योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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उससे जब संकल्प जाल उठता है तब उसको जीव कहते हैं, मन भी इसी का नाम है, चित्त भी इसी का नाम है और बन्ध भी इसी का नाम है। हे रामजी ! परमार्थ शुद्ध चित्त ही चेत्य के संयोग से और स्वरूप से वरफ की नाईं स्थित हुआ है। रामजी बोले, हे भगवन् ! यह मन जड़ है किंवा चेतन है, एक स्पष्ट मुझसे कहिये कि मेरे हृदय में स्थित हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मन जड़ नहीं और चेतन भी नहीं, जड़ चेतन की गाँठ के अन्धाभाव का नाम मन है और संकल्प विकल्प में कल्पित रूप मन है। उस मन से यह जगत् उत्पन्न हुआ है और जड़ और चेतन दोनों भावों में डोलायमान है अर्थात् कभी जड़भाव की ओर आता है और कभी चेतनभाव की ओर आता है। शुद्ध चेतनमात्र में जो फुरना हुआ उसी का नाम मन है और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, जीवादिक अनेक संज्ञा उसी मन की हैं। जैसे एक नट अनेक स्वांगों में अनेक संज्ञा पाता है—जिसका स्वांग धरता है उसी नाम से कहाता है तैसे ही संकल्प से मन अनेक संज्ञा पाता है। जैसे पुरुष विचित्र कर्मों से अनेक संज्ञा पाता है—पाठ से पाठक; और रसोई से रसोइयाँ कहाता है तैसे ही मन अनेक संकल्पों से अनेक संज्ञा पाता है। हे रामजी ! ये जो मैंने तुमसे चित्त की अनेक संज्ञा कही हैं उनके अन्य अन्य बहुत प्रकार वादियों ने नाम रक्खे हैं, जैसा जैसा मन है वैसा ही वैसा स्वभाव लेकर मन, बुद्धि और इन्द्रियों को मानते हैं। कोई मन को जड़ मानते हैं; कोई मन से भिन्न मानते हैं और कोई अहंकार को भिन्न मानते हैं वे सब मिथ्या कल्पना हैं। नैयायिक कहते हैं कि सृष्टि तत्त्वों के सूक्ष्म परमाणुओं से उपजती है जब प्रलय होता है तब स्थूलतत्त्व प्रलय हो जाते हैं और उनके सूक्ष्म परमाणु रहते हैं और फिर उत्पत्तिकाल में वही सूक्ष्म परमाणु दूने तिगुने आदिक होकर स्थूल होते हैं; उन्हीं पाँचों तत्त्वों से सृष्टि होती है। सांख्यमतवाले कहते हैं कि प्रकृति और माया के परिणाम से सृष्टि होती है और चार्वाक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, चारों तत्त्वों के इकट्ठे होने से सृष्टि उपजती मानते हैं और चारों तत्त्वों के शरीर को पुरुष मानते हैं और कहते हैं कि जब तत्त्व अपने आपसे बिछुड़ जाते हैं
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तब प्रलय होती है। आर्हत और ही प्रकार मानते हैं और बौद्ध और वैशेषिक आदि और प्रकार से मानते हैं। पञ्चरात्रिक और प्रकार ही मानते हैं, परन्तु सबही का सिद्धान्त एकही ब्रह्म आत्मतत्त्व है। जैसे एकही स्थान के अनेक मार्ग हों तो उन अनेक मार्गों से उसी स्थान को पहुँचता है तैसे ही अनेक मतों का अधिष्ठान आत्मसत्ता है और सबका सिद्धान्त एकही है, उसमें कोई वाद प्रवेश नहीं करता। हे रामजी ! जितने मतवाले हैं वे अपने-अपने मत को मानते हैं और दूसरे का अपमान करते हैं। जैसे मार्ग के चलनेवाले अपने-अपने मार्ग की उपमा करते हैं—दूसरे की नहीं करते तैसे ही मन के भिन्न रूप से अनेक प्रकार जगत् को कहते हैं। एक मन की अनेक संज्ञाएँ हुई हैं। जैसे एक पुरुष को अनेक प्रकार से कहते हैं, स्नान करने से स्नानकर्त्ता, दान करने से दानकर्त्ता, तप करने से तपस्वी इत्यादि क्रिया करके अनेक संज्ञाएँ होती हैं अनेक शक्ति मन की कही हैं। मन ही का नाम जीव, वासना और कर्म है। हे रामजी ! चित्त ही के फुरने से सम्पूर्ण जगत् हुआ है और मन ही के फुरने से भासता है। जब वह पुरुष चेत्य के फुरने से रहित होता है तब देखता है तो भी कुछ नहीं देखता। यह प्रसिद्ध जानिये कि जिस पुरुष को इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इष्ट अनिष्ट में हर्ष शोक देता है उसका नाम जीव है। मन ही से सब सिद्ध होता है और सब अर्थों का कारण मन ही है। जो पुरुष चेत्य से छूटता है वह मुक्तरूप है और जिसको चेत्य का संयोग है वह बन्धन में बँधा है। हे रामजी ! पुरुष मन को केवल जड़ मानते हैं उनको अत्यन्त जड़ जनों और जो पुरुष मन को केवल चेतन मानते हैं वे भी जड़ हैं। यह मन केवल जड़ नहीं और न केवल चेतन ही है जो मन का एक ही रूप हो तो सुख दुःख आदिक विचित्रता न हों और जगत् की लीनता भी नहीं। जो केवल चैतन्य ही रूप हो तो जगत् का कारण नहीं हो सकता और जो केवल जड़रूप हो तो भी जगत् का कारण नहीं, क्योंकि केवल जड़ पाषाणरूप होता। जैसे पाषाण से कुछ क्रिया उत्पन्न नहीं होती तैसे ही केवल जड़ मन जगत् कारण नहीं
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होना। उन केवल चैतन्य भी नहीं, केवल चैतन्य तो आत्मा है जिसमें कर्त्तृत्व आदि कल्पना नहीं होती इससे मन केवल चैतन्य भी नहीं और केवल जड़ भी नहीं चैतन्य और जड़ का मध्यभाव ही जगत् का कारण है। हे रामजी ! जैसे प्रकाश सब पदार्थों के प्रकाश का कारण है तैसे ही मन सब अर्थों का कारण है। जब तक चित्त है तब तक चेत्य भामता है और जब चित्त अचित्त होता है तब सर्व भूतजात लीन हो जाते हैं। जैसे एक ही जल रस से अनेकरूप हो भामता है तैसे ही एक ही मन अनेक पदार्थरूप होकर भामता है और अनेक संज्ञा इसकी शास्त्रों के मतवालों ने कल्पी हैं। सबका कारण मन ही है और परम देव परमात्मा की सर्व शक्तियों में से एक शक्ति है। उसी परमात्मा से यह फुरी है और जड़भाव फुरकर फिर उसही में लीन होती है। जैसे मकड़ी अपने मुख से जाला निकालकर फैलाती है और फिर आपही में लीन कर लेती है तैसे ही परमात्मा से यह