिथ्या कल्पना हैं। नैयायिक कहते हैं कि सृष्टि तत्त्वों के सूक्ष्म परमाणुओं से उपजती है जब प्रलय होता है तब स्थूलतत्त्व प्रलय हो जाते हैं और उनके सूक्ष्म परमाणु रहते हैं और फिर उत्पत्तिकाल में वही सूक्ष्म परमाणु दूने तिगुने आदिक होकर स्थूल होते हैं; उन्हीं पाँचों तत्त्वों से सृष्टि होती है। सांख्यमतवाले कहते हैं कि प्रकृति और माया के परिणाम से सृष्टि होती है और चार्वाक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, चारों तत्त्वों के इकट्ठे होने से सृष्टि उपजती मानते हैं और चारों तत्त्वों के शरीर को पुरुष मानते हैं और कहते हैं कि जब तत्त्व अपने आपसे बिछुड़ जाते हैं