जड़भाव उपजा है। हे रामजी ! नित्य शुद्ध और बोधरूप ब्रह्म है; वह जब प्रकृतभाव को प्राप्त होता है तब अविद्या के वश से नाना प्रकार के जगत् को धारता है और उसही के सर्व पर्याय हैं। जीव, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार इत्यादिक संज्ञा मलीन चित्त की होती हैं। ये संज्ञाएँ भिन्न-भिन्न मतवादियों ने कल्पी हैं पर हमको संज्ञा से क्या प्रयोजन है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मनःसंज्ञाविचारोनाम द्विसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७२ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह सब जगत् आडम्बर मन ही ने रचा है और सब मनरूप है और मन ही कर्मरूप है—यह आपके कहने से मैंने निश्चय किया है, परन्तु इसका अनुभव कैसे हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह मन भावनामात्र है। जैसे प्रचण्ड सूर्य की धूप मरुस्थल में जल हो भासती है तैसे ही आत्मा का आभासरूप मन होता है। उस मन से जो कुछ जगत् भासता है वह सब मनरूप है; कहीं मनुष्य, कहीं देवता, कहीं दैत्य, कहीं पक्षी, कहीं गन्धर्व, कहीं नागपुर आदिक जो कुछ रूप भासते हैं वे सबही मन से विस्तार को प्राप्त हुए हैं, पर वे
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तृण और काष्ठ के तुल्य हैं। उनके विचारने से क्या है ? यह सब मन की रचना है और मन अविचार से सिद्ध है, विचार करने से नष्ट हो जाता है। मन के नष्ट हुए परमात्मा ही शेष रहता है जो सबका साक्षी भूत सर्व से अतीत; सर्वव्यापी और सबका आश्रयभूत है। उसके प्रमाद से मन जगत् को रच सकता है इस कारण कहा है कि मन और कर्म एकरूप हैं और शरीरों के कारण हैं। हे रामजी ! जन्म मरण आदि जो कुछ विकार हैं वे मन से ही भासते हैं और मन अविचार से सिद्ध है विचार किये से लीन हो जाता है। जब मन लीन होता है तब कर्म आदि भ्रम भी नष्ट हो जाते हैं। जो इस भ्रम से छूटा है वही मुक्त है और वह पुरुष फिर जन्म और मरण में नहीं आता, उसका सब भ्रम नष्ट हो जाता है। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने सात्त्विकी, राजसी और तामसी तीन प्रकार के जीव कहे हैं और उनका प्रथम कारण सत्य असत्यरूपी मन कहा था, वह मन अशुद्धरूप शुद्ध चिन्मात्र तत्त्व से उपजकर बड़े विस्ताररूपी विचित्र जगत् को कैसे प्राप्त हुआ ? वशिष्ठजी बोले; हे रामजी ! आकाश तीन हैं एक चिदाकाश; दूसरा चित्ताकाश, और तीसरा भूताकाश । भाव से वे समानरूप हैं और आप अपनी सत्ता है। जो चित्ताकाश से नित्य उपलब्धरूप और चेतनमात्र सबके भीतर बाहर स्थित हैं, अनुमाता, बोधरूप और सर्वभूतों में सम व्याप रहा है वह चिदाकाश है। जो सर्वभूतों का कारणरूप है और आप विकल्परूप है और सब जगत् को जिसने विस्तारा है वह चित्ताकाश कहाता है। दश दिशाओं को विस्तारकर जिसका वपु प्रच्छेद को नहीं प्राप्त होता शून्य-स्वरूप है और पवन आदिक भूतों में आश्रयभूत है वह भूताकाश कहाता है। हे रामजी ! चित्ताकाश और भूताकाश दोनों चिदाकाश से उपजे हैं और सबके कारण हैं। जैसे दिन से सब कार्य होते हैं तैसे ही चित्त से सब पदार्थ प्रकट होते हैं। वह चित्त जड़ भी नहीं, और चैतन्य भी नहीं आकाश भी उसी से उपजता है। हे रामजी ! ये तीनों आकाश भी अप्र-बोधक के विषय हैं ज्ञानी के विषय नहीं। ज्ञानवान् तीन आकाश अज्ञानी के उपदेश के निमित्त कहते हैं। ज्ञानवान् को एक परब्रह्म पूर्ण सर्व-
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कल्पना से रहित भासता है । द्वैत, अद्वैत और शब्द भी उपदेश के निमित्त हैं प्रबोध का विषय कोई नहीं । हे रामजी ! जब तक तुम प्रबोध आत्मा नहीं हुए तब तक में तीन आकाश कहता हूँ-वास्तव में कोई कल्पना नहीं । जैसे दावाग्नि लगे से वन जलकर शून्य भासता है तैसे ही ज्ञानाग्नि से जले हुए चित्ताकाश और भूताकाश चिदाकाश में शून्य कल्पना भासते हैं । मलीन चैतन्य जो चैत्यता को प्राप्त होता है इससे यह जगत् भासता है । जैसे इन्द्रजाल की बाजी होती है तैसे ही यह जगत् है बोधहीन को यह जगत् भासता है । जैसे असम्यकदर्शी को सीपी में रूपा भासता है तैसे अज्ञानी को जगत् भासता है-आत्मतत्त्व नहीं भासता । जब दृश्यभ्रम नष्ट हो जावे तब मुक्तरूप हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चिदाकाशमाहात्म्यवर्णनंनाम त्रिसप्ततितमसर्गः ॥ ७३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो कुछ उपजा है इसे तुम चित्त से उपजा जानो । यह जैसे उपजा है तैसे उपजा है अब तुम इसकी निवृत्ति के लिये यत्न करके आत्मपद में चित्त लगाओ तब यह जगद्भ्रम नष्ट हो जावेगा । हे रामजी ! इस चित्त पर एक चित्ताख्यान जो पूर्व हुआ है उसे सुनो, जैसे मैंने देखा है तैसे ही तुमसे कहता हूँ । एक महाशून्य वन था और उसके किसी कोने में यह आकाश स्थित था उस उजाड़ में मैंने एक ऐसा पुरुष देखा जिसके सहस्र हाथ और सहस्र लोचन थे और चञ्चल और व्याकुल रूप था । उसका बड़ा आकार था और सहस्र भुजाओं से अपने शरीर के मारे आपही कष्टमान हो अनेक योजनों तक भागता चला जाता था । जब दौड़ता दौड़ता थक जाय और अङ्ग चूर्ण हो जायँ तो एक कृष्ण रात्रि की नाईं भयानकरूप कूप में जा पड़े और जब कुछ काल बीते तब वहाँ से भी निकलकर करञ्ज के वन में जा पड़े और जब वहाँ कण्टक चुभें तो कष्ट पावे । जैसे पतङ्ग दीपक को सुखरूप जान के उसमें प्रवेश करे और नाश हो तैसे ही जहाँ सुखरूप जानके प्रवेश करे वहीं ही कष्ट पावे और फिर उर्मा वन में जा पड़े फिर वहाँ से निकलकर आपको अपने ही हाथों से मारे और कष्टमान हो और फिर दौड़ता दौड़ता कूप
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में जा पड़े। वहाँ से निकल फिर कदली के वन में जावे और उससे निकल- कर फिर आपको मारे। जब कदली वन में जावे तब कुछ शान्तिमान् और प्रसन्न हो दौड़े और आपको मारे और कष्टमान् होके दूर से दूर जा पड़े। इसी प्रकार वह अपना किया आपही कष्ट भोगे और भटकता फिरे। तब मैंने उसको पकड़ के पूछा कि अरे, तू कौन है; यह क्या करता है और किस निमित्त करता है तेरा नाम क्या है और यहाँ क्यों मिथ्या जगत् में मोह को प्राप्त हुआ है? तब उसने मुझसे कहा कि न में कुछ हूँ, न यह कुछ है और न में कुछ करता हूँ। तू तो मेरा शत्रु है; तेरे देखने से में नाश होता हूँ। इस प्रकार कहकर वह अपने अङ्गों को देखने और रुदन करने लगा एक क्षण में उसका वपु नाश होने लगा और प्रथम उसके शीश, फिर भुजा, फिर वक्षःस्थल और फिर उदर क्रम से गिर पड़े। जैसे स्वप्न से जागे स्वप्न का शरीर नष्ट होता है। तब मैं नीति शक्ति को विचार के आगे गया तो और एक पुरुष इसी भाँति का देखा। वह भी इसी प्रकार आपको आपही प्रहार करे; कष्टमान हो और पूर्वोक्त क्रिया करे। जब उसने मुझको देखा तब प्रसन्न होकर हँसा और मैंने उसको रोक के उसी प्रकार पूछा तो उसने भी मेरे देखते-देखते अपने अङ्गों को त्याग दिया और कष्टवान् और हर्षवान् भी हुआ। फिर मैं आगे गया, तो एक और पुरुष देखा वह भी इसी प्रकार करे कि अपने हाथों से आपको मार के बड़े अन्धे कुएँ में जा पड़े। चिरकालपर्यन्त मैं उसको देखता रहा और जब वह कूप से निकला तब मैंने उस पर प्रसन्न होकर जैसे दूसरे से पूछा था पूछा, पर वह मूर्ख मुझको न जान के दूर से त्याग गया, और जो कुछ अपना व्यवहार था उसमें जा लगा। इसके अनन्तर चिरकाल पर्यन्त में उस वन में विचरता रहा तो उसी प्रकार मैंने फिर एक पुरुष देखा कि वह आपही आपको नाश करता था। निदान जिसको मैं पूछूँ और जो मेरे पास आवे उसको में कष्ट से छुड़ा दूँ और आनन्द को प्राप्त करूँ और जो मेरे निकट ही न आवे मुझको त्याग जावे तो उस वन में उसका वही हाल हो और वही व्यवहार करे। हे रामजी! वह वन तुमने भी देखा है। परन्तु तुमने वह व्यवहार नहीं किया और
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उस अटवी में जाने योग्य भी तुम नहीं । तुम बालक हो और वह अटवी महाभयानक है उसमें प्राप्त हुए कष्ट से कष्ट पाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तोपाख्यानवर्णनन्नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥
रामजी बोले, हे ब्राह्मण ! वह कौन अटवी है; मैंने कब देखी है और कहाँ है और वे पुरुष अपने नाश के निमित्त क्या उद्यम करते थे सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वह अटवी दूर नहीं और वह पुरुष भी दूर नहीं । यह जो गम्भीर बड़ा आकाररूप संसार है वही शून्य अटवी है और विकारों से पूर्ण है । यह अटवी भी आत्मा से सिद्ध होती है । उसमें जो पुरुष रहते हैं वे सब मन हैं और दुःखरूपी चेष्टा करते हैं विवेक ज्ञानरूपी मैं उनको पकड़ता था । जो मेरे निकट आते थे वे तो जैसे सूर्य के प्रकाश से सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं तैसे मेरे प्रबोध से प्रफुल्लित होकर महामति होते थे और चित्त से उपशम होकर परमपद को प्राप्त होते थे और जो मेरे निकट न आये और अविवेक से मोहे हुए मेरा निरादर करते थे वे मोह और कष्ट ही में रहे अब उसके अंग, प्रहार, कूप, कञ्ज और केले के वन का उपमान सुनो । हे रामजी ! जो कुछ विषय अभिलाषाएँ हैं वे उस मन के अंग हैं । हाथों से प्रहार करना यह है कि सकाम कर्म करते हैं और उनसे फटे हुए दूर से दूर दौड़ते और मृतक होते हैं । अन्धकूप में गिरना यही विवेक का त्याग करना है । इस प्रकार वह पुरुष आपको आपही प्रहार करते भटकते फिरते हैं और अभिलाषारूपी सहस्र अंगों से घिरे हुए मृतक होकर नरकरूपी कूप में पड़ते हैं जब उस कूप से बाहर निकलते हैं तब पुण्य कर्मों से स्वर्ग में जाते हैं । वही कदली के वन समान है वहाँ कुछ सुख पाते हैं। स्त्री, पुरुष, कलत्र आदिक कुटुम्ब कञ्ज के वन हैं और कञ्ज में कण्टक होते हैं सो पुत्र, धन और लोकों की कामना है उनसे कष्ट पाते हैं । जब महापाप कर्म करते हैं तब नरकरूपी अन्धकूप में पड़ते हैं और जब पुण्यकर्म करते हैं तब कदली वन की नाईं स्वर्ग को प्राप्त होते हैं तो कुछ उल्लास को भी प्राप्त होते हैं । हे रामजी ! गृहस्थाश्रम महादुःखरूप कञ्ज वन की नाईं है । ये
उत्पत्ति प्रकरण । ३४१
मनुष्य ऐसे मूर्ख हैं कि अपने नाश के निमित्त ही दुःखरूप कर्म करते हैं उनमें जो विहित करके विवेक के निकट आते हैं वे शुभ अशुभ कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त होते हैं और जो विवेक से हित नहीं करते वे दूर से दूर भटकते हैं । हे रामजी ! जो पुरुष भोग भोगने के निमित्त तप आदिक पुण्यकर्म करते हैं वे उत्तम शरीर धरके स्वर्गसुख भोगते हैं । वे जो मनरूपी पुरुष मुझको देख के कहते थे कि तू हमारा शत्रु है तुझसे हम नष्ट होते हैं और रुदन करते थे वे विषय-भोग त्यागने के निमित्त मूर्ख चित्त मनुष्य कष्ट पाते थे; क्योंकि मूर्खों की प्रीति विषय में होती है और उसके त्यागने से वे कष्टमान होते हैं और विवेक को देख के रुदन करने लगते हैं कि ये अर्द्धप्रबुद्ध हैं । जिनको परमपद की प्राप्ति नहीं हुई वे भोगों को त्यागे से कष्टवान् होते हैं और रुदन करते हैं । जब अर्द्धप्रबोध मूर्खचित्त अभिलाषारूपी अङ्गों से तपायमान हुआ अज्ञान को त्याग करता है और विवेक को प्राप्त होता है तब परम तुष्टिमान हो हँसने लगता है इससे तुम भी विवेक को प्राप्त होकर संसार की वासना को त्यागो तब आनन्दमान होगे । पूर्व के स्वभाव और नीच चेष्टा को त्यागकर वह इसलिये हँसता है कि मैं मिथ्या चेष्टा करता था और चिरकाल पर्यन्त मूर्खता से कष्ट पाता रहा। हे रामजी ! जब इस प्रकार विवेक को प्राप्त होकर चित्त परमपद में विश्राम पाता है तब पूर्व की दीन चेष्टा को स्मरण करके हँसता है । हे रामजी ! जब मैं उस मनरूपी पुरुष को रोककर पूछता था और वह अपने अङ्गों को त्यागता जाता था वह भी सुनो । में विवेकरूप हूँ । जब मैं उस चित्तरूपी पुरुष को मिला तब उसके सहस्र हाथ और सहस्र लोचनरूपी अभिलाषाओं का त्याग हुआ और वह अपने प्रहार करने से भी रह गया और जब उस पुरुष का शीश और परिच्छिन्न देह अभिमानी गिर पड़ा तब दुर्वासनारूपी अङ्गों को उसने त्याग दिया । उनको त्यागकर वह आप भी नष्ट हो गया सो अहंकार ने अपनी निर्वाणता को देखा अर्थात् परब्रह्म में लीन हो गया । हे रामजी ! पुरुष को बन्धन का कारण वासना है । जैसे बालक विचार से रहित चञ्चलरूपी चेष्टा करता है
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और कष्ट पाता है और जैसे कुसवरी कीटआप ही अपने बैठने की गुफा बनाके फँस मरती है तैसे ही मनुष्य अपनी वासना से आप ही बन्धन में पड़ता है । जैसे मर्कट लकड़ी में हाथ डालके कील को निकालने लगता है और लीला करता है तो उसका हाथ फँस जाता है और कष्ट पाता है तैसे ही अज्ञानी को अपनी चेष्टा ही बन्धन करती है क्योंकि विचार बिना करता है । इससे हे रामजी ! तुम चित्त से शास्त्र और सन्तों के गणों में चिर पर्यन्त चलो और जो कुछ अर्थशास्त्र में प्रतिपाद्य है उसकी दृढ़ भावना करो । जब अभ्यास से तुम्हारा चित्त स्वस्थ होगा तब तुमको कोई शोक न होगा । हे रामजी ! जब चित्त आत्मपद में स्थित होगा तब राग और द्वेष से चलायमान न होगा और जो कुछ देहादिकों से प्रच्छन्न अहंकार है सो नष्ट होगा । जैसे सूर्य के उदय होने से वरफ गल जाती है तैसे ही तुच्छ अहंकार नष्ट हो जावेगा और सर्व आत्मा ही भासेगा । हे रामजी ! जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक शास्त्रों के अनुसार आनन्दित आचार में विचरे, शास्त्रों के अर्थ में अभ्यास करे और मन को रागद्वेषादिक से मौन करे तब पाने योग्य, अजन्मा, शुद्ध और शान्तरूप पद को प्राप्त होता है और सब शोकों से तरके शान्तरूप होता है । हे रामजी ! जब आत्मतत्त्व का प्रमाद है तब तक अनेक दुःख प्रवृद्ध होते जाते हैं शान्ति नहीं होती और जब आत्मपद की प्राप्ति होती है तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तोपाख्यानसमाप्तिवर्णनंनाम पञ्चसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह चित्त परब्रह्म से उपजा है सो आत्मरूप है और आत्मरूप भी नहीं । जैसे समुद्र से तरङ्ग तन्मय और भिन्न होते तैसे ही चित्त है । जो ज्ञानवान् हैं उनको चित्त ब्रह्मरूप ही है कुछ भिन्न नहीं । जैसे जिसको जल का ज्ञान है उसको तरङ्ग भी जलरूप भासते हैं और जो ज्ञान से रहित हैं उनको मन संसारभ्रम का कारण है । जैसे जिसको जल का ज्ञान नहीं उसको भिन्न-भिन्न तरङ्ग भासते हैं तैसे ही अज्ञानी को भिन्न-भिन्न जगत् भासता है और ज्ञानवान् को केवल ब्रह्मसत्ता ही भासती
उत्पत्ति प्रकरण । ३४३
है। हे रामजी ! ज्ञानवान् अज्ञानी के उपदेश के निमित्त भेद कल्पते हैं; अपनी दृष्टि में उनको सर्व ब्रह्म ही भासता है। मन आदिक भी जो तुमको भासते हैं वे ब्रह्म से भिन्न नहीं अनन्य और शक्तिरूप हैं। उससे अन्य कोई पदार्थ नहीं; सर्वशक्ति परब्रह्म नित्य और सर्व ओर से पूर्ण अविनाशी है और सबही ब्रह्मसत्ता में है सर्व शक्तिमान आत्मा है। जैसी उसको रुचि है वही शक्ति प्रत्यक्ष होती है और सर्व शक्तिरूप होकर फला है। जीवों में चेतनशक्ति ज्ञान, वायु में स्पन्दता, पत्थर में जड़ता, जल में द्रवता, अग्नि में तेज, आकाश में शून्यता, स्वर्ग में भाव, काल में नाम, शोक में शोक, मुदिता में आनन्द, वीरों में वीर, सर्ग के उपजाने में उत्पत्ति और कल्प के अन्त में नाशशक्ति आदि जो कुछ भाव अभाव शक्ति है सो सब ब्रह्म ही की है। जैसे फूल, फल, बेल, पत्र, शाखा, वृक्ष विस्तार बीज के अन्दर होता है तैसे ही सब जगत् ब्रह्म में स्थित होता है और जीव, चित्त और मन आदिक भी ब्रह्म ही में स्थित हैं। हे रामजी ! जैसे वसन्त ऋतु में एक ही रस नाना प्रकार के फूल, फल, टहनियों सहित बहुत रूपों को धरता है तैसे ही एक ही आकाश ब्रह्म चैत्यता से जगत्रूप हो भासता है और उसमें देशाकालादिक कोई विचित्रता, नहीं सम्पूर्ण जगत् वही रूप है। वह ब्रह्मात्मा सर्वज्ञ, नित्य उदित और बृहद्रूप है। हे रामचन्द्र ! उसी की मनन कलना मन कहाती है। जैसे आकाश में आँख से तरुवरे और सूर्य की किरणों में जल भासता है तैसे ही आत्मा में मन है । हे रामजी ब्रह्म में चित्त मन का रूप है और वह मन ब्रह्म की शक्तिरूप है; इसी कारण ब्रह्म से भिन्न नहीं ब्रह्म ही है—ब्रह्म से भिन्न कल्पना करनी अज्ञानता है । ब्रह्म में मैं ऐसा उत्थान हुआ है इसका नाम मन है और जड़ अजड़रूप मनसे जगत् हुआ है। प्रतियोगी और व्यवच्छेदक संख्यारूप सब मन के कल्पे हैं। प्रतियोगी और व्यवच्छेदक संख्या का भेद यह है कि प्रतियोगी विरोधी को कहते हैं; जैसे चेतन का प्रतियोगी जड़ और व्यवच्छेद इसे कहते हैं कि जैसे घट अविच्छिन्न पट । ऐसे अनेकरूप दृश्य सब मन के कल्पे हैं जैसे-जैसे ब्रह्म में इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों की नाईं मन दृढ़ होता है तैसे ही तैसे भासता
३४४ योगवाशिष्ठ।
हे जैसे समुद्र में द्रवता से तरङ्गचक्रदो भासते हैं तैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में जीव फुरने से नाना प्रकार का जगत् हो भासता है परन्तु कुछ हुआ नहीं ब्रह्म ही अपने आप में स्थित है । जैसे तरङ्गों के होने और मिटने में जल एक ही रस रहता है तैसे ही जगत् के उपजने और मिटने से ब्रह्म ज्यों का त्यों है । जैसे सूर्य की किरणों में वृथा तेज से जल भासता है तैसे ही आत्मतत्त्व में विचित्रता भासती है परन्तु सदा अपने आप में स्थित है । हे रामजी ! कारण, कर्म और कर्त्ता, जन्म, मरणादिक जो कुछ भासते हैं सो सब ब्रह्मरूप है ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं और आत्मा शुद्धरूप है उसमें न लोभ है, न मोह है और न तृष्णा है क्योंकि अद्वैत-रूप और सर्वात्मा है । जैसे सुवर्ण से नाना प्रकार के भूषण हो भासते हैं तैसे ही ब्रह्म से जगत् हो भासता है । जो ज्ञानवान् पुरुष है उसको सदा ऐसे ही भासता है । और जो अज्ञानी है उसको भिन्न-भिन्न कल्पना भासती है । जैसे किसी का बान्धव दूर देश से चिरकाल पीछे आवे तो वह देशकाल के व्यवधान से बान्धव को भी अबान्धव जानता है तैसे ही अज्ञान के व्यवधान से जीव अभिन्नरूप आत्मा को भिन्नरूप जानता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासता है तैसे ही सत्य असत्यरूप मन आत्मा में भासता है । उस मन ने शब्द-अर्थरूप भिन्न-भिन्न कल्पना रची हैं पर आत्मतत्त्व सदा अपने आप में स्थित है और उसमें बन्ध मोक्ष कल्पना का अभाव है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मन में जो निश्चय होता है वही होता है अन्यथा नहीं होता पर मन में जो बन्ध का निश्चय होता है सो बन्ध कैसे सत्य है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! बन्ध की कल्पना मूर्ख करते हैं इससे वह मिथ्या है और जो बन्ध की कल्पना मिथ्या हुई तो बन्ध की अपेक्षा से मोक्ष मिथ्या है—वास्तव में न बन्ध है और न मोक्ष है । हे महामते रामजी ! अज्ञान से अवस्तु भी वस्तुरूप हो भासती है-जैसे रस्सी में सर्प भासता है पर ज्ञानवान् को अवस्तु सत्य नहीं भासती । जैसे रस्सी के ज्ञान से सर्प नहीं भासता तैसे ही बन्ध-मोक्ष कल्पना मूर्खों को भासती है, ज्ञानवान् को बन्ध-मोक्ष कल्पना कोई नहीं, हे रामजी ! आदि परमात्मा से मन उपजा है उसने ही बन्ध और मोक्ष
उत्पत्ति प्रकरण । ३४५
मोह से कल्या है और फिर दृश्य प्रपञ्च को रचा है । वह प्रपञ्च कल्पना- मात्र है और बालक की कथावत् मूर्खों को रुंचता है अर्थात् जो विचार से रहित हैं उनको यह जगत् सत्य भासता है ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तचिकित्सावर्णनन्नाम षट्सप्ततितमस्सर्गः ॥ ७६ ॥
रामजी बोले, हे मुनियों में श्रेष्ठ ! बालक की कथा क्या है वह क्रम से कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र ! एक मूर्ख बालक ने दाई से कहा कि कोई अपूर्व कथा जो आगे न हुई हो मुझसे कह । तब उसके विनोद निमित्त महाबुद्धिमान धात्री एक कथा कहने लगी । वह बोली हे पुत्र ! सुन, एक बड़ा शून्य नगर था और उसका एक राजा था । उस राजा के शुभ आचारवान् और बड़े सुन्दर तेजवान् तीन पुत्र थे । उनमें से दो तो उपजे न थे और एक गर्भ में ही आया न था । वे तीनों शुभ आचारवान् और शुभ क्रिया कर्त्ता द्रव्य के अर्थ जीतने को चले और शून्य नगर से बाहर जा निमार्गरूप नगर में वे निर्बन्ध और शोकसहित इकट्ठे ऐसे चले जैसे बुध, शुक्र और शनैश्चर । इकट्ठे चलने का दृष्टान्त शुक्र, शनैश्चर और बुध का नहीं है, निर्बन्ध और शोक का ग्रहणरूप दृष्टान्त है । सरसों के फूलों की नाईं उनके अङ्ग कोमल थे इसलिये वे मार्ग में थक गये और ऊपर से सूर्य की धूप तपने लगी । जैसे ज्येष्ठ- आषाढ़ की धूप से कमल कुम्हिला जाते हैं तैसे ही वे कुम्हिला गये और तप्त चरणों से तपने लगे और महाशोक को प्राप्त हुए । चरणों में डाभ के कण्टक लगे, मुख धूर से धूसर हो गये और तीनों कष्टवान् हुए । आगे चलकर उन्होंने तीन वृक्ष देखे जिनमें से दो तो उपजे नहीं और तीसरे का बीज भी नहीं बोया गया । उन तीनों ने एक-एक वृक्ष के नीचे आकर विश्राम किया—जैसे स्वर्ग में कल्पवृक्ष के नीचे इन्द्र और यम आ बैठे—और उनके फल भक्षण किये, फलों को काट के रस पान किया, उनके फूलों की माला गले में पहिरी और चिरकाल पर्यन्त वहाँ विश्रामकर फिर दूर से दूर चले गये । इतने में मध्याह्न का समय हुआ उसमे वे तपायमान हुए । आगे उन्होंने तीन नदियाँ देखीं और
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उनके निकट गये जो तरङ्गों से लीलायमान थीं । उनमें से दो में तो कुछ भी जल न था और तीसरी सूखी पड़ी थी । उनमें वे चिरकाल पर्यन्त क्रीड़ा करते रहे-जैसे स्वर्ग की गंगा में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कल्लोल करते हैं और जलपान किया । फिर जब दिन अस्त होने लगा तब वहाँ से चले तो एक भविष्यत् नगर देखा जो बड़ी ध्वजाओं से सम्पन्न और रत्न मणि और सुवर्ण से जड़ा मानों सुमेरु का शिखर था । उसमें उन्होंने हीरे और माणिकों से जड़ा हुआ एक मन्दिर देखा जो निराकाररूप था उसमें वे घुस गये तो वहाँ बहुत अंगना देखीं और फिर विचार किया कि रसोई कीजिये और ब्राह्मण को भोजन खवाइये । तब उन्होंने कञ्चन की तीन बटलोइयाँ मँगवाईं जिनमें से दो का करने-वाला तो उपजा नहीं अर्थात् आधार से रहित थीं और तीसरी चूर्णरूप थी । उस चूर्णरूप बटलोई में उन्होंने सोलह सेर रसोई चढ़ाई और ब्रह्मा आदि विदेहरूप और निर्मुख ऋषियों ने भोजन किया । उससे उन्होंने सैंकड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराय आप भी भोजन किया । इस प्रकार वह राजपुत्र आजतक सुख से स्थित हैं । हे पुत्र ! यह रमणीय कथा मैंने तुझसे सुनाई है । यदि तू इसको हृदय में धारेगा तो पंडित होगा । हे रामजी ! इस प्रकार धात्री ने जब बालक को कथा सुनाई तब बालक के मन में सच प्रतीत हुई । जैसे उस कथा का रूप संकल्प से भिन्न कुछ न था तैसे यह जगत् सब संकल्पमात्र है, अज्ञान से हृदय में स्थिर हो रहा है, भ्रम में इससे आस्था हुई है और बन्ध, मोक्ष भी कल्पना-मात्र है संकल्प से भिन्न इसका स्वरूप नहीं । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा निष्किञ्चनरूप है पर संकल्प के वश से किञ्चनरूप हो भासता है । पृथ्वी, वायु, आकाश, नदियाँ, देश आदिक जो पाञ्चभौतिक सृष्टि है सो सब संकल्पमात्र है जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि भासती है और कुछ नहीं उपजी तैसे ही इस जगत् को जानो । जैसे कल्पित राजपुत्र भविष्यत् नगर में स्थित हुए थे और वह रचना संकल्प बालक को स्थिरीभूत हुई थी तैसे ही यह जगत् संकल्पमात्र मन के फुरने से दृढ़ हुआ है । जैसे द्रवता से जो जल में तरङ्ग होते हैं वह जल ही जल है तैसे ही आत्मा
उत्पत्ति प्रकरण । ३५७
ही आत्मा में स्थित है। यह सब जगत् संकल्प से उपजता है और बड़े विस्तार को प्राप्त होता है जैसे दिन होने से सब व्यवहार विस्तार को प्राप्त होते हैं तैसे ही संकल्प से उपजा जगत् विस्तार को प्राप्त होता है और चित् का विलास है, चित् के फुरने से भासता है। इससे हे रामजी संकल्परूपी मैल को त्याग करके निर्विकल्प आत्मतत्त्व का आश्रय करो। जब उस पद में स्थित होंगे तब परम शान्ति की प्राप्ति होगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बालकारूढ्यायिकावर्णनन्नाम सप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मूढ अज्ञानी पुरुष अपने संकल्प से आप ही मोह को प्राप्त होता है और जो पण्डित है वह मोह को नहीं प्राप्त होता। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में पिशाच कल्पकर भय पाता है तैसे ही मूर्ख अपनी कल्पना से दुःखी होता है। रामजी बोले, हे भगवन् ! ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! वह संकल्प क्या है और छाया क्या है जो असत्य ही सत्यरूप पिशाच की नाईं दीखती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पाञ्चभौतिक शरीर परछाहीं की नाईं है, क्योंकि अपनी कल्पना से रचा है और अहंकाररूपी पिशाच है। जैसे मिथ्या परछाहीं में पिशाच को देख के मनुष्य भयवान् होता है तैसे ही देह में अहंकार को देखके खेद प्राप्त होता है। हे रामजी ! एक परम आत्मा सर्व में स्थित है तब अहंकार कैसे हो वास्तव में अहंकार कोई नहीं परमात्मा ही अभेद-रूप है और उसमें अहंबुद्धि भ्रम से भासती है । जैसे मिथ्यादर्शी को मरुस्थल में जल भासता है तैसे ही मिथ्याज्ञान से अहंकार कल्पना होती है। जैसे मणि का प्रकाश मणि पर पड़ता है सो मणि से भिन्न नहीं, मणिरूप ही है, तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है सो आत्मा ही में स्थित है। जैसे जल में द्रवता से चक्र और तरङ्ग हो भासते हैं सो जलरूप ही हैं, तैसे ही आत्मा में चित्त से जो नानात्व हो भासता है सो आत्मा से भिन्न नहीं, असम्यक् दर्शन से नानात्व भासता है इससे असम्यक् दृष्टि को त्याग के आनन्दरूप का आश्रय करो और मोह के आरम्भ को त्याग कर शुद्ध बुद्धि सहित विचारो और विचार से सत्य ग्रहण
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करो, असत्य का त्याग करो । हे रामजी ! तुम मोह का माहात्म्य देखो कि स्थूलरूप देह जो नाशवन्त है उसके रखने का उपाय करना है पर वह रहता नहीं और जिस मनरूपी शरीर के नाश हुए कल्याण होता है उसको पुष्ट करता है । हे रामजी ! सब मोह के आरम्भ मिथ्या भ्रम से दृढ़ हुए हैं, अनन्त आत्मतत्त्व में कोई कल्पना नहीं, कौन किसको कहे । जो कुछ नानात्व भासता है वह है नहीं, और जीव ब्रह्म से अभिन्न है । उस ब्रह्मतत्त्व में किसे बन्ध कहिये और किसे मोक्ष कहिये, वास्तव में न कोई बन्ध है न मोक्ष है, क्योंकि आत्मसत्ता अनन्तरूप है । हे रामजी ! वास्तव में द्वैतकल्पना कोई नहीं, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आप में है । जो आत्मतत्त्व अनन्त है वही अज्ञान से अन्य की नाईं भासता है । जब जीव अनात्म में आत्माभिमान करता है तब परिच्छिन्न कल्पना होती है और शरीर को अच्छेदरूप जान के कष्टवान् होता है पर आत्मपद में भेद अभेद विकार कोई नहीं, क्योंकि वह तो नित्य, शुद्ध, बोध और अविनाशी पुरुष है । हे रामजी ! आत्मा में न कोई विकार है, न बन्धन है और न मोक्ष है, क्योंकि आत्मतत्त्व अनन्तरूप, निर्विकार, अच्छेद, निराकार और अद्वैतरूप है । उसको बन्ध विकार कल्पना कैसे हो ? हे रामजी ! देह के नष्ट हुए आत्मा नष्ट नहीं होता । जैसे चमड़ी में आकाश होता है तो वह चमड़ी के नाश हुए नष्ट नहीं होता तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा नष्ट नहीं होता । जैसे फूल के नाश हुए गन्ध आकाश में लीन होती है, जैसे कमल पर बरफ पड़ता है तो कमल नष्ट हो जाता है भ्रमर नष्ट नहीं होता और जैसे मेघ के नाश हुए पवन का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता । हे रामजी ! सबका शरीर मन है और वह आत्मा की शक्ति है उसमें यह शरीर आदिक जगत् रचा है । उस मन का ज्ञान बिना नाश नहीं होता तो फिर शरीर आदि के नष्ट हुए आत्मा का नाश कैसे हो ? हे रामजी ! शरीर के नष्ट हुए तुम्हारा नाश नहीं होगा, तुम क्यों मिथ्या शोकवान् होते हो ? तुम तो नित्य, शुद्ध और शान्तरूप आत्मा हो । हे रामजी ! जैसे मेघ के क्षीण हुए पवन क्षीण नहीं होता और कमलों
उत्पत्ति प्रकरण । ३४९
के सूखे से भ्रमर नष्ट नहीं होता तैसे ही देह के नष्ट हुए आत्मा नहीं नष्ट होता । संसार में क्रीड़ाकर्त्ता जो मन है उसका संसार में नाश नहीं होता तो आत्मा का नाश कैसे हो ? जैसे घट के नाश हुए घटाकाश का नाश नहीं होता । हे रामजी ! जैसे जल के कुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है और उस कुण्ड के नाश हुए प्रतिबिम्ब का नाश नहीं होता, यदि उस जल को और ठौर ले जायँ तो प्रतिबिम्ब भी चलता भासता है तैसे ही देह में जो आत्मा स्थित है सो देह के चलने से चलता भासता है । जैसे घट के फूटे से घटाकाश महाकाश में स्थित होता है तैसे ही देह के नाश हुए आत्मा निरामयपद में स्थित होता है । हे रामजी ! सब जीवों का देह मनरूपी है । जब वह मृतक होता है तब कुछ काल पर्यन्त देशकाल और पदार्थ का अभाव हो जाता है और इसके अनन्तर फिर पदार्थ भासते हैं, उस मूर्च्छा का नाम मृतक है । आत्मा का नाश तो नहीं होता चित्त की मूर्च्छा से देश, काल और पदार्थों के अभाव होने का नाम मृतक है । हे रामजी ! संसारभ्रम का रचनेवाला जो मन है उसका ज्ञानरूपी अग्नि से नाश होता है, आत्मसत्ता का नाश कैसे हो ? हे रामजी ! देश काल और वस्तु से मन का निश्चय विपर्यय भाव को प्राप्त होता है; चाहे अनेक यत्न करे परन्तु ज्ञान विना नष्ट नहीं होता । हे रामजी ! कल्पितरूप जन्म का नाश नहीं होता तो जगत् के पदार्थों से आत्मसत्ता का नाश कैसे हो ? इसलिए शोक किसी का न करना । हे महाबाहो ! तुम तो नित्यशुद्ध अविनाशी पुरुष हो । यह जो सङ्कल्प वासना से तुममें जन्म-मरण आदिक भासते हैं सो भ्रममात्र है । इससे इस वासना को त्याग के तुम शुद्ध चिदाकाश में स्थित हो जाओ । जैसे गरुड़ पक्षी अण्डा त्याग के आकाश को उड़ता है तैसे ही वासना को त्याग करके तुम चिदाकाश में स्थित हो जाओ । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा में मनन फुरता है वही मन है, वह मनन शक्ति इष्ट और अनिष्ट से बन्धन का कारण है और वह मन मिथ्या भ्रान्ति से उदय हुआ है । जैसे स्वप्न द्रष्टा भ्रान्तिमात्र होता है तैसे ही जाग्रत् सृष्टि भ्रान्तिमात्र है । हे रामजी ! यह जगत् अविद्या से बन्धनमय और दुःख का कारण
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है और उस अविद्या को तरना कठिन है। अविचार से अविद्या सिद्ध है, विचार किये से नष्ट होती है। उसी अविद्या ने जगत् विस्तारा है। यह जगत् बरफ की दीवार है। जब ज्ञानरूपी अग्नि का तेज होगा तब निवृत्त हो जावेगी। हे रामजी ! यह जगत् आकाशरूप है, अविद्या भ्रान्ति दृष्टि से आकार हो भासता है और असत्य अविद्या से बड़े विस्तार को प्राप्त होता है। यह दीर्घ स्वप्ना है, विचार किये से निवृत्त हो जाता है। हे रामजी ! यह जगत् भावनामात्र है, वास्तव में कुछ उपजा नहीं। जैसे आकाश में भ्रान्ति से मोर के पुच्छ की नांई तरुवरे भासते हैं तैसे ही भ्रान्ति से जगत् भासता है। जैसे बरफ की शिला तप्त करने से लीन हो जाती है तैसे ही आत्मविचार से जगत् लीन हो जाता है। हे रामजी! यह जगत् अविद्या से बँधा है सो अनर्थ का कारण है। जैसे-जैसे चित्त फुरता है तैसे ही तैसे हो भासता है। जैसे इन्द्रजाली सुवर्ण की वर्षा आदिक माया रचता है तैसे ही चित्त जैसा फुरता है तैसा ही हो भासता है। आत्मा के प्रमाद से जो कुछ चेष्टा मन करता है वह अपने ही नाश के कारण होती है। जैसे घुरान अर्थात् कुसयारी की चेष्टा अपने ही बन्धन का कारण होती है तैसे ही मन की चेष्टा अपने नाश के निमित्त होती है और जैसे नटवा अपनी क्रिया से नाना प्रकार के रूप धारता है तैसे ही मन अपने सङ्कल्प को विकल्प करके नाना प्रकार के भावरूपों को धारता है। जब चित्त अपने सङ्कल्प विकल्प को त्यागकर आत्मा की ओर देखता है तब चित्त नष्ट हो जाता है और जब तक आत्मा की ओर नहीं देखता तब तक जगत् को फैलाता है सो दुःख का कारण होता है। हे रामजी! सङ्कल्प आवरण को दूर करो तब आत्मतत्त्व प्रकाशेगा सङ्कल्प विकल्प ही आत्मा में आवरण है। जब दृश्य को त्यागोगे तब आत्मबोध प्रकाशेगा। हे रामजी ! मन के नाश में बड़ा आनन्द उदय होता है और मन के उदय हुए बड़ा अनर्थ होता है, इससे मन के नाश करने का यत्न करो । मन के बढ़ाने का यत्न मत करो। हे रामजी ! मनरूपी किसान ने जगतरूपी वन रचा है, उसमें सुख-दुःखरूपी वृक्ष हैं और मनरूपी सर्प रहता है। जो विवेक से रहित पुरुष हैं उनको वह भोजन करता है। हे
उत्पत्ति प्रकरण । ३५१
रामजी ! यह मन परम दुःख का कारण है; इसमें तुम इस मनरूपी शत्रु को वैराग्य और अभ्यासरूपी खड्ग से मारो तब आत्मपद को प्राप्त होगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा तब सायंकाल का समय हुआ और सब श्रोता परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये और फिर सूर्य की किरणों के उदय होने पर अपने-अपने स्थान पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मननिर्वाणोपदेशवर्णन- नामाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ ७८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह चित्र भी परमात्मा से उठे है । जैसे समुद्र में लीला से जलकणिका होती है तैसे ही परमात्मा से मन हुआ है । उस मन ने बड़े विस्तार का जगत् रचा है जो छोटे को बड़ा कर लेता है और बड़े को छोटा करता है, जो अपना आप रूप है उसको अन्य की नाईं दिखाता है और जो अन्य रूप है उसको अपना रूप दिखाता है अर्थात् आत्मा को अनात्मभाव प्राप्त करता है और अनात्मा को आत्मभाव प्राप्त करता है । ऐसा भ्रान्तिरूप मन निकट वस्तु को दूर दिखाता और दूर वस्तु को निकट दिखाता है—जैसे स्वप्ने में निकट वस्तु दूर भासती है और दूर वस्तु निकट भासती है । हे रामजी ! मन एक निमेष में संसार को उत्पन्न करता और एक निमेष में ही लीन कर लेता है । जो कुछ स्थावर-जङ्गमरूप जगत् भासता है वह सब मन ही से उपजा है और देश, काल, क्रिया और द्रव्य अनेक शक्ति विपर्ययरूप मन ही दिखाता है और अपने फुरने से नाना प्रकार के भाव अभाव को प्राप्त होता है । जैसे नट लीला करके नाना प्रकार के स्वांग रचता और सच को झूठ और झूठ को सच दिखाता है वैसे ही मन में जैसा फुरना दृढ़ होता है वैसे ही भासता है । जैसा-जैसा निश्चय चञ्चल मन में होता है उनके अनुसार इन्द्रियाँ भी विचरती हैं । हे रामजी ! जो मन से चेष्टा होती है वही सफल होती है, शरीर की चेष्टा मन बिना सफल नहीं होती । जैसे जैसा बेल का बीज होता है वैसा ही उसका फल होता है और प्रकार नहीं होता वैसे ही जो कुछ
३५२ योगवाशिष्ट।
मन में निश्चय होता है वही सफल होता है। जैसे बालक मृत्तिका की सेना बनाता है और नाना प्रकार के उसके नाम रखता है वैसे ही मन भी संकल्प से जगत् रच लेता है। जैसे मिट्टी की सेना मिट्टी से भिन्न नहीं वैसे ही आत्मा में जो नाना प्रकार का जगत् कल्पता है वह आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे संकल्प में मन नाना प्रकार अर्थों को कल्पता है वैसे ही जाग्रत् जगत् भी भ्रम से कल्पता है। हे रामजी! एक गोपद में मन अनेक योजन रच लेता है और कल्प का क्षण और क्षण का कल्प रच लेता है। जैसा कुछ मन में तीव्र संवेग होता है वैसा ही होकर भासता है, उसको रचने में विलम्ब नहीं लगता; जो कुछ देश काल पदार्थ हैं वह मन से उपजे हैं और सबका कारणरूप मन ही है। जैसे पत्र, फूल, फल, और टहनी वृक्ष से उपजे हैं वे वृक्षरूप हैं, जैसे समुद्र में लहरें होती हैं वे जलरूप हैं और जैसे अग्नि उष्णतारूप है, वैसे ही नाना प्रकार के स्वभाव मन से उपजे दृष्टि आते हैं और सब मनरूप हैं। हे रामजी! कर्त्ता-कर्म-क्रिया, द्रष्टा-दर्शन-दृश्य सब मन ही का फैलाव है। जैसे सुवर्ण से नाना प्रकार के भूषण भासते हैं और जब सुवर्ण का ज्ञान हुआ तब सब भूषण एक सुवर्ण ही भासता है, भूषण भाव नहीं भासता वैसे ही जब तक आत्मा का प्रमाद है तब तक द्वैत रूप जगत् भासता है और जब आत्मज्ञान होता है तब सब भ्रम मिट जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तमाहात्म्यवर्णनन्नामै- कोनाशीतितमस्सर्गः ॥ ७६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! अब एक वृत्तान्त जो पूर्वकाल में हुआ है तुमको सुनाता हूँ। यह जगत् इन्द्रजालवत् है। जैसे मनरूपी इन्द्रजाल में यह जगत् स्थित है तैसे तुम सुनो। इस पृथ्वी में एक उत्तरपाद नाम देश था, उसमें एक बड़ा वन था और वहाँ नाना प्रकार के वृक्ष, फूल, फल और ताल थे जिन पर मोर आदिक अनेक प्रकार के पक्षी शब्द करते थे। फूलों से सुगन्धें निकलती थीं और विद्याधर, सिद्धगण और देवता आनकर विश्राम करते थे, किन्नर गान करते थे और मन्द-मन्द पवन चलता था। निदान उस स्थान में महासुन्दर रचना बनी थी और
उत्पत्ति प्रकरण ।
३५३
स्वर्णवत महाकल्पवृक्ष लगे थे । उस देश का लवण नाम राजा अति तेजवान् और धर्मात्मा राजा हरिश्चन्द्र के कुल में उपजा । उसका ऐसा तेज हुआ कि शत्रु उसका नाम स्मरण करे तो उसको ताप चढ़ जावे और वह श्रेष्ठ पुरुषों की पालना करे । उस राजा के यश से सम्पूर्ण पृथ्वी पूर्ण हो गई और स्वर्ग में देवता और विद्याधर यश गाते थे । उस राजा में लोभ और कुटिलता न थी और वह बड़ा बुद्धिमान् और उदार था । एक दिन सभा में बड़े ऊँचे सिंहासन पर वह बैठा था और सुन्दर स्त्रियों का नृत्य होता था, अतिसुन्दर बाजे बजते थे और मधुरध्वनि होती थी । राजा के शीश पर चमर झुलता था और मन्त्री और मण्डलेश्वरों की सेना आगे खड़ी राजा को देशमण्डल की वार्त्ता सुनाती थी । इतिहास आदि की पुस्तकें ढाँप के उठा रक्खी थीं और भाट स्तुति करते थे । केवल दो मुहूर्त्त दिन रह गया था उस काल में एक इन्द्रजाली बाजीगर आडम्बर संयुक्त सभा में आया और राजा से कहने लगा, हे राजन् ! आप मेरा एक कौतुक देखिये । इतना कहकर उसने अपना पिटारा खोला और उसमें से एक मोर की पूँछ निकालकर घुमाने लगा । उससे राजा को नाना प्रकार की रचना भासने लगी-मानो परमात्मा की माया है और नाना प्रकार के रङ्ग राजा ने देखे । उसी क्षण में किसी मण्डलेश्वर का दूत एक घोड़ा लेकर राजा के निकट आया और बोला, हे राजन् ! यह महाबलवान् घोड़ा राजा ने आपको दिया है । जैसे उच्चैःश्रवा इन्द्र का घोड़ा समुद्र मथने से निकला है तैसा ही यह है और इसका पवन के सदृश वेग है । मेरे स्वामी ने कहा है कि जो उत्तम पदार्थ है वह बड़ों को देना चाहिये और यह आपके योग्य है इससे आप इसे ग्रहण कीजिये । तब इन्द्रजाली बोला, हे राजन् ! आप इस घोड़े पर आरूढ़ हों, इस पर चढ़कर आप शोभा पावेंगे । इतना सुन राजा घोड़े की ओर देख मूर्च्छित हो गया और भय से मन्त्री भी उसे न जगावें और उसके हाथ पाँव भी कुछ न हिलें । जैसे कीचड़ में कमल अचल होता है तैसे ही राजा अचल हो गया और दो मुहूर्त्त पर्यन्त मूर्च्छित रहा । भाट और कवि जो स्तुति करते थे वे सब चुप हो रहे और मन्त्री और नौकर भय